अथ श्री रावण कथा - 2
अथ श्री रावण कथा
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम।।
अथ श्री रावण कथा
महादेव नीलकण्ठ शिव तथा भवानी पार्वति की असीम कृपा से अभिभूत मैं शिवभक्त एक महान प्रतापी सम्राट] महावीर] महादानवीर] कृपालू] दशानन भूपति का जीवन वर्णन लिखने की धृष्ठता कर रहा हूaA यद्यपि मेरी लेखनी में उस महान आत्मा की स्तुति करने की क्षमता नहीं है। शिवकृपा का कुछ अंश मुझे भी प्राप्त हो] इस अभिप्राय से उस महा शिवभक्त महावीर का वर्णन करने का यह प्रयास उस महान प्रतापी सम्राट की आत्मा को समर्पित है।
राम तथा लक्षमण तथा उन के सैनाओं ने श्री लंका पर आक्रमण करने की दृष्टता की। परन्तु उन की महाप्रतापी दशानन के सम्मुख एक न चली। कई संग्रामों के अनुभव को धारित कर उन्हों ने बानर सैना को परास्त कर दिया। महाप्रतापी दशानन द्वारा नाग पाश में दोनों भ्राताओं का बन्दी बना लिया गया। उन्हें चक्रवर्ती सम्राट रावण के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर लंकापति रावण ने जो कहा उस से उस की उदारता] उस का धर्म प्रेम] उस की वीरता की झलक मिलती है।
रावण संवाद
मुझे खेद है कि आप अपने मनोरथ में सफल नहीं हो पाये। वास्तव में आप का जो ध्येय था वह मेरे सम्मुख केवल प्राथर्ना कर ही पूरा किया जा सकता था। अपनी गलती स्वीकार कर क्षमा याचना करने पर रावण कभी निराश नहीं करता। आप की सैना ने भी निश्चित हार को सामने देखते हुये भी वीरता कर प्रदर्शन किया] इस से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूa। विशेषकर हनुमान के साहस की प्रशंसा किया बगैर मैं नहीं रह सकता। वह सूझ बूझ वाले सैनापति हैं। उस ने पूर्व में भी हमारे राज्य में आ कर उद्दण्ता की थी जिस के लिये उसे यथोचित दण्ड उसे दिया गया। परन्तु इस युद्ध में उस के साहस तथा सूझ बूझ की प्रशंसा की जाना हो गी।
अब रही दण्ड देने की बात। सामान्यतः राज्य के विरुद्ध अपराध करने पर मृत्यु दण्ड देने की व्यवस्था है। परन्तु हमें यह जानकारी मिली है कि श्री लंका के विरुद्ध अभियान के पूर्व सागर तट पर आप के द्वारा हमारे आराध्य देव भगवान शिव जी की पूजा की गई थी। इस से आप शिव भक्त हो गये। इस कारण आप को मृत्यु दण्ड देना उचित नहीं हो गा।
यद्यपि दण्ड नहीं दिया जा सकता परन्तु हमें विश्वास है कि आप को श्री लंका की शक्ति का अन्दाज़ हो गया है तथा आप भविष्य में इस ओर अग्रसर नहीं हों गे। अतः आप को मुक्त किया जाता है तथा आप अयोध्या की ओर प्रस्थान कर सकते हैं।
पर इस में कुछ शर्तें हैं। राज्य के लालच में अपने बड़े भाई की धोके से हत्या करवाना सुग्रीव का भयानक अपराध है। इस लिये आप उन को अपने साथ ही रखें गे ताकि वह इस ओर न आ पायें। बाली के बेटे अंगद को किषकिन्धा का शासक नियुक्त किया जाता है। इसी प्रकार कुलद्रोही विभीषण को भी श्री लंका से दूर रखना हो गा। उस का अपराध क्षम्य तो नहीं है परन्तु हमारे यहॉं भाई की हत्या का पाप नहीं लिया जा सकता।
हमें आशा है कि आप अयोध्या लौट जायें गे तथा जिस भरत ने आप को राज्यच्युत किया है] उसे परास्त कर अपना राज्य पुनः प्राप्त करें गे। इस में हनुमान का गम्भीर योगदान रहे गा। हमें यह भी आशा है कि आप शिव भक्ति को अपने राज्य में तथा आस पास सशक्त करें गे।
(इस अवसर पर रामचन्द्र ने कहा कि चक्रवर्ती लंकापति ने जो ज्ञान दिया है, उस का मैं पालन करने का प्रयास करूं गा। जिस प्रकार आप ने विभीषण को भाई होने के नाते केवल निष्कासित किया और मुत्यु दण्ड नहीं दिया है] वैसे ही मैं भी भरत को मृत्यु दण्ड नहीं दे पाऊॅं गा। मुझे आशा है कि उस ने अपना सबक सीख लिया हो गा)
लंकापति सम्राट रावण ने कहा कि अब एक बात और रह गई है। इस सारे फसाद की जड़ आप का स्वरूपनखा का अंग भंग करना है। इस के लिये स्वरूपनखा को अधिकार है कि वह आप को उचित दण्ड दे। पर चूंकि हम ने आप को जीवन दान दे दिया है] इस कारण मृत्युदण्ड को छोड़ कर कोई भी दण्ड दिया जा सकता है।
स्वरूपनखा ने कहा कि जब भ्राता श्री चक्रवर्ती सम्राट रावण ने आप को जीवन दान दे दिया है तो उस के विरुद्ध जाने का प्रश्न ही नहीं हैं। परन्तु इस अपराध के लिये मैं आप का श्राप देती हॅू कि जिस सीता के कारण आप ने इतना अपराध किया है, उस का विछोह आप को सहना हो गा।
राम ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया कि वह और सीता एक प्राण दो शरीर हैं। उन से अलग रहना तो मुत्यु दण्ड के ही समान है। पूर्व में भी एक वर्ष तक मुझे विछोह सहना पड़ा है और अब और सहने की हिम्मत नहीं है। इस कारण मेरा बहन स्वरूपनखा से अनुरोध है कि वह अपना श्राप वापस ले लें।
स्वरूपनखा ने कहा कि दिया हुआ श्राप वापस नहीं लिया जा सकता। राम जी के बार बार कहने पर उस ने कहा कि वह थोड़ा संशोधन कर सकती हैं। यदि एक पतिव्रता नारी को उस के पति द्वारा उत्पीड़ित करने पर पति को उचित दण्ड नहीं दिया गया तो यह श्राप प्रभावी हो जाये गा तथा मत्यु पर्यन्त चले गा।
इस व्यवस्था के अनुसार राक्षस जाति] बानर जाति] तथा आर्य जाति में शांति स्थापित हो गई जो आज पर्यन्त चली आ रही है।
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