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दोषी कौन

  • kewal sethi
  • 12 minutes ago
  • 3 min read

दोषी कौन

एक पुरानी कहानी


एक नगर में एक ब्राह्मण परिवार रहता था। यूॅं तो नवबौद्ध युवकों के अनुसार सभी ब्राह्मण धनाढय तथा पाखंडी तथा धूर्त होते हैं पर हमारी कथा वाला ब्राह्मण परिवार गरीब था बल्कि बहुत गरीब था। मश्किल से खाने पीने का जुगाड़ होता था। एक बार तो ऐसा हुआ कि घर में अनाज था ही नहीं। भूख के मारे बुरा हाल था। उस समय परिवारों को निशुल्क भोजन देने की व्यवस्था भी नहीं थी।

परन्तु उस नगर का राजा जो ब्राह्मण नहीं था, क्षत्रीय भी नहीं था पर अच्छी तबियत का था। उस को कहीं सै पता चल गया कि ब्राह्मण परिवार के पास भोजन की व्यवस्था नहीं है। तुरन्त उसे बुलाया गया और पॉंच किला चावल, निशुल्क, उस का सौंप दिये। वह चावल एक थैली में थे जिस पर राजा की फोटो भी नहीं थी। (उस समय प्लास्टिक के थैले नही बन पाये थे या शायद उन की हानिकारक प्रवृति को देखते हुये उन को बैन कर दिया गया था)।

ब्राह्मण वह चावल ले कर धर आया। उस की बीवी ने चावल बनाये और दो बच्चों को खिलाये, पति को खिलाये और खुद भी खाये।

पर यह क्या? सुबह चारों मृत पाये गये। बस्ती के लोग, जो ज़िंदा की खबर नहीं लेते, मौत पर इकठ्ठे हो गये। तरह तरह की बातें होने लगी। कुछ लोगों ने काकरोच पार्टी की तर्ज़ पर राजा को गद्दी छोड़ने को कहा जिसे राजा ने भारत सरकार के मंत्रियों की तर्ज़ पर अनसुना कर दिया।

पर इन की बात छोड़ कर हम दूसरे लोक में चलें। चार चार आत्मायें एक साथ आईं तो यमराज का माथा ठंका। तुरन्त चित्र गुप्त को पता लगाने को कहा गया कि इस सामूहिक मृत्यु का दोषी कौन है। चित्रगुप्त ने फौरन एफ आई आर दर्ज कर ली जिस में राजा, ब्राहमण तथा उस की पत्नि का नाम था। प्रारम्भिक जॉंच में पाया गया कि राजा तो दोषी नहीं है। उस ने तो अपने धर्म का पालन करते हुये गरीब ब्राह्मण की सहायता की थी। ब्राह्मण भी दोषी नहीं था। वह तो उस पोटली को सीधा राजमहल से घर लाया था। पत्नि भी दोषी नहीं थी। उस ने सामान्य तरीके से चावल बनाये थें।

पर यम राज को संतोष नहीं था। उसे भारतीय न्याय पद्धति का ज्ञान नहीं था कि यदि एफआई आर में दर्ज लोागों के विरुद्ध साक्ष्य नहीं है तो प्रकरण समाप्त समझा जाये। परन्तु यमराज का विचार था कि कोई तो दोषी होना चाहिये क्येांकि मृत्यु तो हुई है। यदि कोई दोषी नहीं है तो न्याय कैसे हो गा। अब वह हमारे सर्वोच्च न्यायातय का कायदा तो नहीं जानता था कि उस का काम बस निर्दोष ठहराना हो। व्यक्ति कैसे मरे, क्यों मरे, यह तय करना उस का काम नहीं है। उसे तो साक्ष्य देखना है और अभी तक का साक्ष्य किसी को भी कसूरवार मानने के लिये उपलब्ध नहीं था। परन्तु यम राज ने प्रकरण ठण्डे बस्ते में नहीं डाला। उस ने फौरन और गहराई से जॉंच करने के आदेश दिये।

बेचारे चित्रगुप्त ने फिर से नई एफ आई आर लिखी जो नामालूम व्यक्तियों के खिलाफ थीं। वह फिर से तफतीश में लगा। भारतीय पुलिस की तरह फिर से मौका वारदात को देखा गया तथा जिसे अंग्रेज़ी में कहा जोा तमबवदेजतनबजपदह जीम बतपउम गुनाहस्थल का पुनःपरीक्षण किया गया। आखिर यह पता लगा कि मृत्यु ज़हर के कारण हुई। पर ज़हर आया कहॉं से।

गहरी छानबीन के बाद पता चला कि जिस समय ब्राह्मण महल से घर जा रहा था, उस समय एक चील ने एक सांप का शिकार किया था। वह उसे अपने पंजे में पकड़ कर अपने घोंसले की तरफ ले जा रही थी। इस बीच उस सांप के मुॅंह में जो ज़हर था, उस की बूॅंदें चावल की पोटली पर गिरीं। इसी से यह मृत्यें हुईं।

प्रकरण फिर यमराज के समक्ष प्रस्तुत हुआ। पर गतिरोध बना रहा। चील का तो चूहे, सांप का शिकार करने की परम्परा है नहीं तो उसे खाना कहां से मिले गा। वह तो अपना कर्तव्य निभा रही थी। इस कारण उसे दोषी नहीं माना जा सकता। अब रहा सवाल सांप का परन्तु उस में कठिनाई यह थी कि प्रस्तुत प्रमाण के अनुसार तो वह मर चुका था तब उसे कसूरवार कैसे माना जाये।

प्रकरण का निर्णय तो अभी नहीं हो पाया किन्तु इस बीच अंतरिम आदेश दिये गये हैं कि राजा पूरे राज्य में सर्वेक्षण कराये कि कितने गरीब ब्राह्मण या और कोई भी परिवार इस स्थिति में हैं कि उन के पास खाने को नहीं हैं। उन के घरों में राजा के सेवक अनाज ले कर जाये और सावधानी रखें कि कोई चील या बाज़ रास्ते में न हो। साथ ही यह आदेश दिया गया कि यह प्रयास किया जाये कि चील तथा बाज़ इत्यादि अपने लिये निश्चित किये गये स्थान में ही रहें। वहां पर उन के भोजन के लिये चूहे सांप भी रखे जायें।

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