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शबाना

  • kewal sethi
  • 5 minutes ago
  • 3 min read

शबाना


पहले मैं यह साफ कर दूॅं कि मैं उस तबके से आता हूॅं जिसे मिडिल क्लास कहा जाता है। ज़ाहिर है कि मेरे यार दोस्त भी उसी तबके से ही हों गे। तो किस्सा इस तरह है कि एक दोस्त अज़म का निकाह था। उस का निकाह नामा मिला जिस में बताया गया था कि उस का निकाह शबाना से हो रहा है। इत्तफाक से उन दिनों मुझे बाहर जाना पड़ा और उस दावततामे का फायदा मैं उठाने से महरूम रहा।

उस के बाद भी काफी दिन गुज़र गये और मैं अपने काम में इस कदर मसरूफ रहा कि अज़म से मुलाकात का ख्याल तक नहीं आया। एक दिन अचानक एक चमचमाती कार अपने दरवाज़े पर रुकी जो न सिर्फ मेरे बल्कि मौहल्ले के लिये अजूबा सा था। और उस से बढ़ कर ताअजुब उस वक्त हुआ जब उस में से अज़म निकला। तड़क भड़क वाला लिबास पहने। पर बड़े तपाक से मिला। आखिर था तो अपना दोस्त न, लिबास से क्या होता है। खैर, बात चीत के बाद उस ने न्यौता दिया कि इस इतवार को उस के घर पर खाने के लिये आना है। अब इस में इनकार की गुंजाइश ही कहां थीं। उस ने बताया कि सुरेन्द्र भी उस दिन आ रहा है जिस से मुलाकात का मज़ा दुगना हो जाये गा। उस ने यह भी कहा कि कि वह उस दिन अपनी कार मुझे लिवाने के लिये भेज दे गा। मैैं हैरान था कि अज़म को कौन सा खज़ाना हाथ लग गया है जो इतनी शान शौकत दिखा रहा है।

मुकर्रर दिन पर उस की कार आई और हम मौहल्ले वालों की रश्क भरी निगाहों के सामने उस मे बैठ कर रवाना हुये। अब तक तो इस बात का यकीन हो गया था कि अजम का दौलतखाना भी शानदार हो गा पर जितना सोचा था, उस से कहीं अधिक हैरतअंगेज़ था। और जब उस ने ताअरुफ अपनी बेगम से कराया तो ऑंखों को यकीन नहीं हुआ। क्या हुस्न, क्या नज़ाकत मानो एक परी उतर आई हो कहकशां से। और उस की मुस्कराहट, तौबा। जब उस ने अपने हसीन लबों से कहा कि अज़म ने मेरे बारे में कई किस्से सुनाये हैं तो एक बार तो मैं सहर उठा क्योंकि कई किस्से तो ऐसे थे कि किसी खातून के सुनने लायक नहीं थे। पर शुक्र है कि जो किस्से सुनाये गये, उस से मेरी शराफत और लियाकत ही झलकती थी। इतना शुक्रिया तो अज़म का करना ही हो गा।

इस बीच सुरेन्द्र और उस की बेगम भी आ गये। वह तो पहले शबाना से मिल चुके थे और निकाह में भी शरीक हुये थे। खूब गुज़री जब तीनो दोस्त मिल कर बैठे। षबाना और सुरेन्द्र की बेगम भी काफी बेतकुलफी से मिलीं। यूॅं कहें कि पूरी शाम बहुत ही खुशगवार रही। उस में इज़ाफा तो तब हुआ जब शबाना के वालिद भी शरीक हो गये और उन्हों ने अपने कई किस्से सुनाये। और खाने का तो पूछो ही मत। लुत्फ आ गया। रुखसत होने तक हम लतीफागो होते रहे और फिर मिलने का वायदा कर रवाना हुये।

ज़ाहिर है कि अज़म की कार छोड़ने भी आई और मैं रास्ते भर बल्कि पूरी रात भर सोचता रहा कि यह सब खबाब है कि हकीकत कि अपना मिडिल क्लास दोस्त किस तरह इस खानदान में शामिल हो गया। माना कि वह शायर था और बहुत हसीन गज़लें लिखता था और तुरन्नम से सुनाता था पर क्या कोई अमीरज़ादी इतने पर ही फिदा हो सकती है। और फिर मेरे किस्से कौन से थे, यह भी तो काबिले यकीन नहीं था। माना कि मैं हाकी का खिलाड़ी था बल्कि अच्छा खिलाड़ी था और ने सिर्फ शहर के बल्कि पूरे सूबे में नाम कमा चुका था पर क्या यही इतनी तारीफ का हकदार मुझे बना देता था।

और अब शबाना का यह कहना कि वह मेरे लिये अच्छी नाजनीन की तलाश करे गी, ने मेरी रात की नींद ही उड़ा दी।

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