कहां आ गये हम
- kewal sethi
- Apr 4
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कहां आ गये हम
मेरे दादा तहसील में ओहदेदार थे। मेरे नाना पुलिस में थे। भरा पूरा परिवार था, ज़मीनें थीं, पैसा था और सब से बढ़ कर रोैअब था। पर मेरा दुर्भाग्य कि मुझे एक लड़की से प्यार हो गया और उस को मुझ से। वैसे तो प्यार कोई जुर्म नहीं है पर दिक्कत यह हुई कि वह उस परिवार से थी जिसे हीन जाति का माना जाता है। शरीफ परिवार का होने के नाते मैं उस से शादी करना चाहता था। मेरे परिवार वाले इस के खिलाफ थे जो कि समझ में आता है। पर उस के परिवार वाले भी खिलाफ थे जो समझ में नहीं आता है। आखिर वह ऊंचे कुल में ही तो जा रही थी। पर जो हो दोनों परिवार इस के विरुद्ध थे।
ऐसे में मेरे चाचा ने हमारी शादी एक मंदिर में करा दी तथा पॉंच हज़ार रुपये भी दिये कि मैं दूसरे शहर में जो कर कोई धंधा अपना लूॅं। यह उस ज़माने की बात है जब पांच हज़ार बहुत बड़ी रकम होती थी। तो हम मियां बीवी दूसरे दूर के एक शहर में आ गये जहॉं मैं ने एक छोटी सी दुकान खोल ली और जीवन आराम से बीतने लगा।
वह कहते हैं न कि विनाश काले विपरीत बुद्धि। पता नहीं क्यों मुझे ख्याल आया कि अनपढ़ बीवी तो परिवार के लिये अच्छी बात नहीं है। सो मैं ने उसे पढ़ाना आरम्भ कर दिया। अब वह निकली बला की ज़हीन। जल्दी ही सीख् गई। वहॉं तक तो ठीक था पर हुआ यह कि उस की ललक जाग उठी और उस ने अपनी पढ़ाई को आगे तक बढ़ाया। दसवीं की परीक्षा भी पास कर ली। तब तक भारत आज़ाद हो चुका था। और चारों ओर धूम थी रिवर्स डिसक्रिमिनेषन की अर्थात आरक्षण की। ऐसे में मेरी पत्नि को अपनी जाति का ख्याल आया। अभी तक तो कभी यह सवाल उठा नहीं था। पर इस ने जीवन में ज़हर घोल दिया।
अपने परिवार से, अपने गॉंव से नाता तो हम ने तोड़ लिया था पर अब जब जाति प्रमाण की आवश्यकता हुई तो फिर से जुड़ना पड़ा। समय के साथ मेरे परिवार ने तो हकीकत को कबूल कर लिया था। उस के परिवार ने अपहरण का केस करना चाहा पर नाना तो पुलिय में थे, इस कारण उन की बात जमी नहीं। उन्हें भी चुप चाप बैठना पड़ा। खैर प्रमाणपत्र मिल गया और उस के सहारे नौकरी भी। आमदनी बढ़ गई। होना तो चाहिये था कि इस के साथ जिंदगी आसान हो जाती पर ऐसा हुआ नहीं। आय बढ़ने के साथ अभिलाषा भी बढ़ गई औा आप जानते हैं कि इस की कोई सीमा नहीं होती। वह घर जो सुखमय था अब द्वन्द्व युद्ध का अखाड़ा बन गया। कब तक यह सहता, इस कारण वह घर ही छोड़ दिया। पर उस की नौकरी थी पुलिस में, इस कारण पीछा नहीं छूटा। अब गुज़ारा भत्त देता हूॅं और अपना गुज़ारा मुश्किल से होता है।
अब दिक्कत है कि लौट कर भी नहीं जा सकता। कितनी बातें सुननी पड़ें गी। उस से डर लगता है। बस जिंदगी के दिन काट रहा हूॅं।
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