किस्सा एक वारदात का - 3
- kewal sethi
- 1 day ago
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किस्सा एक वारदात का
3।
और यह मामला।
हुआ यह कि एक थे डा. वाडिया। अच्छे सुलझे हुए शल्य चिकित्सक थे। करीब 3 साल पहले जिले में आए थे। लंदन से एफ आर सी एस थे। हाथ अच्छा था। ऑपरेशन शायद ही कोई नाकामयाब हुआ हो। बड़े से बड़ा ऑपरेशन करने से हिचकते नहीं थे। गजब के भाग्यशाली थे। कहते हैं एक बार वह किसी गांव में ऑपरेशन करने लगे। क्लोरोफार्म सुंघा दिया। ऑपरेशन करने लगे तो पता चला कि एक हथियार तो अस्पताल में ही रह गया। फिर क्या था। तुरंत मोटरसाइकिल निकाली और तूफान की रफ्तार से गये और तूफान की रफ्तार से लौटे और ऑपरेशन कर दिया। और वह भी कामयाब। सब डॉक्टर उन से जलते थे। उन्हें नीचा दिखाने के फिराक में रहते थे। लेकिन सफलता के पश्चात सफलता उन के कदम चूमती थी। एक धाक थी।
लेकिन सफलता केवल सफलता के लिए उन्हें प्रिय न थी। art for art sake की उक्ति उन्हों ने सुनी तो थी पर यह उन पर लागू हो सकती थी, इस की कल्पना भी उन्हें नहीं थी। उन्हों ने इस के बारे में कभी सोचा नहीं था। वो सफलता का दाम वसूल करने में व्यस्त थे। उन्हें सोचने की फुरसत ही नहीं थी। नौकरी तो सरकार ने दी थी पर सफलता तो सरकार ने नहीं दी थी। वह तो उन की अपनी थी और उस की कीमत लेना वह कोई गलत बात नहीं मान रहे थे। इसी लिए चाहे मरीज घर पर आए या अस्पताल में, उन की बंघी रकम तो उन को मिलना ही चाहिए। चाहे वह राशि शुरू में दे दे या जब मरीज ऑपरेशन टेबल पर लेटा होे। उस समय तक आपरेशन शुरू नहीं होता था जब तक रकम नहीं मिल जाती थी।
कहते हैं कि पैंतीस की उम्र तक सभी समाजवादी होते हैं। डा। वाडिया इस समय 37 साल के हो गए थे। तीन चार साल पहले वह पूरे समाजवादी थे। इसी लिए अमीर हो या गरीब वह सब से ऑपरेशन के हिसाब से एक सी रकम वसूलते थे। जैसे-जैसे सफलता बढ़ती गई वैसे ही वह रकम भी बढ़ती गई। पर समाजवाद कायम रहा। लेकिन जमाना केवल समाजवाद का, समानता का ही नहीं था। आवाज उठी कि कमजोर वर्गों को, दलित वर्गों को निहित स्वार्थों से, प्रतिक्रियावदियों से बचाया जाए। समाजवादी गली गली चिल्लाने लगे - असली समाजवाद तभी संभव है जब प्रतिक्रियावादी समाप्त हो जाएं गे। दलित वर्ग की सहायता करना राष्ट्र का प्रथम कर्तव्य है। सिंडीकेट से बचें, उन की ताकत को समाप्त करें।
डा. वाडिया भी इसी रौ में बह गए। पूंजीपतियों की ताकत खत्म करना चाहिए, यह उन को अच्छा लगा। उन की ताकत उन की पूंजी में है, यह भी वह जानते थे। और फिर अब तक वह पैंतीस से ऊपर भी हो चुके थे। इस सभी का प्रभाव हुआ कि उन्हों ने अपना तरीका बदल दिया। सब से समान रकम लेने की बजाय उन्हों ने पूंजीपतियों से ज्यादा रकम मांगना शुरू कर दिया। मांगी गई रकम देने की शक्ति से मिलाई जाने लगी। ऑपरेशन अगर डॉक्टर साहब एक आदिवासी से एक सौ रुपए ले कर कर देते थे तो उसी के लिए पूंजीपतियों को ₹500 तक देना पड़ सकता था।
जैसा कि अपेक्षित था। डा. साहब द्वारा इस प्रकार समानता लाने के प्रयत्नों ने पूंजीपति समाज को झंझकोर कर रख दिया। जलती में तेल का असर तो तब हुआ जब डॉक्टर साहब ने सफैद टोपी पहनने वाले मशहूर और महरूफ समाजवादियों को भी इस सिलसिले में छोड़ने से इनकार कर दिया। समाजवादी जोकि समानता के नारे लगा लगा कर अपना गला खराब कर चुके थे, इस बात को ले कर दुखी थे कि उन के गले की मरम्मत के लिए उन्हें कुछ मुआवज़ा देना पड़ेगा और यह मुआवज़ा उन के पास जमा राशि पर से किया जाए गा। इस बात का लिहाज़ नहीं किया जाए गा कि वे कमजोर लोगों तथा दलितों को ऊंचा उठाने में अपनी आवाज उठाते रहे है। ज़ख्म पर नमक छिड़कने के माफिक हो गया कि डॉक्टर साहब ना केवल उन की घोषित पूॅंजी का हिसाब रखते थे बल्कि उन के काले धन को भी जोड़ देते थे। यह असहनीय था। आखिर काला धन जनता की सेवा के लिए ही तो था। इसी से चुनाव जीतने थे, जिस से समाजवाद लाना था। इसी से दलित कमजोर वर्गों को चुनाव के दिन ऊंचा उठा कर अपने को सब के समकक्ष मानने के लिए शराब भी पिलाना था। आवाज उठाने वालों को भी कुछ तो देना था। लेकिन डॉक्टर साहब ने इस सब को नहीं देखा। उन्हें तो बस अपनी सफलता के दाम वसूलने थे। तो हुआ यह कि मौका तलाशा जाने लगा।
मौका मिला जनवरी की एक रात को। एक सेठ के लड़के अपने नई मोटरसाइकिल पर अपनी क्षमता दिखा रहे थे। गवाह तो एक ही था जो उन के पीछे की सीट पर बैठा हुआ था। लेकिन उन्हें अपने जौहर तो दिखलाना ही था। इसलिए पूरी रफ्तार से मोटरसाइकिल शहर की तरह चली आ रही थी। शाम के झुटपटे का वक्त था। सामने से एक बैलगाड़ी आ रही थी और एक पुलिया भी सामने आ गई थी। बैलगाड़ी पुलिया के ऊपर थी। रोकने की कोशिश तो बहुत की गई पर मोटरसाइकिल रुकने को तैयार न थी। इस कशमकश में गाड़ी फिसली और दोनों सवार सड़क पर गिर गये। गाड़ीवान शायद सो रहा था इसलिए बैलगाड़ी अपनी गति से चलती रही और यह दोनों सड़क के किनारे पर पड़े रहे। ड्राइवर को तो काफी चोट आई थी और साथी बेहोश हो गया था। समय अपनी रफ्तार से चलता रहा और खून अपनी गति से बहता रहा। ना कोई गवाह देखने के लिए था और न कोई व्यक्ति कुछ करने को। यह तो पता नहीं कि वह कितनी देर पड़े रहे। लेकिन एक बैलगाड़ी आ रही थी, उस ने इन को देखा। अभी तक साथी को कुछ होश आ गया था। उस ने और गाड़ी वाले दोनों ने मिल कर सेठ के लड़के को उठाया और शहर की तरफ ले चले। साढ़ आठ बजे तक वे अस्पताल पहुंच गए। उस समयं हॉस्पिटल में केवल एक लेडी डॉक्टर थी। उस ने मरीज को देखा और मायूसी में सिर हिला दिया। तुरंत खबर फैली और लोग बाग इकठ्ठे हो गये। डा. साहब घर पर नहीं थे और पता लगा कि सिनेमा देखने गये हैं। लोग सिनेमा की तरफ भागे। डा़ वाडिया को ढूंढा और उन से चलने को कहा। उस में थोड़ी सी पिक्चर ही बाकी रह गई थी। पूरा समाजवादी गिरोह पूरी वर्दी धारण किए हुए साथ था। इस लिए पिक्चर को बीच में ही छोड़ कर उठना पड़ा। उठे, अपनी कार को ढूंढा और अस्पताल आ गए।
लेकिन तब तक हालत बदल चुकी थी। लेडी डॉक्टर ने कुछ नहीं कहा था लेकिन लोग बाग सब समझ गए थे। बड़े आदमी थे इस लिए काफी लोग जमा हो गए थे। समय एवं परिस्थितियां दुर्घटना को बदलने लगी। साढे आठ बजे के बदले सवा आठ हुए, फिर आठ। डाक्टर को किस वक्त किस ने बताया, यह भी लोगों के लिए चर्चा का विषय बन गया। जाने कब डाक्टर के पुराने इतिहास को याद किया गया और कब किस समय यह फैसला हो गया कि मौत केवल डाक्टर साहब के घर पर ना होने के कारण ही हुई है। अगर वह पिक्चर देखने ना जाते तो मौत ना होती। क्यों ना होती, यह तो तर्क वितर्क का विषय नहीं था, यह तो धारणा का विषय बन कर रह गया।
और इसी कारण जब डॉक्टर वाडिया अस्पताल पहुंचे तो उन की कार पर पत्थर गिरने लगे। और पत्थरों के साथ नारेबाजी तो ऐसे हैं जैसे धूप के साथ छाया। डॉक्टर और उन के परिवार वाले अपने घर के अंदर भागे और फिर कुछ अक्ल आई तो पिछवाड़े से निकलकर एक दूसरे क्वार्टर में। वहां एक डॉक्टर थे जो कि काफी controvertial कंट्रोवर्शियल थे। उन के बारे में अलग अलग राय थी। कुछ लोग तो उन्हें पागल करार देते थे और कुछ केवल सनकी। बहर हाल वह बंदूक ले कर अपने क्वार्टर के सामने खड़े हो गये। यह स्थिति देख कर भीड़ का ध्यान डाक्टर की तरफ से हट कर उन के मकान की तरफ मुड़ गया। कार के शीशे तो चूर चूर हो ही चुके थे, अब उस की सीटें निकाली गई। पत्थर से रेडिएटर इत्यादि की भी खबर ली गई। फिर घर के दरवाजों की बारी आई। दो एक फोटो अपने फ्रेमों से बिछड़ गए। फिर मेजों, कुर्सियों को इकट्ठा किया गया ताकि आगे की कार्यवाही की जा सके।
लेकिन तभी रंग में भंग डालने के लिए पुलिस आ गई और यह कार्यवाही रुक गई। लेकिन पुलिस वाले कम थे। वह कार्रवाई रोकने में तो सफल हो गये पर भीड़ ज्यों की त्यों रही। कलेक्टर एस पी को खबर भेजी गई। रिज़र्व लाइन को भी खबरदार कर दिया गया।
10 बजते बजते स्थिति काबू में आ गई। भीड़ अस्पताल के गेट के सामने थी और डॉक्टर को उन के हवाले करने के लिए चिल्ला रही थी। पुलिस गेट के अंदर थी और उन्हें देने को तैयार न थी। कलेक्टर और एस पी लोगों को समझाने में लगे हुए थे। उन का कहना था कि जो भी दोषी हो गा उस को सजा दी जाए गी, उस के खिलाफ कार्रवाई की जाये गी। लेकिन लोग दोषी की नहीं, डाक्टर की बात कर रहे थे और यही स्टेलमेट गतिरोध था। ओर सज़ा की चिन्ता नहीं है, वह तो उसे खुद ही दे लें गे।
ग्यारह बजे तक 20 पुलिस वाले और मिल गए। होमगार्ड के 25 जवान भी ट्रेनिंग में से ले लिए गए। इस फोर्स के आने के पर कलेक्टर की रणनीति बदल गई। मेन गेट को खाली करा लिया गया क्योंकि फोर्स को अंदर आना था। लेकिन फोर्स अन्दर नहीं आई। सड़क पर फैल गई और धीरे-धीरे लोगों को पीछे हटाना शुरू कर दिया। सड़क पर आवागमन बंद कर दिया गया। पुलिस थाना और अस्पताल के बीच का रास्ता साफ हो गया। इस बीच लोगों को मनाने की कार्यवाही भी चलती रही। कई नेता भी वहां पहुंच गए थे। उन्हें इस बात का अवसर दिया गया कि वे अपने को सब के सामने पेश करें।
साढ़े ग्यारह बजे फिर रणनीति बदली। लोगों को कहा कि अब घर जायें अथवा कार्रवाई की जाये गी। डॉक्टर को सौंप देने की बात तो अपने आप समाप्त हो गई थी। चेतावनी के पश्चात चेतावनी को देखते हुए कम और बढ़ती हुई सर्दी के कारण ज्यादातर लोग अपने अपने घरों को लौट गये। बचे हुए लोग पुलिस की संख्या से कुछ कम ही थे इसलिए वह भी घर चल दिए।
बारह बजे तक स्थिति शांत हो गई। पुलिस गार्ड डॉक्टर के लिए लगाई जा कर उस दिन का ड्रामा समाप्त कर दिया गया।
दूसरे दिन दोपहर का का माहौल देखा गया। स्थिति शॉंत थी। कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। अब गिरफतारियों का दौर चला। वह तो होना ही था, इसे जानते हुए ज्यादातर लोग गायब थे। लेकिन पांच हिरासत में लिए गए। बाप और भाईयों को क्रियाक्रम के लिए छोड़ दिया गया। । कुल 13 लेागों की सूची तैयार हुई कुछ को अगले दो दिनों में पकड़ा गया। बाकी सात आठ दिन तक छुपे रहे लेकिन कब तक।
कुछ दिनों के बाद चालान पेश कर दिया गया। चूॅंकि शहादत मजबूत थी और जिला प्रशासन ढील नहीं दे रहा था। पकड़े जाने वाले सेठ के परिवार के थे या उनके हमदर्दी। पूंजीपति, समाजवादी ओर कुछ पहुंच वाले भी इन में शामिल थे।
फिर शुरू हुई वह कार्रवाई जिस से यह कहानी शुरू की गई थी।
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