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मूर्ति पूजा

kewal sethi
Apr 15
2 min read

मूर्ति पूजा


उस दिन एक सज्जन मिल गये। बोले - आप तो धर्म कर्म वाले व्यक्ति हो। वेद उपनिषद जानने वाले हो। यह बताओं कि वेदों में कहीं मूर्ति पूजा करने के लिये लिखा है।

मैं ने कहा - नहीं।

- मेरा भी यही ख्याल था। यह सब बाद की बातें हैं। वेद के अनुरूप नहीं हैं।

- पर वेदों में कहीं यह भी नहीं लिखा कि मूर्ति पूजा नहीं होना चाहिये।

- मतलब वे इस के बारे में मौन हैं।

- बिल्कुल

- फिर इतने मंदिर क्यों है। इन में मूर्तियॉं क्यों हैं। इन की पूजा क्यों होती है।

- अपना अपना विश्वास है। किसी को परमात्मा सब स्थानों पर दिख जाता है। कुछ को कहीं नहीं दिखता। जिस को हम भगवान मान लें, वह पूज्य हो जाता है।

- इंसान की बनाई हुई पत्थर की मूर्ति में भगवान कैसे हो गा।

- मैं ने कहा न कि मानने की बात है। अब आप तिरंगे को नमस्कार करते हो कि नहीं। यह झण्डा कौन बनाता है, किस से बनाता है। जब तक यह बन कर तैयार नहीं होता तब तक पूज्य नहीं है पर जब तैयार हो जाता है तो वह कपड़ा नहीं रहता, प्रतीक बन जाता है। उस प्रतीक को आप पूज्य मानते हो। इसी प्रकार जब तक मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा न हो, वह पत्थर है पर फिर इस का स्वरूप बदल जाता है।

- तो मूर्ति केवल प्रतीक है।

- जी, और इसी लिये वन्दनीय है। और प्रतीक तो हर धर्म में होते हैं और आदर योग्य होते है। ईसाईयों का क्रास हो या इस्लाम का काबा शरीफ। सिखों का गुरू ग्रन्थ साहब। यह सब आदर योग्य हैं।

- बात तो सही है पर अपना मन नहीं मानता कि जिसे मैं पत्थर समझता हूॅं, उसे प्रणाम करूॅं।

- तो तुम आर्यसमाजी बन जाओ। वे मूर्ति पूजा के खिलाफ हैं।

- उस के लिये मुझे क्या करना हो गा।

- कुछ नहीं। बस अपने को आर्य समाजी कहना शुरू कर दो। फिर कोई तुम्हें मंदिर में मूर्ति को मत्था टेकने के लिये नहीं कहे गा।

- बस, केवल अपने के आर्य समाजी कहना है। पूजा, दीक्षा, संस्कार इत्यादि कुछ नहीं।

- जी नहीं। बस मानना है।

- पर आर्य समाज के अपने मंदिर होते हैं।

- हॉं, लेकिन उन में कोई मूर्ति नहीं होती।

- फिर वे करते क्या हैं उस मंदिर में।

- हवन या फिर प्रवचन।

- इन का लाभ?

- हवन से वातावरण शुद्ध होता हैं, प्रवचन से मन।

- यहीं दिक्कत आ गई। प्रवचन में मन कैसे लगे गा।

- मन को एक चित्त करने से। अभ्यास से।

- कोई सरल तरीका मन को एक चित्त करने का

- प्रतीक। उस पर ध्यान केन्द्रित करें। मन इधर उधर नहीं जाये गा।

- बात घूम फिर कर फिर प्रतीक पर आ गई।

— जी, सही कहा।

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