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सड़कें कोलकाता कीे

  • kewal sethi
  • 22 hours ago
  • 3 min read

सड़कें कोलकाता कीे


शीर्षक तो कुछ भी हो सकता हैं और यह भी हो सकता है कि इस का सम्बन्ध विषय वस्तु से हो ही न। खैर, इस बात को ध्यान में रखते हुये आगे पढ़िये।

बात है 1964-65 की। मसूरी में प्रशिक्षण का एक अंग है भारत दर्शन। भारत की ऐतिहासिक, औद्योगिक, सांस्कृतिक झलकी देखने के लिये एक महीने का अन्तराल। उŸार के प्रशिक्षणार्थियों को दक्षिण में तथा पूर्व में ले जाया गया और दक्षिण के प्रशिक्षणार्थियों को उत्तरी और पश्चिमी भारत में।

इस में कोलकाता भी एक पड़ाव था। कलकत्ता तो मेरा देखा भाला स्थान था। मेरे बड़े भाई वहीं पर नौकरी में थे। कई बार आये गये। इस लिये मैं ने अपने समूह से विदा ली कि भैया को मिल कर आते हैं। टालीगंज में वह रहते थे। वहां गये तो दरवाज़े पर ताला। इधर उधर गये हों गे। आते ही हों गे। पर इंतज़ार ज़रा लम्बा हो गया तो पड़ोसी का द्वार खटखटाया। उन्हों ने बताया कि भैया तथा भाभी तो दिल्ली गये और चार पॉंच दिन में लौटें गे।

अब क्या करें। हमारे रहने का स्थान तो रेल का डिब्बा था। वह तो खाली हो गा, वहॉं क्या करें गे जा कर। लौट कर आये कलकत्ता के मशहूर स्थान चौरंगी में। इधर उधर घूमें गे समय काटने के लिये। वहां पर अपने बैचमेट मिल गये के के। (पता नहीं कि उन्हें याद है कि नहीं) वह भी चौरंगी में घूम रहे थे। क्या हुआ कि उन के भाई भी कलकत्ता में ही थे। बिहार बंगाल हैं कितनी दूर। उस समय उन के भाई मय परिवार गये हुये थे पटना। आते जाते रहते थे। इस लिये वह चौरंगी लौट आये। नगर भ्रमण में रुचि नहीं थी पर रेल के डिब्बे में लौट कर क्या करें।

एक से दो भले। समय काट सकते हैं पर कैसे। ऐसे मौके पर सब से सुगम तरीका समय काटने का है सिनेमा हाल। बने ही इस लिये हैं। देखा भाला तो एक टाकीज़ में फिल्म थी ‘‘वैस्ट साईड स्टोरी’’। संगीतमय कहानी। गानों की भरमार। कहानी थी न्यू यार्क शहर की। आपस में दो विरोधी गैंग थे, मार काट चलती रहती थी। याद है कि जब एक गिरोह का सदस्य मारा गया तो उस की साथी ने अपना गम एक गाने के माध्यम से व्यक्त किया।

वह अपनी जगह, पर अपनी कहानी तो अलग है। उस फिल्म का शो धा तीन बजे और अभी तो दस ही बजे थे। पांच घण्टे क्या करें। पास की ही एक टाकीज़ में देखा, फिल्म थी ‘‘जंगली’’। शम्मी कपूर, सायरा बानो की। हम दोनों ने उसे देख रखा था पर समय तो काटना ही था, सो उस में जा कर बैठ गये।

वहां से निपटे तो खाना खाया। 35 रुपये प्लेट। हमारी उस ज़माने के दस दिन का वेतन। (आजकल के पे स्केल के अनुसार 8500 रुपये प्लेट)। पर हम उस समय अमीर थे। इस से याद आया कि भारत भ्रमण के दौरान तिरुचि में भी रुके थे। किला वगैरा देख कर घूम कर आयेे तो गाड़ी छूटने में कुछ ही समय बचा था। खाना खाना भी ज़रूरी था। वहीं सामने के रैस्तेरैण्ट में सांभर चावल खाये। खाये क्या किसी तारह निपटाये। कीमत 70 पैसे। उस समय श्री लोहनी साथ थे। (उन्हें शायद याद भी न हो)।

वैस्ट साईड स्टोरी भी छह बजे से पहले ही समाप्त हो गई। अभी तो दिन था इस लिये एक और मूवी देखी। नाम भी अब याद नहीं। शायद कहीं लिख कर रखा हो पर जाने दीजिये। उस के बाद दिन पूरा कर के वापस आये रेल के डिब्बे में।

आगे की कहानी फिर कभी।

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