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संयोग

  • kewal sethi
  • Jan 1, 2024
  • 2 min read

संयोग


कई बार जीवन में कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें संयोग कहा जाता है। क्यों, कैसे, इस का विश्लेषण नहीं किया जा सकता। यह बात उसी के बारे में ही है।

पर पहले पृष्ठभूमि।

मेरे दादा का देहान्त उस समय हो गया था जब मेरे पिता छटी कक्षा में थे। वैसे तो वह बहुत रौअबदार और मालदार थे परन्तु कुछ ऐसी बात हुई कि देहान्त के समय माली हालत अच्छी नहीं थी पर उस की बात फिर कभी।

पिता जी के एक बड़े भाई थे, उम्र में काफी बड़े। पिता के देहान्त के बाद वह अचानक घर छोड़ कर चले गये। मेरे पिता तथा उन के छोटे भाई कैसे पढ़े, बढ़े, इस का सम्बन्ध आज की बात से नहीं है। मेरे पिता ने एम ए किया, बी टी किया। फिर वह अध्यापक बने। कई स्थानों में रहे। पाकिस्तान बनने के बाद दिल्ली आ गये। मेरे चाचा आपने ही घर में पाकिस्तान बनने तक रहे।

दिल्ली आने के तीन चार साल बाद अचानक उन के भाई यानि कि मेरे ताया जी घर पर आ गये। कई दशकों के बाद दोनों भाई मिले। क्या बातें हुई हों गी, मालूम नही। यह पता लगा कि वह शायद कानपुर में हैं। दो तीन घण्टे रहे और फिर चले गये। फिर उन से मुलाकात नहीं हुई।

हम ने मकान बदल लिया। कुछ साल बीत गये। एक दिन अचानक ताई जी आ गईं। माता श्री से बात चीत हुई। ताया जी तो गुज़र गये थे। वह भी तीन चार घण्टे रहीं और फिर चली गईं। उस के बाद उन से मुलाकात नहीं हुई।

कुछ साल और बीत गये। एक दिन ताया जी की बेटी और दामाद बच्चों सहित आ गये। दिल्ली देखने का इरादा था। एक दो दिन घूमें फिरे। तीसरे दिन चॉंदनी चौक गये, कुछ कपड़े इत्यादि लेने। मेरी डयूटी उन्हें घुमाने की थी। यही पर वह संयोग हुआ जिस से बात शुरू की थी।

उन के एक मौसेरी या ममेरी बहन मिल गई। वह शाहदरा में रहती थीं। काफी समय से कमला (मेरे ताया जी की बेटी) से उन की मुलाकात नहीं हुई थी और उस ज़माने में पत्र व्यवहार का भी इतना चलन नहीं था। अब इतना बड़ा शहर और उस में उसी एक दिन दोनों को चॉंदनी चौक आना था और एक दूसरे से मिलना था। यही तो संयोग है। इसी संयोग की तो मैं बात कर रहा था।

बात चीत से लगा कि काफी पास पास थीं। ऐसे में राह चलते बातें तो खत्म हो ही नहीं पातीं। बहन ने फौरन साथ शाहदरा चलने को कहा।

पर बाकी लोग तो घर पर थे। बहन साथ में हमारे घर पर आईं और उन्हें सपरिवार साथ ले गईं।

इस के बाद फिर कभी उन से मुलाकात नहीं हुई।



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