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श्रद्धा और अश्रद्धा

  • kewal sethi
  • May 7, 2021
  • 4 min read

श्रद्धा और अश्रद्धा


बात करें हम श्रद्धा और अश्रद्धा (श्रद्धा का विलोम) की। अपने इष्ट के प्रति श्रद्धा होना मानव स्वभाव है। किसी अन्य के इष्ट के प्रति अश्रद्धा होना भी मानव स्वभाव ही कहा जाये गा। हर व्यक्ति अपनी ओर से सोचता है तथा किसी भी व्स्तु अथवा तथ्य के बारे में उस के अपने विचार होते हैं। यह बहुत कुछ उस के संस्कारों पर निर्भर करता है।

सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति में तीन तत्व रहते हैं - सत्व, राजस एवं तामस। जब इन में संतुलन नहीं रहता है तो सृष्टि का आरम्भ होता हैं। परन्तु यह तीनों एक साथ ही रहते हैं। इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। हर मानव में इन गुणों का किसी न किसी मात्रा में आवास रहता है। इन का आपसी अनुपात भी परिवर्तनशील रहता है। कभी कोई गुण अधिक प्रभावी हो जाता है तो कभी कोई अन्य। तथा उसी से अनुरूप विचार तथा कृत्य प्रभावित होते हैं।

इस का निष्कर्ष यह है कि मानव के भीतर सभी प्रकार के भाव विद्यमान रहते हैं। कोई भी मानव पूर्ण नहीं हो सकता है। दूसरी ओर कोई भी ऐसा नहीं हो सकता कि उस में कोई दोष न हो। न ही कोई ऐसा मानव है जिस में कोई भी गुण न हो।

अन्तर कहाॅं पड़ता है।

अन्तर हमारे अपने भीेतर है। किसी भी घटना को, किसी भी व्यवहार को हम अपने स्वभाव के अनुरूप देखते हैं। एक ही बात अलग अलग व्यक्तियों द्वारा अलग अलग रूप में देखी जा सकती है। कई बार हम पूरा तथ्य एक बार में नहीं देख पाते। छह व्यक्तियों द्वारा हाथी देखने वालों की तरह हम भी अपने अपने अनुभव तथा संस्कारों से किसी बात को जॉंचते हैं।

श्री कृष्ण का एक नाम रणछोड़ भी है। इसे पलायन भी माना जा सकता है तथा नीति भी। तब इस के बारे में निर्णय कैसे किया जा सकता है। वास्तव में इस कृत्य के पीछे की भावना देखी जाना चाहिये। यदि कोई व्यक्ति युद्ध से इस लिये भागता है कि उसे मोह हो गया है अथवा उसे अपनी मृत्यु का भय सताने लगा है तो यह पलायन हो गा। श्री कृष्ण ने अर्जुन को इसी मोह के बारे में अवगत कराया। परन्तु उन्हों ने स्वयं ही युद्ध से बचने के लिये मथुरा छोड़ने का निर्णय लिया। पर तब यह मोहवश नहीं था वरन् मथुरावासियों के कल्याण की भावना से यह निर्णय लिया गया। जरासंध के बार बार के आक्रमणों का लक्ष्य कृष्ण ही थे। जब यह लक्ष्य नहीं रहा तो आक्रमण भी बन्द हो गये।

इस विचार श्रृंखला का आरम्भ एक मित्र की टिप्पणी से हुआ जिस में वह दुर्योधन के कृत्य पर टिप्पणी कर रहे थे। आम धारणा यह है कि द्रौपदी द्वारा दुर्योधन के अपमान का परिणाम उस को राजसभा में बुलाने का कारण था। हमारे मित्र का कहना है कि दुर्योधन का उपहास तो जल और थल में अन्तर न करने पर किया गया था पर उस में द्रौपदी शामिल नहीं थी। ऐसा केवल इस कारण से कहा गया प्रतीत होता है कि वह अपने नायक (अथवा नायिका) में कोई दोष नहीं देखना चाहते। इस के विपरीत वह अपने खलनायक (अथवा खलनायिकां) में कोई गुण नहीं देखना चाहते। इस कारण वह कहते हैं कि दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र को पाण्डवों के विरुद्ध भड़काने के लिये झूट कहा कि द्रौपदी न ऐसा कहा। प्रश्न यह है कि क्या धृतराष्ट्र को भड़काने की काई आवश्यकता थी। क्या धृतराष्ट्र इस बारे में कुछ करने में समर्थ थे। यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) देखा जाये तो दुर्याधन की बात अधिक सही लगती है। पर मित्र के अनुसार खलनायक के बारे में ऐसा सोचना ही गल्त है।

यह तो एक विषयान्तर है। मूल बात यह है कि किसी भी कृत्य को उस की भावना से अलग कर नहीं देखा जा सकता। एक ही बात को अलग अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। खुजराहो के मंदिर विश्व प्रसिद्ध है। अमरीका तथा युरोप से अनेक पर्यटक इसे देखने के लिेये आते हैं। उन के लिये यह मंदिर कामसूत्र के जीते जागते प्रतिबिम्ब हैं। इन से उन की यौन सम्बन्धी भाव को संतुष्टि मिलती है। परन्तु जिन कलाकारों ने इन का तराशा है अथवा जिन के आदेश के आधीन इन्हें तराशा गया है - क्या उन के मन भी कलुषित थे। मेरे विचार में ऐसा नहीं था। उन के मन में शुद्ध पवित्र विचार ही थै। वह देवताओं की जीवन लीला का चित्रण कर रह ेथे तथा उन में उन के यौन सम्बनी व्यवहार भी इस के भाग थे। एक सूक्षम भाग। वह मुख्य भाग नहीं था। मुख्य था उन देवताओं की आराधना। इसी प्रकार की ूमूर्तियाॅं कोनार्क के सूर्य मंदिर में भी देखी जा सकती हैं यद्यपि वह पर्यटकों के आकर्षण की केन्द्र बिन्दु नहीं हैं। इसी प्रकार की मूर्तियाॅं हम्पी के विरुपक्षा मंदिर में, रनकपुर के जैन मंदिर में, सत्यमूर्ति पेरुमल मंदिर तमिलनाडु में तथा लिंगराज मंदिर उड़ीसा में भी देखी जा सकती हैैं। खुजराहो एक अपवाद नहीं था।

कुछ व्यक्तियों का स्वभाव है कि वह हर बात में कुछ गलत देख ही लेते हैं। हमारे एक मित्र हैं जिन की राम में अश्रद्धा (श्रद्धा का विलोम) है। सीता विवाह में धनुष उठाने के संदर्भ में उन्हों ने कहा कि यह सब चालबाज़ी थी। धनुष में ऐसा कुछ नहीं था जिसे उठाया न जा सके। वह तो सुकुमारी सीता ने एक बार उसे उठा लिया तो जनक के मन में विचार आया कि इसे ही स्वयंबर का लक्ष्य बनाया जाये। कह तो दिया पर फिर घबराये कि ऐसे तो कोई भी कर ले गा। उपयुक्त वर हो या न हो। इस कारण उन्हों ने क्या किया कि धनुष में लोहा जड़ दिया। जिस स्थल पर धनुष रखा था, उस के नीचे एक विद्य ुतीय चुम्बक रख दिया। इस का स्विच उन के पास ही था। अनेक राजा उस धनुष को न उठा पाये। जब राम की बारी आई तो जनक को वह उपयुक्त वर के रूप में जचे। उन्हों ने विद्य ुत प्रवाह बन्द कर दिया ओर राम ने वह धनुष उठा लिया।

उन के इस अदभुत विचार पर मैं ने उन्हें कोटिश धन्यवाद दिया। चाहे परोक्ष रूप से ही सही, उन्हों ने यह कह दिया कि उस पुरातन काल में भारत भौतिकी शास्त्र में इतना प्रवीण था कि उन्हें विद्य ुतीय चुम्बक के गुणों का पूरा ज्ञान था तथा इस का प्रयोग भी उन्हों ने किया।

कहने का सार यह है कि निंदक कोई भी तर्क अथवा कुतर्क अपना सकता है। परन्तु विवेकशील व्यक्ति भावना को देखे गा, इन विचारहीन तर्कों को नहीं। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हो गा जिस में कोई दोष न हो। न ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिस में सराहने लायक कोई बात न हो।



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