बच्चों के साथ रेल तथा अन्य यात्रायें
- kewal sethi
- 2 hours ago
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बच्चों के साथ रेल तथा अन्य यात्रायें
एक
बच्चों की मौसी मुरादाबाद में रहती थी। मौसा लोक निर्माण विभाग में थे। लांग वीक एण्ड वहॉं जाया जाये, यह सोचा। मौसा का इत्तलाह भी कर दी। शुक्रवार सुबह जब स्टेशन आये तो सोचा कि बच्चों को भारतीय रेल गाड़ी में तृतीय श्रेणी की पैसन्जर गाड़ी का अनुभव भी कराया जाये। हर छोटे स्टेशन पर रुकते हुये चलती है। थोड़ा बड़ा स्टेशन हो तो 'चाय गर्म' 'चाय गर्म' की आवाज़ें आती हैं। बीच में डिब्बे में ही मूंगफली बेचने वाले आते हैं। उन की मूंगफली बिकती भी है और वहीं खाई भी जाती है। बाल उगाने वाली जादू वाले तेल को बेचने के लिये सुरमय विवरण सुनने को मिलता है। और हां, एक आध भिखारी भी आ ही जाता है यात्री गण के धार्मिक भावना का परीक्षण करने के लिये।
इन्हीं सब का लुत्फ उठाते हुये मुरादाबाद पहुंचे। स्टेशन से बाहर निकले। मौसा को बता तो दिया था पर न वह न ही उन की कार दिखी। चलिये, कोई बात नहीं। तांगा लिया और उन के घर पर पहुॅंच गये। उतरे तो मौसा और मौसी हैरान। ‘‘अरे हम तो स्टेशन लेने गये थे। इतना इंतज़ार किया। दिखे ही नहीं। क्या हुआ’’। वास्तव में हमारी गाड़ी के पहुॅंचने से लगभग बीस पच्चीस मिनट पहले दिल्ली से एक एक्प्रैस गाड़ी मुरादाबाद आती थी। वे उसी को देखते रह गये और हम पैसन्जर ट्रेन का मज़ा ले रहे थे।
दो
सरकार ने एक योजना चालू की। हर चार साल में एक बार भारत में कहीं की भी यात्रा परिवार के साथ सरकार के खर्चे पर करो। (दो साल के अन्तराल में होमटाउन भी जा सकते थे सरकारी खर्च पर)। तो एक बार दिल्ली से मुम्बई जाने का विचार बना। मुम्बई में बच्चों के चाचा रहते थे। दिल्ली से भोपाल की टिकट बुक कराई। निश्चित समय पर भोपाल पहुंच गये। वहां से बस पकड़ीं। उन दिनों यह वाल्वो जैसी बसें नहीं होती थीं। एअर कण्डीशन वाली। साधारण बस। आराम से चलती थी। रास्ते में रुकते हुये। सोनकच्छ में मावा बाटी खाते हुये चले। भोपाल से इंदौर आये।
इंदौर से हवाई जहाज़ की टिकट खरीदी थी। एक ही एअरलाईन थी इण्डियन एअर लाईन और जहाज़ था एवरो। छोटा सा। पांच या छह हज़ार फुट की ऊंचाई पर उड़ने वाला। खिड़की से नीचे का लैण्डस्केप साफ दिखता था, पहाड़, नदी, सड़क। आज कल की तरह नहीं कि बीस हज़ार फुट की ऊंचाई और सिर्फ बादल दिखें। और एक बात। जहाज़ था दिल्ली से इ्रदौर और इंदौर से मुम्बई। अभी कम्प्यूटरयुग दूर था। सीट एलाटमैण्ट दिल्ली में तो हो जाता था पर इंदौर में नहीं। इंदौर में जो जगह खाली देखो, बैठ जाओ। बच्चों को कहा लाईन में सब से आगे रहो। जहाज़ में चढ़ो और दायीं तरफ की खिड़की वाली सीट पर कब्ज़ा करो। क्यों? जब मुम्बई के पास पहुूंचे गे तो दायीं तरफ से सागर दर्शन हों गे। बायीं ओर तो केवल बिल्डिंग दर्शन हों गे। शायद सागर देखने का पहला ही अनुभव था।
लौटते में तो सीधे रेल गाड़ी से दिल्ली लौट आये।
तीन
दिल्ली में नियुक्ति के समय तो कार बेच् दी और मोपेड से काम चलाया। दिल्ली में तो इतने अफसर और वी आई पी होते हैं कि हम गिनती में नहीं आते। पर भोपाल आये तो हम वरिष्ठ अधिकारी बन गये और इस कारण कार रखना आवश्यक हो गई। नई की तो हैसियत नहीं थी इस कारण सैकण्ड हैण्ड ली। अब यह पता नहीं कि किस तरह हम ने डाज कार खरीद ली। बड़ी सी। उस में खासियत यह थी कि डीज़ल का इंजिन लगा दिया गया था। चलने में किफायत ही किफायत। कुछ समय बाद ग्वालियर नियुक्ति हो गई।
एक बार फिर एल टी सी लेने का विचार आया। और वही मुम्बई का रुख किया। कार से चले। ग्वालियर से इंदौर। रात को वहीं रुके। एक मित्र डाक्टर विजय सिंह ने गाड़ी देखी और आश्चर्य व्यक्त किया कि इस पर मुम्बई जा रहे हैं पर अपना कानफीडैंस उस समय चर्म पर था इस कारण चल दिये। गाडी में हार्न को छोड़ कर सब पार्ट बजते थें। नहीं, हार्न भी बजता था पर केवल अन्दर वाले ही सुन सकते थे। इस कारण एक भांपू ले लिये जिस का दबाने तथा बजाने की डयूटी बच्चों की थी।
मुम्बई पहुंच गये। ठहरे और फिर वापस वलने की हुई। ख्याल आया कि खलघाट की चढ़ाई यह कार चढ़ पाये गी कि नहीं। इस कारण रास्ता बदल का सूरत बडौदा होते हुये चले। रात तक गोधरा तक पहुंच गये। गोधरा अभी तो बहुत मशहूर या बदनाम है कारसेवकों को ज़िंदा जला दिये जाने के कारण पर तब सिर्फ एक पड़ाव था रास्ते में। दूसरे दिन चले और इतमीनान हुआ जब मध्य प्रदेश में प्रवेश किया। यहॉं तो कार खराब होने पर मदद मिल ही जाये गी। पर कार चलती रही और शाजापुर तक आ गये। शाम हो गई थी अतः वहीं रुके।
दूसरे दिन चले और गुना तक आ गये। आयुक्त थे तो गुना अपने ही इलाके में आता था। और किस्मत देखिये कि गाड़ी खराब हुई गुना से निकलने के साथ ही। कलैक्टर को फोन किया, सरकिट हाउस में रुके। कलैक्टर के आदमियों ने कार ठीक कराई और ग्वालियर लौट आये। इस सारी यात्रा में डीज़ल पर खर्च हुआ केवल सात सौ रुपये। फासला लगभग ग्यारह सौ किलो मीटर एक ओर का। तैंतीस पैस प्रति किलोमीटर।
प्रसंगवश जानना चाहें गे कि अन्ततः उस डाज का हुआ क्या। एक बार शासकीय दौरे पर उस में उज्जैन गये। वहां के आर टी ओ से वाकफियत थी। उसे बेचने को कहा और गाड़ी वहीं छोड़़ दी। कुछ दिन बाद उस ने फोन किया कि उन्नीस हज़ार मिल रहे हैं। मेरी प्रतिक्रिया थी - यह तो बहुत कम हैं। बढ़ाने का प्रयास करो। अंतिम वाक्य था - न बढ़ा सको तो उन्नीस पर ही निकाल दो।
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