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मध्यस्थता

  • kewal sethi
  • 4 days ago
  • 3 min read

मध्यस्थता


कर्नाटक राज्य में एक आई ए एस अधिकारी और एक आई पी एस अधिकारी में आपस में टकराव पैदा हो गया। दोनों ही महिलायें थीं, इस कारण सम्भवतः जनता में इस में विशेष रुचि थी। बात सार्वजनिक हो गईं। दोनों ने एक दूसरे पर आरोप लगाये। प्रकरण भी दायर हुये। मामला चलते चलते सर्वोच्च न्यायलय तक पहुॅंच गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने अब सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत जज को मध्यस्थता के लिये नियुक्त किया है। प्रश्न यह है कि इस जज की सेवाओं के लिये भुगतान कौन करे गा। वह निशुल्क अपनी सेवा देने से तो रहे। सामान्य तौर पर जि पक्षों में मध्यस्था होती है वही भुगान करता है और सामान्य सिद्धांत यह हे कि दोनों का हिस्सा बराबर बराबर हो गा।

मुझे लगता है कि जब तक निर्णय हो पाये गा तब तक दोनों पक्ष सेवा निवृत्त हो चुके होें गे तथा उन की जमापूॅंजी भी समाप्त हो जाये गी।

मुझे एक प्रकरण याद है। मध्य प्रदेश में साल बीज का विक्रय का ठेका एक पक्ष को दिया गया। जब इस इकरारनामे को समाप्त करने का प्रश्न आया तो वह पार्टी अदालत में चली गईं होते होते मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया। और सर्वोच्च न्यायालय ने एक सेवानिवृत सर्वोच्च न्यायालय के जज को मध्यस्थ नियुक्त कर दिया। मध्यस्थता ने सब से पूर्व तो यह कहा कि जब तक निर्णय नहीं होता है वन विभाग पुरानी दर पर ही साल बीज देता रहे गा।

मध्यस्थत को छह महीने में निर्णय करना था पर तारीख पर तारीख पड़ते पड़ते तीन साल गुज़र गये। हर बार सर्वोच्च न्यायालय मध्यस्थता की अवधि छह महीने के लिये दोनों पक्षों की सहमति से बढ़ा देता। निर्णय के लिये पक्षकार को जल्दी नहीं थी। जब साल बीज का बाज़ार भाव 1800 3पये था, उसे पुरानी दी 60 रुपये पर साल बीज मिल रहा था।

एक बार सरकार ने मुझे वन सचिव बना दिया। जब अवधि बढ़ाने का प्रष्न आया तो मैं ने कहा कि हम इस की सहमति नहीं दें गे क्योंकि बहुत हानि हो रही है। अब प्रकरण गया सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष। अब कठिनाइ्र यह हुई कि कोई नामी वकील हमारा पक्ष प्रस्तुत करने के लिये तैयार ही न हो। सभी के शायद यह था कि यह तो सर्वोच्च न्यायालय केसेवानिवृत जज का मामला हे तथा उस की सेवायें समाप्त करने के तर्क को सर्वोच्च न्यायालय प्रसन्न नहीं हो गा। आखिर में हमें एक सŸार वर्षीय वकील मिला जो केरल से था और उतना नाम नही था जितनी हम अपेखा करते थे। पर वह उपस्थिति हुआ और वन विभाग मध्यस्ािा समाप्त करवाने में सफल हुआ।

यही स्थिति इन दो महिला अधिकारियों की न हो, इस के लिये आषा तथा प्रार्थना करना हो गी।


अब मध्यस्थता का प्रश्न आया हे तो ऐ आप बीती ओर सही।

सड़क निर्माण निगम ने सड़क बनाने का एक इकरारनामा 2007 में समाप्त कर दिया क्योंकि उन का तर्क था कि ठेकेदार कम्पनी समय भीतर यह कार्य पूरा नहीं कर पा रही। मामला मध्यस्था मे आ गया। इकरारनामे के अनुसार दोनों पक्षों को एक एक मध्यस्थ चुनना था और उन दोनों के द्वारा तीसरा जो कि मध्यस्थ ट्रीब्यूनल का अध्यक्ष हो गा। वर्ष 2013 में मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ।

समय पा का निर्णय निगम के विरुद्ध हुआ। इस पर से वह उच्च न्यायलय में चले गये। उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप से इंकार किया तो निगम सर्वोचच न्यायालय में चला गया। इस का निर्णय अब वर्ष 2026 में आया है जिस में उच्च न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया गया है।

इन दो प्रकरणों का, जिन का सन्दर्भ मेरी भागीदारी के कारण था, बताने का मकसद यही है कि मध्यस्थता से बचना उतना ही महत्वपूर्ण जिना अदालत के किसी प्रकरण से। समय और धन दोनों ही को गंवाने की कोई सीमा नहीं है।

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