होशंगाबाद -- आत्म कथा
- kewal sethi
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होशंगाबाद -- आत्म कथा
अपने बारे में लिखना कष्टदायक है। अपनी बुराई तो की नहीं जा सकती। दूसरे के काम की बुराई करना अर्थहीन है क्योंकि कोई दूसरे के मन की बात नहीं जान पाता। परिस्थितियॉं अलग होती हैं, पृष्ठभ्रूमि अलग होती है। इन सब कमियों के बावजूद अपनी कहानी बताना आकर्षक लगता है। इस लिये बिना किसी से पूर्व अपेक्षा के माफी मांगे, यह लेख प्रस्तुत है।
पहला प्रश्न तो यह है कि इसे आरम्भ कहां से किया जाये। इस के लिये तो परिवार का इतिहास लिखना पड़े गा पर उस में किस को रुचि हो गी।
आखिर इस नतीजे पर पहुंचा कि आई ए एस में आने के साथ आरम्भ किया जाये पर उस में भी यह बताना आवश्यक हो गा कि हम इस में आये कैसे। पिता शासकीय सेवक थे तथा कोई तकनीकी प्रकार की डिग्री - चिकित्सा, यांत्रिक इत्यादि - तो थी नहीं। इस कारण शासकीय सेवा ही विकल्प रह जाती है। और आई ए एस सब से उच्च स्तर की शासकीय सेवा है अतः इस के लिये प्रयास करना आवश्यक था।
परीक्षा पास करना तो कठिन नहीं था पर साक्षात्कार की अलग बात थी। साक्षाक्तार का भी अपना अलग जलवा रहता है। हो सकता है कि यह मेरा वहम हो पर देखने में आया है कि आप सैंट स्टीफन या प्रैसीडैंसी कालेज जैसे महाविद्यालयों से हो तो 400 में से 320 अंक तो पक्के है। उस ज़माने में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की भी धूम थी तो 250 अंक तो पक्के हैं। बाकी आप सरकार में सहायक पद पर हैंं तो साक्षात्कार पार करना कठिन है। वास्तव में यह शिकायत इतनी आम हो गई कि सरकार को तथा संघ लोक सेवा आयोग को साक्षात्कार में पहले तो इस के अंक कम किये और फिर न्यूनतम अंक लेने की अनिवार्यता को समाप्त करना पड़ा।
जहां तक मेरा प्रश्न है, मुझे शासकीय सेवा छोड़ना पड़ी क्योंकि वह आई ए एस की फार्म ही नहीं भेजने दे रहे थे। सौभाग्यवश महाविद्यालय में व्याख्याता पद पर नियुक्ति हो गई। पर उस से अधिक सौभाग्य की बात यह रही कि विद्वान साथी भी मिल गये। इन में एक श्री के बी स्कसैना थे जो 1964 में आई ए एस में आ गये, श्री मेहता थे जो राजस्थान में आई पी एस में आ गये, श्री पी सी वर्मा थे जो बाद में आई आई एम अहमदाबाद में चले गये और श्री माथुर थे जो बाद में सिंगापुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बन कर चले गये। हम लोग अकसर शाम को बैठते और बतियाते थे। इन की सोहबत का असर हुआ और साक्षात्कार भी पार हो गया।
मसूरी पहुॅंचे तो अपने को सब से पुराने ब्लाक, जिसे न्यू ब्लाक के नाम से जाना जाता था, में कमरा मिला। जो पुराने थे अर्थात पहले मसूरी किसी अन्य सेवा में होने से आये थे, की जान पहचान थी तो बेहतर होस्टल में रहे। कुछ सम्भ्रान्त परिवार से थे तो वह भी हैपी वैली में स्थान पा गये।
चार दिन मसूरी रहने के बाद कश्मीर सैना के साथ प्रशिक्षण में चले गये। लौटे तो दूसरी केन्द्रीय सेवाओं के अधिकारी भी आ गये। कमरे में दूसरे साथी श्री वारियर थे जो रेलवे सर्विस में थे। पांच महीने के बाद अन्य सेवा वाले अपने विभागीय प्रशिक्षण संस्थान में चले गये औ आई ए एस वाले एक डेढ़ महीने के भारत दर्शन पर। बाद में छह महीने और मसूरी में। इस अवधि के बारे में खास लिखने की सामग्री तो हैं, पर उसे छोड़ देते हैं। अपने को मध्य प्रदेश राज्य आबंटित हुआ या मध्य प्रदेश राज्य को हम अलाट हुये। उस की कहानी है।
जब आई ए एस की फार्म भरे तो 1962 में यह नियम था कि उस में वांछित सर्विस का क्रम भी देना पड़ता है तथा आई ए एस होने पर वांछित राज्य का क्रम भी बताना पड़ता है। मेरी पहली प्राथमिकता विदेश सेवा की थी। जैसा कि मैं ने अन्यत्र कहा है अपने को इस का कोई अन्दाज़ नहीं था कि यह वरिष्ठ सेवायें होती कैसी हैं और न ही मार्ग दर्शन प्राप्त हो पाया। देने वाला था ही नहीं कोई वाकिफ। क्यों नहीं था, इस के लिये तफसील में जाना पड़े गा पर यह उस का स्थान नहीं है। खैर, पहली प्राथमिकता होने से हमें विदेश मन्त्रालय में ब्रीफिंग के लिेय बुलाया गया। 2 मई 1963 का किस्सा हैं। उस में क्या हुआ, यह तो याद नहीं पर प्राथमिकता बदल कर आई ए एस कर दी। हमारे से नीचे एक को आई एफ एस मिल गई।
अब प्रश्न था राज्य की प्राथमिकता का। उस में मैं ने पंजाब को पहली प्राथमिकता बताई थी। आखिर पंजाबी होने के नाते यह स्वाभाविक ही था। पर जब आई ए एस में आ ही गये तो गम्भीरता से सोचना आरम्भ किया। उस समय प्रताप सिंह कैरों पंजाब के मुख्य मन्त्री थे। उन के भ्रष्टाचार के किस्से काफी थे। मुझे लगा कि यह अपने माफिक नहीं आये गां। इस कारण प्राथमिकता बदल कर राजस्थान प्रथम कर दिया। अब एक और नियम आड़े आ गया। नियम था कि किसी वर्ष में राज्य में जितने अधिकारी वाहिये उन में से आधे राज्य के निवार्सी और आधे बाहर के हों गं। उस वर्ष केवल दो ही व्यक्ति राजस्थान में चाहिये थे, एक श्री मेहता राजस्थान के और दूंसरे अरुण कुमार बाहर के चुने गय्रे। मुझे दूसरी प्राथमिकता का राज्य मिला जिस में छह चाहिये थे और मध्य प्रद्रेश का कोई भी सूची में नहीं था।
खैर, यह तो हो गया। प्रशिक्षण के बारे में लिखने की आवश्यकता नहीं है। श्री ए एन झा, जिन्हों ने अधिष्ठापन वक्तव्य दिया का कहना था कि जो हम मसूरी में पढ़ें गे, वह किसी काम नहीं आये गा परन्तु जो एक दूसरे से सीखो गे, वह काम आये गा। इस कारण मैं सीधे समापन पर आ जाता हूॅं। पर एक बात बताना है। मसूरी में ही यह आद्रेष मिल्रे कि हमारा प्रषिक्षण होशंगाबाद जिले में होगा। और यह भी स्पष्ट आदेश दिये गये कि सीधे अपने ज़िल्रे में जायें। भोपाल न आयें। संयोग से उसी दिन ज़िला आबंटन के आदेश बिहार से भी आये। उस पत्र में कहा गया था कि पहले पटना आयें ताकि आप की भेंट वरिष्ठ अधिकारियों से कराई जा सके। इस प्रकार पहला कटु अनुभव अपने राज्य का हुआ। आगे तो लाईन लग गई पर वह बाद में अपनी जगह।
हमारा मसूरी प्रशिक्षण 27 मई 1964 को समाप्त हुआ और उसी दिन प्रधान मन्त्री श्री जवाहर लाल नेहरू की जीवन यात्रा भी समाप्त हुई। अगले दिन हम टैक्सी से दिल्ली आये। रास्ते में चाय की दुकान तक नहीं खुली थी। हमार्रे पहल्रे प्रधान मन्त्री नहीं रहे, इस का ग़म था।
अपना जायनिंग समय ले कर होशंगाबाद पहुॅंच गये। वैसे तो कलैक्टर को अपने आगमन के बारे में लिखा था पर उस दिन कोई स्टेशन पर नहीं आया जैसी कि अपेक्षा थी। वास्तव में हुआ यह था कि श्री नेहरू की अस्थि विसर्जन पवित्र नर्मदा नदी में उस दिन किया जाना था। मुख्य मन्त्री भी आये थे और केन्द्रीय मन्त्री भी। इस में सहायक कलैक्टर को कौन पूछता।
इत्तफाक से हमारे पास जो सामान था, उस का वज़न स्टेशन पर किया गया। तीस किलो होना चाहिये था पर निकला 31 किलो। अतिरिक्त भाड़ा लगे गा, बताया गया। दो किताबें निकाल का हाथ में रख लीं और वज़न 30 किला कर लिया। वहां से निपटे तो बाहर आये। तांगा लिया। सरकिट हाउस में स्थान होनें का सवाल ही नहीं था, तांगे वाले ने बताया सो वह हमें रैस्ट हाउस पर छोड़ गया। सौभाग्य से वहां कमरा मिल गया।
होशंगाबाद में हमारे पहले मिलने वाले अधिकारी थे श्री कपूरिया, ज़िला सूचना अधिकारीं। और उन्हों ने बताया कि मैं यह न बताउॅं किसी को कि मैं पंजाबी हूॅं क्योंकि यहां पर लोग पंजाबियों को पसंद नहीं करते। इस का परिणाम यह हुआ कि जब कलैक्टर कार्यालय में हमारा परिचय अन्य अधिकारियों से कराया गया तो सब से पहले मैं ने अपने पंजाबी होने की घोषणा की और वह भी शुद्ध पंजाबी, पाकिस्तान रिर्टन या पाकिस्तान निष्कासित।
होशंगाबाद में उस समय कलैक्टर थे श्री रामनाथ सिंह बल्कि कहना चाहिये ठाकुर राम नाथ सिंह। वह विन्ध्य प्रदेश में बघेल खण्ड के थे। बताया जाता है कि जब विन्ध्य प्रदेश का मध्य प्रदेश में विलय होना था तो रातों रात कई अधिकारियों को पदोन्नति दे कर उप कलैक्टर बना दिया गया। नये मध्य प्रदेश में वह काफी वरिष्ठ हो गये। ऐसा इत्तफाक रहा कि मुझे उन में कई के आधीन काम करना पड़ा। होशंगाबाद में ठाकुर राम नाथ सिंह, ग्वालियर में श्री आर पी तिवारी, इंदौर में पहले श्री राम बिहारी लाल तथा बाद में श्री के एल अग्रवाल। होशंगाबाद उन दिनों भोपाल सम्भाग में था और आयुक्त थे श्री पी डी चैटर्जी, भूतपूर्व विन्ध्य प्रदेश के। बाद में वित्त विभाग में श्री तिवारी। यह शिकायत नहीं है, केवल तथ्य बताया है। इन के कारण कोई कष्ट नहीं हुआ। मेरे पहले डायरैक्ट आई ए एस वाले अधिकारी थे श्री वर्मा तो 1969 में संचालक उद्योग थे और मैं अतिरिक्त संचालक उद्योग बना था।
तो कलैक्टर साहब से दूसरे दिन उन के घर के कार्यालय में मिले। परिचय दिया तो उन्हों ने कहा एक और डायरैक्ट रिक्र्रूट भी हैं चक्रवर्ती। मन प्रसन्न हुआ कि एक हम उम्र साथी तो हो गा। उस के बाद कार्यालय आयें, परिचय कराया गया या कहना चाहिये कि मैं ने अपना परिचय दिया। पता लगा कि चक्रवर्ती सीधी भर्ती वाले तो थे पर आई ए एस नहीं वरन् डिप्टी कलैक्टर। थोड़ी निराशा हुई। पर एक पुलिस ए एस पी थे श्री डी पी खन्ना - 1962 बैच के - और उसी वर्ष आये थे माउण्ट अबु में प्रशिक्षण के बाद। तो एक हम उम्र अधिकारी तो मिल ही गया। उन के साथ अच्छी निभी और अभी तक निभ रही है।
तजरबेकार लोगों ने बताया था कि स्वागत हो गा, बंगला हो गा, बंगले में चपड़ासी हों गे, इत्यादि। पर न तो स्वागत हुआ, न ही बंगला मिला। रहें कहॉं। ऐसे में कपूरिया साहब ने मदद की और अपने मकान की बगल में एक मकान दिला दिया। मकान कहेें या खोली, यह थोड़ा भ्रम हैं। वैसे दो कमरे थे। बैठक और शयन कक्ष। और पीछे छोटी सी रसोई। बैठक सीधे सड़क पर खुलती थी। कमरो का नाप हो गा सात बाई सात फुट का। रसोई थी पॉंच बाई पॉंच फुट की। चलिये कुछ तो था।
इस से पहले कि आगे बढ़ें, होशंगाबाद का परिचय करा दें। यह एक कविता के माध्यम से हैं। पूरी कविता तो कहीं खो गई है पर इस की कुछ लाईनें मुझे और श्री खन्ना को अभी भी याद हैं। पेश है -
this bloody town is big bloody cuss
nobody cares for bloody us
in bloody hoshangabad
no bloody roads no bloody drain
committee has no bloody brains
in bloody hoshangabad
no bloody park to walk to
no bloody girl to talk to
in bloody hoshangabad.
the bloody movies are bloody old
the bloody seats are bloody cold
in bloody hoshangabad
मेरे कुछ साथी अधिकारी बताते थे कि उन के कलैक्टर उन्हें अपने कमरे में बिठा कर ज़ि़ला प्रषासन के बारे में बताते थे पर होशंगाबाद में यह बात नहीं थीं वैसे श्री सिंह साहब ऊॅंचे, लम्बे, डील डौल वाले थे, शिकार के शौकीन, दबंग व्यक्तित्व। दफतर में, लिखने पढ़ने में रुचि कम थी। किंवदंती थी कि केस सुनते थे तो यह कहते थे कि यह जीता, यह हारा। फैसला उन का होता था, लिखने का काम रोडर करता था। हमारे असली प्रशिक्षक तो थे श्री यू एस धगत, अनुविभागीय अधिकारी, होशंगाबाद। उन के साथ ही जो सीखा, सो सीखा। श्रीमती धगत भी बहुत मिलनसार थीं और यह बात उन के बेटे और बेटियों में भी थी। अक्सर उन के यहां बैठना होता था।
ज़िले में केवल इटारसी ही उस समय कष्टदायक स्थान था। कभी छात्र समस्या, कभी श्रमिक समस्या। वहॉं पर नायब तहसीलदार का कार्यालय था जो नियन्त्रण कक्ष का काम करता था। हफते दस दिन में वहॉं जाना ही होता था। उस के सामने ही पूनम सिनेमाघर था। नियन्त्रण कक्ष में तो केवल प्रतीक्षा ही करना होती है और समाचार पर नज़र रखना होती है। बजाये दफतर में बैठने के हम पूनम सिनेमाघर में बैठ जाते थे। दो कुर्सियॉं हमारे लिये बालकनी में डाल दी जाती थीं। मुझे याद है कि संगम नाम का चलचित्र हम ने चार किस्तों में देखा था (और षायद पूरी भी नहीं देख पाये थे) क्योंकि बीच में कई बार उठना पड़ता था जब कोई खबर आती थी कि हमारी ज़रूरत वहॉं है।
वैसे होषंगाबाद में भी एक टाकीज़ थी - बसन्त टाकीज़। उस के बारे में बताया जाता था कि बरसात में उस में छाता ले कर जाना पड़ता था। मैं शायद एक ही बार गया और तब बरसात नहीं थी। पूनम सिनेमाघर की तरह कुर्सी नहीं डालनी पड़ी थीं क्योंकि खाली ही मिला था।
पाकिस्तान बनने के बाद बहुत से लोग अपना घर भार छोड़ कर भारत आये थे। पश्चिम पाकिस्तान से पंजाबी और सिंधी। वे अपने को शरणार्थी के स्थान पर पुरुषार्थी कहलवाना पसंद करते थें। जहां कही भी मौका मिला, वह अपने काम धंधे में लग गये, छोटा या बडा, पर काम होना चाहिये। पॉंच एक साल में कोई भी किसी कैम्प में नहीं था। पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले बंगाली थे, मुख्यतः कृषक या कृषि मज़दूर। अब पश्चिम बंगाल में ज़मीन तो थी नहीं जो उन को बसाया जाता तो उन्हें दूसरे राज्यों में भेजा गया। कुछ होशंगाबाद ज़िले में भी भेजे गये। बंगाली शरणार्थियों को बसाने का काम उन दिनों चल रहा था। रानीपुर नाम के स्थान पर उन का कैम्प बनाया गया था। बंगाली तो पानी के करीब रहने के आदी थे। उन्हें होशंगाबाद की जलवायु पसंद नहीं आती थी। भाग कर वापस बंगाल जाना चाहते थे। यह कशमकश चलती ही रहती थी। एक बार जब वहॉं पत्थर बाज़ी हो रही थी, धगत साहब वहां गये और प्रशिक्षण के लिये मैं भी साथ था। गये तो पुलिस कुछ कर नहीं पा रही थी क्योंकि क्षेत्र काफी फैला हुआ था और सिपाही गिनती के थे। कहीं इकठ्ठे होते तो लाठीचार्ज हो सकता था पर वे तों अपनी झोंपड़ियों से ही पत्थर फैंक रहे थे। और झोंपड़ियां भी बांस की थीं। अब बात हुई कि एकाध गोली चलायें तो शायद पत्थर बाज़ी समाप्त हो। अभी सोच ही रहे थे, तभी वहां पर श्री कदम - एस पी साहब - आ गये। बोले - पागल हुये हो क्या। एक आध अपनी झोंपड़ी में ही घायल हो गया तो। लेने के देने पड़ जायें गे। यह भी प्रशिक्षण का ही भाग था। वह इरादा तो समाप्त हो गया और अब सिवाये प्रतीक्षा के दूसरा रास्ता नहीं था। दूर खड़े हो कर लाठी धुमाते रहो। आखिर बंगाली भाई थक कर स्वयं ही वापस झोंपड़ियों में चले गये।
बंगाल जाने का मन सदा रहता ही था तो एक बार समूह में रानीपुर के पास के स्टेशन बागड़ा तवा की ओर चल दिये। समाचार मिला तो बागड़ा तवा पहुॅंचे ताकि उन्हे समझा कर या धमका कर वापस रानीपुर भेजा जाये। मश्किल काम नहीं था ओर आराम से हो गया।
इटारसी का ज़िकर किया। वहां की श्रमिक तथा छात्र समस्या के अतिरिक्त एक और भी बात थी जिस का सीधा सम्पर्क ज़िला प्रशासन से नहीं था। यह थी रेलवे वैगन से चोरी। इस के लिये बाकायदा गैंग थे। सब से बदनाम था लक्षमी गैंग। लक्षमी का नाम ऊपर आ चुका है। धड़ल्ले से उन का काम चल रहा था काफी समय सें। पर रंगे हाथों पकड़ा नहीं जा सका।
वैगन ब्रेक्रिग के अतिरिक्त लक्षमी गैंग का दूसरा धन्धा था अवैध शराब का। होशंगाबाद उन दिनों ड्राई क्षेत्र था अर्थात शराबबन्दी थी। धन्धा काफी ज़ोरों में था। पर पकड़ाई नहीं दे रहा था। एकाध कारिंदा पकड़ा भी गया तो कोई बात नहीं। गवाही देने वाला ही कोई नहीं था।
कलैक्टर श्री सिंह दबंग व्यक्ति थे। ऊंचे लमबे तगड़े व्यक्ति। एक बार वह अपनी जीप पर जो वे खुद ही चला रहे थे, उस मौहल्ले में चले गये जिस में लक्ष्मी रहता था। कहा - लक्षमी कौन है। लक्ष्मी सामने आ गया। उस से कलैक्टर साहब बोले - देखो, शहर में एक ही गुण्डा रह सकता है। समझ लो। और इतना कह कर लौट आये।
घाटे साहब पुलिस अधीक्षक थे। उन का बेटा था विष्वास घाटे। हमारी उम्र का ही था। वह, खन्ना और मैं अक्सर बैठते थे। उन का एक किस्सा याद है। एक दिन घर पर बैठे थे तो खाने की प्रतियोगिता आरम्भ हो गई। कोई कम नहीं था। बेचारा खाना बनाने वाले पर बोझ आ गया। मुकाबला तब खतम हुआ जब आटा ही घर में खतम हो गया। उस के बाद एक किलो गुलाब जामुन बुलाये गये। मुकाबला बराबरी पर छूटा।
खैर, घाटे साहब गये तो कदम साहब आये। वह भी सख्त आदमीं। कार्य में दक्ष। ऊपर उन का ज़िकर आया ही हैं। एक दिन कलैक्टर और पुलिस अधीक्षक ने लक्ष्मी को उड़ा ही दिया। उस के बाद बाकी गैंग भी दब कर रहने लगे।
इधर अपना प्रशिक्षण चल ही रहा था। अलग अलग शाखा में जा कर वहां का काम समझना। तृत्रीय श्रेणी मैजिस्ट्रेट के अधिकार मिले और कुछ छोटे प्रकरण सुने भी। सर्वे का काम भी सीखा। पटवारी का भी। एक गांव था होशंगाबाद के पास ही, वहां पर गिरदावरी का काम सीखने गये। जो पटवारी था, उस के बारे में दो बातें याद हैं एक उस की हैण्ड राईटिंग। इतनी बढ़िया कहीं कहीं ही देखने को मिलती हैं। क्या खसरा, क्या दूसरा लेख। देख कर ही आनन्द आता था। दूसरे उस ने ज़मीन की पैमाईश करने का भी बताया। सामान्यतः बड़े अधिकारी के बारे में पता होता है कि यह सब तो औपचारिकता है। दूर से खेत दिखा दिया। पटवारी भी खुश और अधिकारी भी और डायरी में लिख लिया कि प्रशिक्षण हो गया। अब यहां पटवारी भी निष्ठावान और सीखने वाला भी। वास्तविक काम हुआ। उस में मैं ने कहीं कह दिया कि यह नकशा सही नहीं लगता। पटवारी को बहुत गुस्सा आया। दो घण्टे तक उस ने पूरी मेढ़ नापी और नपवाई, यह बताने के लिये कि कोई गलती नहीं है। नाम था उस का राम गोपाल जो अभी तक याद है।
गिरदावरी के अतिरिक्त सर्वे का काम भी सीखना होता है तथा उस की परीक्षा भी वहीं का ए एस एल आर ल्रे लेता है। मुझे अजीब सा लगा जब उस ने श्री धगत को बताया कि साहब ने खुद पैमाईश की है। और एक बार नहीं, दो तीन बार बताया। शायद ऐसा होता नहीं हो गा इस लिये उसे कहना पड़ा।
पटवारी के काम के बाद उस से अगले स्तर का काम सीखना था - राजस्व निरीक्षक का। उस के लिये मुझे भेजा गया बनखेड़ी। तीन दिन या दो रातें वहॉं रहा। बनखेडत्री अभी तो तहसील बल गई है पर तब एक छोटा सा गॉंव था। इतना छोटा कि उस में रहने के लिये केवल एक हट थी, एक कमरे की। और सुबह बाहर खेत पर ही जाना पड़ता था। नहाने के लिये पानी तो खैर कोटवार ला देता था। और बाहर ही नहा लिया जाता था।
इसी प्रकार कोषालय के प्रशिक्षण के पश्चात उप कोषालय के प्रशिक्षण के लिये भेजा गया सोहागपुर। वहां पर की एक बात याद है वहां का खानसामा, अंग्रेज़ों के ज़माने का। क्या बढ़िया खाना बनाता था। पर उसे कष्ट था कि मैं पूर्ण शाकाहारी था। उस का कहना था कि यदि मैं मीट खाता होता तो वह बहुत बढ़िया खाना खिलाता।
उन दिनों भोपाल तथा होशंगाबाद के बीच सड़क नहीं थी यानि कि नर्मदा पर पुल नहीं था। एक पुल बन रहा था पर उस के ठेकेदार श्री पुरी में और सार्वजनिक निर्माण विभाग के बीच मतभेद हो गया। श्री पुरी अदालत में चले गये और पुल निर्माण का काम रुक गया। उन दिनों में अदालतों की हालत इतनी बुरी नहीं थी जितनी आजकल है। किसी भी प्रकरण के लिये दशक लगने तो सामान्य बात है जिस के लिये पी आई एल समेत कई कारण है। उस ज़माने में लोग इतने अदालती होते भी नहीं थे। देर तो लगती थी ही पर पर उस देर से बचने के लिये आपसी समझौता भी हो जाता था। शायद इस का एक कारण यह भी था कि वकील लोग अभी उतने लालची नहीं थे। घरों के खर्चे अधिक नहीं थे औ ठाठ बाठ का आडम्बर भी कम था बल्कि आज के मुकाबले में था ही नहीं। पर आज तो ईश्वर बचाये कोर्ट के चक्कर से। फौजदारी मुकद्दमों का तो पूछो ही मत। पश्चिम बंगाल में एक प्रकरण में अपील हुई सैशन कोर्ट में। न जाने किस की गलती से फाईल इधर उघर हो गई। व्यक्ति कैद में था और कैद में ही रहा। जब किसी की गलती से फाईल मिल गई तो उसे रिहा किया गया। उस वक्त उस की उम्र 72 साल की थी। जब गया था तो 48 साल का था। ऐसे और भी उदाहरण मिल जायें गे पर वह आज का विषय नहीं है।
तो पुल निर्माणाधीन था और मेरे होते हुये और उस के बाद कई साल तक निर्माध्धधीन ही रहा। नर्मदा पार करने क लिय एक पोनटून पुल बनाया जाता था। उस पर से ट्रक और बसे आराम से आ जा सकती थीं। पर क्या करें बरसात आ गई और नर्मदा में अचानक बाढ़ आ गई। सब पोनटून बह गये। अब अगले साल फिर से ठेका हो गा, पुल बने गा। साथी अधिकारियों ने बताया कि यह बाढ़़ का रवैया है कि वह हर साल अचानक ही आती है। बता कर आये तो पोनटून हटाये जा सकते हैं। अगले साल फिर से इस्तेमाल किये जा सकते हैं। पर ठेकेदार की कमाई कम हो जाये गी। इस डर से बाढ़ हमेशा अचानक ही आती है। पानेटून हटाने का मौका ही नहीं देती। बेईमानी के अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता।
कायदा था कि विभागीय परीक्षा उच्च स्तर से पास करने पर ही अगली वेतनवृद्धि हो गी। जून में होशंगाबाद आये थे और सितम्बर में परीक्षा थीं भोपाल, संभागीय मुख्यालय में। राजस्व कानून के विषय में तीन पेपर थे। एक बिना किताबों के, दूसरा किताबों के साथ, तीसरा राजस्व प्रकरण में आदेश लिखने का। उन दिनों यह तीसरा प्रश्नपत्र प्रिण्ट हो कर नहीं आता था। प्रकरण की फाईल में से आदेश की प्रति निकाल का फाईल दे दी जाती था कि आदेश हमें लिखना है। हमारे हितकारियों ने हमें एक फाईल दिखा दी जो सोहागपुर तहसील के मोहन लाल के प्रकरण की थी। उस का आदेश भी दिखा दिया ताकि हम उसे परीक्षा में लिखें एवं पास हो जायें। इस से बढ़िया क्या बात हो सकती थी। सवाल भी मालूम और जवाब भी मालूमं। अलग अलग ज़िले से अलग फाईल आती थीं। परीक्षा में हम ने श्री स्क्सैना, आयुक्त के विकास सहायक, जो परीक्षा अधीक्षक थे, से कहा कि हमें मोहन लाल की फाईल दे दी जाये। परीक्षा की असलियत सब को पता थी, इस कारण उन्हों ने कोई हुज्जत नहीं की। मोहन लाल की फाईल हमें मिल गई। औपचारिकता के लिये उसे पढ़ना शुरू कियां समझ में नहीं आया। यहॉं तो धारा ही अलग थी। उलट पलट कर देखा तो पाया कि फाईल तो मोहन लाल की थी पर तहसील हरदा थी, सोहागपुर नहीं। सक्सेना जी को बताया पर तब तक सब फाईलें बट चुकी थीं। इस कारण हमें हरदा वाली फाईल पर ही आदेश लिखना पड़ा। पास तो हो गये और उच्च श्रेणी से और वेतन वृद्धि भी हो गई।
यहां एक बात और। मुख्यालय भोपाल आये तो कायदे के अनुसार मुख्य सचिव के प्रचलन हाज़िरी देने का प्रचलन था। सो वहॉं पर हाज़िर हो गये। करीब बीस मिनट बैठे और उस में से 18 मिनट श्री नरोन्हा, मुख्य सचिव, ने अपनी नई खरीदी पर्ल यामाहा मोपड के बारे में बताया। श्री नरोन्हा बड़े दिचस्प व्यक्ति थे। उन के किस्से लिखने बैठें तो समय लगे गा। वह फिर कभी। पर पर्ल के इस विवरण से इतना प्रभाव हुआ कि जब हरदा में नियुक्ति हुई तो मैं ने भी पर्ल यामाहा खरीद ली। 1965 से ले कर वर्ष 2023 तक मेरे पास हमेशा कोई न कोई दो पहिया वाहन रही।
डिप्टी कलैक्टरों से तो बात चीत थी ही। रोज़ उन के साथ चाय होती ही थी। परन्तु मैजिस्ट्रेट थे, उन से भी बात होती थी। वैसे तो एकाध ज़िला छोड़ कर मध्य प्रदेश मेें फौजदारी मुकद्दमे अलग हो गये थे पर आपसी बातचीत समाप्त नहीं हुई थी। अक्सर उन के यहॉं बैठना भी हो जाता था। इन में एक कुूंवर गणेष सिंह थे जो बहुत ज़िंदा दिल थ। उन के कुछ षेर याद है जिन का षीर्षक था ‘‘आधी गाल, पूरी बात’’। इन्हें लिखना तो उचित नहीं हो गा पर याद तो अभी तक हैं। मुद्दत बाद उन से मुलाकात हुई जब वह अतिरिक्त विधि सचिव बने पर वही बे-तकुल्फी तब भी थी।
कलैक्टर साहब का कहना था कि विकास खण्डों के और लाभ हुये हों या न हुये हो पर दो बड़े लाभ हुये थे। एक तो अनगणित नेता पैदा हो गये और दूसरे सब अफसरो्रं को जीप चलाना आ गई। इन जीप चलाने वालों में मैं भी षामिल था। विकासखण्ड अधिकारी थे श्री आर के वर्मा। उन की जीप उपलब्ध थी सीेखने के लिये। मसूरी में तो घुड़सवारी ही सिखाई जाती थी जिस के प्रषिक्षक थे श्री नवल सिंह। जाने कितने वर्ष से वह आई ए एस वालों को और अन्य केन्द्रीय सेवाओं के अधिकारियों को घुड़सवारी सिखा रहे थे। उन के दो किस्से मशहूर थे। एक तो यह कि वह घोड़ों की खरीद के लिये गये तो काफ़ी दिन लगा कर आये। पूछा गया तो उन का जवाब था, घोड़े चुनने थे साहब, कोई आई ए एस अधिकारी थोड़े चुनने थे। दूसरा, जो अपने सामने भी हुआ, जब कोई भी अधिकारी घोड़ा सम्भालने में कोताही करता था तो उन की आवाज आती थी - घोड़ा नहीं सम्भलता, ज़िला क्या सम्भालो गे। ज़ाहिर है कि उन के विचार में घोड़ा सम्भलना ज़िला सम्भालने से अधिक कठिन था।
घोड़ों में राजा और रानी नाम के घोड़े बहुत अच्छे थे। शांत, सुशील। कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं। नवल सिंह का कहना मानते थे। उस ने कहा कैण्टर और घोड़ा का कैण्टर आरम्भ। परन्तु पदिमनी और रश्मि अड़ियल थे। काबू करने के लिये मेहनत लगती थी। परीक्षा में रश्मि मिल गई पर चलो, पास तो हो गये। आंध्र प्रदेश के गौनेला प्रथम थे और मध्यप्रदेश के सुन्दर इत्हादी राव को अगले साल फिर जाना पड़ा पास होने के लिये।
श्री आर के वर्मा, किासखध्ड अधिकारी की एक बेटी और एक बेटा था। अपने पद की गरिमा के अनुसार उन का नाम रखा गया था - योजना और विकास। मेरा उन से अनुरोध था कि तीसरे बच्चे का नाम रखें प्रगति। वर्षों बाद जब मिले तो मैं ने पूछा कि प्रगति का क्या हाल है। बताया कि योजना और विकास ही रह गये, प्रगति तो हुई ही नहीं।
तो खैर, जीप तो विकासखण्ड की थी पर प्रशिक्षक थे श्री धगत। उन दिनों सड़कें बहुत कम चौड़ी होती थी। दो कारे मुश्किल से गुज़र सकती थीं। ट्रक और कार का तो सवाल ही नहीं। एक को नीचे उतरना ही पड़ता था। धगत जी का कहना था कि जीप चलाने में तीन चरण होते हैं। पहले चरण में तो सामने आने वाला ट्रक खुद ही रास्ता छोड़ देता था। दूसरे चरण में खुद ही जीप को उतारना पड़ता था। तीसरे चरण में ट्रक को मजबूर किया जाता था कि वह उतरे। परन्तु इस में अपवाद था। बारिष के दिनों में जब साईड पर कीचड़ हो जाता था तो ट्रक के उतरने का सवाल ही नहीं था। बाद में हमारे एस पी (दूसरे ज़िले में) ने बताया कि ट्रक वाले का कहना था कि आप फंस जाओ गे तो हम निकाल लें गे, हम फंसें गे तो?
तो कार चलाना सीख गये। रुतबा था तो घर बैठे लाईसैन्स भी मिल गया। बाद में कार खरीदी पर उस का किस्सा फिर कभी।
मैं ने बताया है कि जिस घर में मेरे को रहना पड़ा, वह खोली नुमा था, चलती सड़क पर, किसी सरकारी कालोनी या प्राईवेट कालोनी में नहीं। इस का परिणाम एक कविता में प्रकट हुआ जो इस प्रकार थी। इस का शीर्षक रखा था — चांदनी रात।
मेरे घर के सामने इक दर्ज़ी रहता है
सांझ से ही चलने लगती है उस की मशीन
चलती है जैसे कभी आसमान में चॉंद उभरा न हो
चलती है जैसे कभी धरती पर यौवन चॉंदनी का निखरा न हो
धरती पर जैसे कभी बहार आई न हो
जीवन ने जैसे कभी मलहार गाई न हो
कुछ टीस सी उठती है मन में
इस आवाज़ को जब मैं सुनता हूॅं
इक हलचल सी उठती है दिल में
मैं अक्सर खुद से प्रश्न करता हूॅं
खेतों में गंदम निखरी है
धरती पर चॉंदनी बिखरी है
हर स्थान बड़ा दिलकश दिलनशीं लगता है
नदी के शॉंत जल में शशि क्रीड़ा करता है
हर चीज़ है जैसे दूध में धुली हुई
हर शह में शहद हो जैसे घुली हुई
खुश है आज किसान कि उस की मेहनत का सिला
उसे मिलने वाला है
महीनों से व्रत जो उस ने पाला था
उस का परिणाम आज मिलने वाला है
मेरे घर के सामने इक दर्ज़ी बैठा रहता है
रात के बारह बजे
पर उस की वह मशीन
चल रही है उसी अंदाज़ में
दुःख होता है आवाज़ वह सुन कर
यह नहीं कि पड़ता है खलल कोई मेरे सपनों में
इस पूर्णिमा की रात में चॉंदनी है छिटकी हुई
नींद किसे आती है इस माहौल में
हर मकॉं बड़ा दिलकश बड़ा दिलनशीन लगता है
हर चीज़ जैसे आज दूध में धोई गई हो
नाचते हैं गॉंवों में जवान जोड़े
जीवन होगा अब अरमान भरा
मैं भी खो गया हूॅं कहीं दूर
जहॉं कर रहा है कोई मेरा इंतज़ार
लेकिन
यह मशीन गा रही है अपना करुण गीत
देखा मैं ने
इस चॉंदनी रात में भी टूट कर इक सितारा
आसमान से गिर गया
कितने युगों से जुड़ा था यह नगीने सा
आज हुआ खाना बदोश
गिरा अपने स्थान से
मेरा दिल भी जैसे धड़ाम से आ गया ज़मीन पर
इस मशीन के सोज़ भरे साज़ ने
ला दिया ज़मीन पर मुझे
इंसान आज खुश है
पर यह मशीन है इंसान नहीं
इस के लिये किसी दिल में कोई अहसास नहीं
इस के कुछ अरमान नहीं
नहीं मतलब इस को चॉंद से चॉंदनी से
दो वक्त की रोटी बस यही है तलब इसे
आवाज़ मशीन की झंझोड़ती मुझ को
क्या मुमकिन नहीं है कुछ समाधान इस का
क्या यही है इंसाफ ज़माने का
खून-ए-शहीदॉं रायगॉं हो जाये गा क्या
क्या यही थे अरमान जिस के लिये
भगवान ने अवतार लिये थे
क्या यही प्रजातन्त्र है जिसे आदमी से सरोकार नहीं
क्या यही वह शाम है बरसों से था जिस का इंतज़ार
क्या इसी लिये बनी थी चॉंदनी रातें
मशीन की आवाज़ में दब कर रह जायें
यह मशीन जो चल कर दिन रात
पेट न अपना भर सकती हो
क्या इस की सदा को दबाया जा सकता है
मेरी रूह यह मानती नहीं
मेरे अहसास इस की इजाज़त देते नहीं
इक रोज़ तो इस दुनिया को बदलना होगा
इक रोज़ तो यह दस्तूर बदलना होगा
खून न हो इंसानियत का हर रोज़
ऐसा कुछ तो करना होगा
इंसान को मशीन न बनना होगा
ए मशीन ठहर ज़रा
अब वह दिन दूर नहीं
भगवान भी इतना क्रूर नहीं
मेले में चलना फिर तू भी
लेकिन क्या वाकई ही ऐसा होगा
भगवान लें गे अवतार फिर
या फिर तुम को ही भगवान बनना होगा
खुद अपनी तकदीर बदलना होगा
(होशंगाबाद - फरवरी 1965)
इन्हीें दिनों ज़िले में नियुक्त डी एस ई (संभागीय शिक्षा अधीक्षक) का स्थानान्तर अन्यत्र हो गया। उन का मकान खाली होना था तो मैं ने सोचा कि सहायक कलैक्टर होने के नाते मेरी वरिष्टता इस के लिये सक्षम ठहराती है सो उस के लिये कलैक्टर साहब को इसे मुझे आबंटित करने के लिये कहा। परन्तु कलैक्टर साहब ने यह किसी और को आबंटित कर दिया और कारण बताया कि उस का परिवार है। मेरा सोचना था उस से क्या होता है। परिवार होने से एक या दो चारपाई और आ जाती हैं, बस।
मुझे बुरा लगा तो मैं ने दूसरे घर की तलाश आरम्भ की। एक मकान खाली दिखा, वह किराये पर ले लिया। उस में सात या आठ कमरे थे। उन के नाम मैं ने रविवार, सेामवार इत्यादि रखे। सामने एक बड़ा सा बरामदा था 50 फुट बाई आठ फुट का। और कम्पाउण्ड तो इतना बड़ा कि क्या कहें। किराया वेतन के हिसाब से ज़रा अधिक था पर उस से क्या। अपना खर्च ही कितना था। जब मैं ने उसे खाली किया तो उस के दो चार साल बाद वहां उस मकान में एक प्राईवेट पाठशाला खुल गई। इस से अन्दाज़ हो गा कि कितना बड़ा था।
नगर में एक कल्ब था वरिष्ठ अधिकारियों का। कल्ब क्या कल्ब सा था। उस में अक्सर ताश का खेल होता था। हमारे घर में तो ताश की बात ही नहीं होती थी पर मसूरी में थोड़े बहुत ब्रिज के नियम सीख लिये थे। परन्तु अपना ब्रिज का ज्ञान सीमित ही रहा। उस कल्ब में एक कार्यपालन अधिकारी थे श्री गर्ग - ब्रिज के शौकीन। अच्छे खिलाड़ी थे परन्तु श्रीमती गर्ग उन से अधिक अच्छी खिलाड़ी थीं। दोनों पार्टनर बनते थे तथा अक्सर श्रीमती जी उन्हें काफी डांटती रहती थी जब जीत नहीं होती थीं। परन्तु उन की जोड़ी सलामत रहीे। झगड़ा केवल ब्रिज की मेज़ तक सीमित रहा। आगे चल कर मेरी ब्रिज बिल्कुल छूट गई जब इस बात पर पार्टनर की डांट पड़ी कि एक ओवरट्रिक बन सकती थी। कॉंट्रैक्ट चार स्पेड का था और जैसे ही वह पक्का हो गया, सब पत्ते दिखा दिये। एक ओवरट्रिक बन तो सकती थी पर क्या ज़रूरत थी। ब्रिज छूटा तो उस के बाद रम्मी की बात हुई पर उस की बात फिर कभी जब हरदा की बात हो गी।
कलैक्टर साहब व्यवहारिक टाईप के व्यक्ति थे। साफगो। जब वृक्षारोपण की बात आई तो आयोजन हुआ। यह वार्षिक कार्यक्रम था जिस में सभी अधिकारी तथा जनता के कुछ प्रतिनिधि भी आते थे। समारोह का स्थान निश्चित था। पौध रोपण हुआ तो पुराने स्थान पर ही। कलैक्टर साहब ने कहा कि होना ही चाहिये। अगर पौधा वृक्ष बन गया तो अगले साल क्या करें गे, कहॉं लगायें गे। स्थान रहना चाहिये। वास्तविक कारण यह था कि पौधा लगाने के आदेश तो ऊपर से आते थे पर संधारण के नहीं। वह रह जाता था। बकरी खा गई या पानी के अभाव में सूख गया, यह बात गौण थी। स्थान अगले साल के लिये उपलब्ध था।
अपना प्रशिक्षण चल ही रहा था। उस समय हरदा के एस डी ओ श्री सत्यम की पदोन्नति हो गई और वह कलैक्टर बन कर जाने लगे। कलैक्टर साहब ने उन के स्थान पर मुझे हरदा का एस डी ओ्र बना दिया। मैं ने बताया कि अभी तो मेरा प्रशिक्षण बाकी है। तीन तहीने तो विकास खण्ड का प्रशिक्षण भी है परन्तु उन का कहना था कि वहीं हरदा में प्रशिक्षण प्राप्त कर लेना। वहां भी विकासखण्ड है।
और इस तरह मैं हरदा में उप संम्भागीय अधिकारी नियुक्त हो गया। उस की कहानी अगले किसी मौके पर। और कुछ याद आया कभी होशंगाबाद के बारे में तो जोड़ दूॅं गा।
(फरवरी 2026)
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