दिलेरी और कड़वा चौथ
दिलेरी और कड़वा चौथ
दिलेरी के दोस्तों की महफिल लंच टाईम में जुटी हुई थी। इधर उधर की बात चल रही थी कि पता नहीं कैसे बात दिलेरी तक आ गईं। दिलेरी यूूॅं तो बहुत बोलता था पर आज चुप था। किसी का ध्यान उस की तरफ गया तो उस ने कहा - दिलेरी आज तो तुम्हें कोई किस्सा सुनाना पड़े गा।
दिलेरी चिढ़ गया, बोला - मैं कोई कहानीकार हू। जो किस्सा सुनाउॅं।
- अरे कोई ऐसी बात बताओ जो तुुम पर बीती हो, वही किस्सा हो जाये गी।
एक और ने कहा - हम कौन से परियों और देवताओं की कहानी सुनाने को कह रहे हैं
जब इसरार हुआ तो दिलेरी को बोलना पड़ा - एक सच्चा वाक्या बताता है।
- हॉं हॉं, वही तो
- तुम जानते हो कि कालोनी में हमारे घर के एक तरफ चोपड़ा रहते हैं और दूसरी तरफ एक व्यक्ति जिसे हम दिनेशी के नाम से ही जानते हैं।
- वही दिनेशी जो शराबी कबाबी है
- वही। रात को देर से लौटता है। आते ही खाना मॉंगता है और बीवी से लड़ता है। अपना तो समय खराब करता है, हमारा भी।
- अरे शराब का नशा होता ही ऐसा है। उस के बाद एक दम सो जाता हो गा।
- पर तब तक तो हमारी नींद हराम होती है न।
- पर इस में किस्सा क्या है। यह तो रोज़ की बात हुई।
- वही तो। एक बार कड़वा चौथ था। सब ने उपवास रखा। और पता नहीं क्या कायदा है कि चांद देख कर्, और पति का मुख द्रेख कर व्रत समाप्त करना है।
- तो?
- सब औरतें मिल कर जो मैदान है न, वहॉं पर चांद देखने जाती हैं।
- सही बात है। चांद खोलियों में थोड़ा आता है।
- फिर?
- उस दिन दिनेशी की बीवी आई ही नही।
- पति के शराबखाने स्रे लौटने का इंतज़ार की रही हो गी। और क्या?
- लौटै तो वही झगड़े के बीच। इस बार ज़रा ऊॅंची आवाज़ में। उधर उन का झगड़ सुनो, इधर पत्नि, जो सुबह से भूखी है, का खाना देखो। मैं ने सोचा हो गया आज का खाना खराब।
- वह तो होना ही था।
- पर आवाज़ इतनी ऊॅंची थी कि अनसुना भी नहीं कर पाये। मारपीट की र्नौबत भी आ गई, ऐसा लगा।। पता है उस की पत्नि ने क्या कहा।
- क्या।
- मार ले जितना मारना है, इस जन्म की ही तो बात है। मैं ने कौन सा कड़वा चौथ का व्रत रखा है।
- उस के बाद?
- यही तो हैरानी की बात है। उस के बाद एक दम चुप्पी। बस सिसकियो की आवाज़ और कुछ नहीं।
- चलो तुम्हारा खाना तो आराम से हो गया।
- असली बात तो आगे है।
- तो यह सब भूमिका थी। वाह दिलेरी वाह।
- दूसरे दिन सुबह सवेरे दरवाज़े पर खटखटाहट हुई। खोला तो दिनेशी दिख गया।
- सुबह सवेरे? दिन खराब होने की अलामत।
- मैं ने भी यही सोचा। उधार मॉंगने आया हो गा। शराब का पैसा खत्म हो गया हो और उसी कारण झगड़ा था। और उस पर महीने का चौथा सप्ताह।
- हॉं भाई चौथा क्या, तीसरा सप्ताह ही काफी होता है। पर कितना मांगा।
- वही तो बात है। वह तो बोला कि भाई साहब मैं माफी मांगने आया हूं। रात को आप को काफी परेशानी हुई हो गी। इतने में बीवी ने कहा कि अरे दरवाज़े पर खड़े खड़े क्या बात कर रहे हो। आईये, भाई साहब अन्दर आईये। बैठिये, चाय लाती हूॅं।
- पत्नि आखिर पत्नि होती है न। उदारता की मूर्ति।
- वह तो है। पर मुझे डर लग रहा था कि यह माफी मांगने की बात तो उधार मांगने की शुरूआत है। वही तरीका है। पहले मक्खन लगाओ, फिर चूना।
- चाय आ गई। फिर?
- उस ने मुझे हैरान कर दिया। पता है क्या कहा।
- हम तो वहां थे नहीं, तुम्हीं बताओ।
- उस ने कहा, भाई साहब, मैं ने शराब छोड़ दी है। कसम है जो पास भी जाऊॅं।
- क्या?
- मैंने तो दिल ही दिल में शुक्र मनाया कि उधार मांगने तो नहीं आया लगता। चाय पी कर और फिर माफी मांग कर दिनेशी चला गया।
- बच गये।
- वह दिन और आज का दिन। उस पड़ोस के घर में कोई झगड़ा नहीं। कोई ऊॅंची आवाज नहीं।
- शराब भी नहीं पीता।
- बिल्कुल नहीं। दफतर से सीधा घर।
- तुम्हारी पत्नि क्या कहती है इस के बारे में।
- उस का कहना है कि देखा तुम ने कड़वा चौथ के व्रत का असर।
- रखने का या न रखने का?
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