आगे की सोच
आगे की सोच
- सुनो, राधिका, मुझे कुछ कहना है।
- हॉं, मुझे पता है कि क्या कहना है और मेरा जवाब न में है।
- वह तो मुझे भी पता है पर मेरा कहना ज़रूरी है उसी तरह जिस तरह तुम्हारा न कहना।
- व्यर्थ में समय क्यों बरबाद किया जाये जब प्रश्न भी पता है और उत्तर भी।
- कभी कभी गम को हल्का करने के लिये भी कहना ज़रूरी होता है।
- गम को ज़प्त करने का मादा भी होना चाहिये। हर स्थान पर, हर समय रोने से प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है।
- खुशी बॉंटने से दुगनी हो जाती है। गम बॉंटने से आधा रह जाता हैं।
- वह तब जब कोई इसे बॉंटना चाहे। मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है।
- किसी का जी हलका करने के लिये दो मिनट दने में क्या हर्ज है।
- दो मिनट में बात खत्म कर लेना।
- ठीक है, दो मिनट क्या, एक मिनट ही बहुत है।
- कहो
- मैं तुम से प्रेम करता हूॅं।
- मुझे मालूम है।
- मैं तुम से शादी करना चाहता हूॅ।
- मुझे मालूम है।
- तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा है।
- मेरा उत्तर न में है।
- क्यों?
- यह मैं नहीं बता सकती।
- पर मुझे मालूम है।
- कैसे
- जब तुम हस्पताल में थी तो मैं डाक्टर अवस्थी से मिला था। उस ने बताया था।
- फिर भी तुम शादी करना चाहते हो मुझ से।
- इस में कोई शक है क्या।
- यह जानते हुये भी कि मैं कभी मॉं नहीं बन सकती।
- लेकिन डाक्टर अवस्थी ने कहा था कि बीवी या पत्नि बनने में कोई रूकावट नहीं है।
- क्या?
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