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किस्सा एक वारदात का

  • kewal sethi
  • Jun 5
  • 4 min read

किस्सा एक वारदात का


हैलो ।....... हॉ., मै. बोल रहा हूॅ. .........हॉ. हॉ., कहिये ..........हैलो .... गुड मार्निगं सर, मै. शर्मा बोल रहा हूॅ. .......... जी सर .......... जी सर ..........ठीक है सर, मै. समझ गया सर ....... जी हॉ., जी हॉ., ...... नमस्कार सर।

शर्मा ने फोन वापस क्रैडल पर रख दिया। सामने बैठे डिप्टी कलैक्टर की तरफ देख कर बोले,

‘‘हॉं, तो आप कह रहे थे’’

‘‘जी, मैं ने व्यापारियों को बुला कर बात की थी। उन का कहना है कि अगर आप यह इजाज़त दे दें कि तेल किसी भी भाव पर बेचा जाये तो हम लोग स्टाक ला सकते हैं’’, खाद्य अधिकारी ने कहा।

‘‘लेकिन यह कैसे हो सकता है। हम खुद कह दें कि वह किसी भी भाव पर बेच सकते हैं। यह तो सरासर कानून की खिलाफत हो गी’’।

‘‘वह तो ठीक है सर, लेकिन अगर स्टाक न आया तो ......’’

‘‘एकाध रेड करने से कुछ हो गा’’

‘‘माल तो है सर, लेकिन इतना कम है कि रेड से ज़्यादा मिलने वाला नहीं है। और फिर एक जगह रखा भी तो नहीं है’’

‘‘एक जगह रखने का तो प्रश्न ही नहीं है। लेकिन कम से कम रिकार्ड पर तो आ जाये गा कि हम ने कुछ किया है। सरकार तो रोज़ पूछती है- आप के द्वारा क्या कार्रवाई की गई है। बताने को तो हो गा’’

‘‘रेड तो मैं एकाध जगह आज कर दूॅं गा। लेकिन यह अखबार वाले तो उस में भी हमारी बुराई ही करें गे’’

‘‘हॉं, यह खतरा तो मोल लेना ही पड़े गा। अखबार की बात तो भुला दी जाती है पर यह सरकार का पचड़ा? ’’

‘‘जी, सर’’

‘‘अच्छा, हम तो न कहें गे लेकिन व्यापारियों को कहिये, वह माल लायें तो सही। फिर देखें गे कि भाव का क्या करना है। समझ गये न। इंस्पैक्टरों को भी बतला देना’’

‘‘जी, सर’’

डिप्टी कलैक्टर जब चले गये तो शर्मा जी ने एस पी को फोन लगाया। वैसे तो फोन का एक्सटेंशन था और वह अधीक्षक को फोन लगाने को कह सकते थे पर कभी कभी सीधा फोन भी लगा ही लेते थे। दूसरे अधीक्षक को पता लग जाता था कि किस से बात हो रही है। इसी लिये उन्हों ने सीधा ही डायल किया।

‘‘मैं एस पी साहब के बंगले से आरक्षक बैजनाथ बोल रहा हूॅ’’

‘‘मैं कलैक्टर बोल रहा हूॅं। एस पी साहब से बात कराओ’’।

‘‘जी सर, साहब अभी बाथ रूम में हैं, सर’’

एस पी साहब ज़्यादातर बाथरूम में ही रहते हैं। यहीं के नहीं, सभी ज़िलों के। यह एक स्टैण्डर्ड जवाब था जो हर कांस्टेबल हर किसी को उस समय देता था जब साहब अपनी टेबल की जगह किसी दूसरी जगह पर बैठे होते थे। शर्मा जी को याद आया कि कैसे वह एक डी आई जी के यहॉं मिलने गये थे और फोन की घण्टी झनझना उठी थी तो डी आई जी ने अर्दली के अभाव में स्चयं ही फोन उठाया और कह दिया - अभी साहब बाथ रूम में हैं।

वह उस का पहला काल था डी आई जी के यहॉं। नई नई सर्विस थी। बहुत ही अजीब लगा था उन्हें। तब डी आई जी ने बताया था कि किसी भी असुविधाजनक कॉल के लिये यह एक फिल्टर था। एस पी केवल उन से बात करते थे जो बात करने लायक थे। इसी लिये आज भी शर्मा जी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ था और न निराशा ही। इस लिये उन्हों ने आरक्षक बैजनाथ से कहा कि बाद में बात करा देना। लेकिन इस से पहले कि वह फोन रखते, आरक्षक बैज नाथ ने कहा, ‘‘हज़ूर, एस पी साहब आ गये हैं, बात कर लीजिये’’

‘‘मैं स्कसैना बाल रहा हूॅं। गुड मार्निंग सर। कहिये क्या खबर हैं’’

‘‘वह फोन आया था फिर उस साले का।’’

‘‘क्यों ।।।।’’

‘‘अरे वही पुराना किस्सा। ज़रा उस केस को देख लीजिये गा’’


एस पी साहब हॅंसे। ‘‘अरे, वह तो अब अदालत में भी इस्तगासा पेश हो गया। अब क्या हो सकता है। यह लोग तो कुछ समझते ही नहीं। तीन बार तो मैं बता चुका। फिर भी डी आई जी से फोन कराया। अभी कल षाम को ए आई जी के यहॉं से हैडक्वार्टर से फोन आया था। मैं ने उन से कहा - हज़ूर, घर की खेती है क्या। जब चाहा भुट्टा तोड़ लिया। लेकिन यह बेचारे भी क्या करें। सब समझते हैं लेकिन मंत्री को कहने की हिम्मत नहीं पड़ता। कुछ प्रामिस तो नहीं किया’’ एस पी ने शंका व्यक्त की।


‘‘प्रामिस क्या? वही कलैक्टरों का पुराना हथियार - देख लूॅं गा। उम्मीद है सब ठीक हो जाये गा। मैं एस पी से बात करूॅं गा। लेकिन यह बीमारी कब तक चले गी’’

‘‘सैशन सुपर्द हो जाये तब तक तो रहे गी’’

‘‘और उस में महीनों लग जायें गे’’

‘‘आप जल्दी करा दें न’’

‘‘कैसे’’

‘‘ ज़रा डी जे से बात कर लें’’

‘‘और जूडिशिरी की स्वतन्त्रता का क्या हो गा’’

‘‘आप कौन कनविक्षन के लिये कह रहे हो। वह ज़रा जल्दी कर दें, बस। दो चार ग्वाह लिये और बस’’

‘‘अच्छा, तो आप समझते हैं, वह रिवीज़न वगैरा के लिये नहीं जायें गे। हज़ूर बड़ी पार्टी है। कम से कम तीन बार तो जायें गे हाई कोर्ट में। तब तक गवाह बदल ही जाये गे’’

‘‘तो फिर?’’

‘‘चलने दें, जैसे चलता है। फोन ही तो सुनना है, सुन लें गे’’।

और बात चीत खत्म हो गई।

(to be continued)

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