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भारत, कर्म और धर्म

kewal sethi
Apr 5
2 min read

भारत, कर्म और धर्म


भारतीय धर्म में कर्म प्रधान माना गया है। इसी से भूत, वर्तमान तथा भविष्य परिभाषित होता है। कर्म का कोई सम्बन्ध पूजा पाठ से नहीं है जब तक कि वह शुद्ध भाव से न किया जाये। शुद्ध भाव का कोई सम्बन्ध जन्म से नहीं है। पूजापाठ के अतिरिक्त भी जो कर्म किया जाये वह कर्मफल देता ही है। इस में क्ब कैसे यह फल मिले गा, इस के बारे में भी कोई नियम नहीं हैं। कोई आदेश नहीं है। कोई धर्म तथा अधर्म की सूची नहीं है। 

कहा जाता है कि धर्म पर चलना ही षुभ फल देता है। परन्तु धर्म क्या है। धर्म ही कर्तव्य है और कर्तव्य ही धर्म है। यह परिस्थिति एवं समय के अनुसार बदलता रहता है। किसी समय चुप रहना भी कर्तव्य हो सकता है तथा किसी समय चुप न रहना भी कर्तव्य हो सकता है। पर जब बोलने का समय हो, वहां चुप रहना भी अधर्म है। जो बात माता के लिये धर्म है, वही बेटे के लिये भी धर्म हो, यह आवश्यक नहीं है। 

कर्मफल को किसी की कृपा से टाला नहीं नहीं जा सकता न ही इस से बचा जा सकता है। किसी अन्य के सूली पर चढ़ने से व्यक्ति का कर्मफल समाप्त नही हो सकता न ही अपने अधर्म कृत्य को किसी के समक्ष स्वीकार करना ही कर्मफल को समाप्त कर सकता है। किसी को अंतिम संदेशवाहक मानने से भी कर्मफल से बचने का मार्ग नहीं है। सत्संग औ कीर्तन भी कर्मफल से बचने का रास्ता नहीं है। यह केवल धर्म क्या है इस के बारे में मार्ग दर्शन कर सकते हैं।  

जब धर्म को ईश्वर की आज्ञा माने की धारणा हो तो वह भी एक गलत धारणा है। ईश्वर किसी विशिष्ट कार्य का आदेश नहीं देता, उस ने बुद्धि दी है ताकि व्यक्ति समझ सके कि क्या धर्म है तथा क्या अधर्म। व्यक्ति को स्वयं ही यह तय करना है।  

एक गलत धारणा है कि ईष्वर समय समय पर अवतार लेते है ताकि अधर्म का नाष किया जा सके। वें केवल धर्म का पालन करने के लिये कहते हैं। महापुरुषों का जीवन ही यह दर्षाता है कि धर्म क्या है। राम को लें तो उन के किया कलाप से सीख सकते हैं कि किस समय कर्तव्य क्या है और क्या धर्म है। कृष्ण को लें तो उन का स्पष्ट कहना है कि अपना कर्तव्य स्वयं निष्चित करो तथा उस के अनुरूप कर्म करो।  

फिर पुराण क्या हैं। क्या केवल कहानियॉं? पर हर कहानी एक सीख देती हैं कि कर्तव्य क्या है। महाभारत क्या है - एक लाक्षणिक कथा। हमारी पॉंच इन्द्रियॉं पॉंच पाण्डव हैं। उन्हें सौ प्रकार के प्रलोभनों से - कौरवों से - बचना है। मार्गदर्षन के लिये मन है, बुद्धि है पर कर्म तो अपना है। धर्म को समझने का उपदेष है पर वह कर्म नहीं है। उस का निष्चय ध्यान से हो गा, किसी के कहने से नहीं। किसी भारतीय दर्षन में कहीं यह नहीं कहा गया है कि हत्या करों, जिहाद करों, तो तुम्हें स्वर्ग मिले गा। किसी पर ईमान ले आओं तो तुम्हारे अपराध क्षमा कर दिये जाये गे। कर्म भी अपने हैं और कर्मफल भी अपना। संदर्भ भी अपने हैं और निर्णय भी। 


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