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जीवन का ध्येय

  • kewal sethi
  • Jun 18, 2020
  • 3 min read

जीवन का ध्येय

1982 में आकाशवाणी ग्वालियर ने एक पॉंच मिनट का कार्यक्रम प्रात: आरम्भ किया था। नाम था —— चिंतन। इस मे उन्हों ने नगर के गणमान्य व्यक्तियों से अपने विचार व्यक्त करने को कहा था। आयुक्त होने के नाते मेरी गणना भी इन में हा जाती थी। उस समय मैं ने दो तीन बार इस में भाग लिया। मेरे पूछने पर उन्हों ने कहा कि यदि मैं इस का संदर्भ दूॅं तो मैं इसे प्रकाशित भी कर सकता हूॅं। इस कारण उन्हें धन्यवाद के साथ इसे पेश कर रहा हूॅंं। यह विचार बहुत गम्भीर तो नहीं हैं पर जेसे हैं , वैसे पेश हैं — चिंतन

मनुष्य के जीवन का ध्येय क्या है. यह प्रश्न कई दार्शनिकों ने उठाया है. अनेक महापुरुषों ने इस पर अपनी राय प्रकट की है। कहना अनुचित न होगा कि यह सब से प्राचीन प्रश्न है. इसके उत्तर बदलते रहे हैं. समाज के अनुसार, समय के अनुसार, स्थान के अनुसार. पर कोई भी उत्तर शाश्वत नहीं रहा है. रहा है तो केवल यह सिद्धॉंत कि मनुष्य को निर्लिप्त रहना चाहिए. इस बात पर सभी एकमत है। अन्तत: सभी को इस संसार से जाना है. जो आया है वह जाये गा, जो बना है वह टूटेगा, जो पैदा हुआ है, उस की मृत्यु निश्चित है। यह सिद्धॉंत निराशावादी नहीं है. वह यह नहीं कहता कि कर्म नहीं करना है। निर्लिप्तता जीवन का एक दर्शन है. यह कहने की बल्कि अपनाने की वस्तु है. इस का यह अर्थ नहीं है कि कोई कार्य किया न जाए या किसी कला की वस्तु का निर्माण न किया जाए. अच्छा काम करना, कलात्मक वस्तु का निर्माण करना बुरी बात नहीं है। पर कार्य किस भावना से किया जा रहा है, यह महत्वपूर्ण है। यह निर्लिप्तता के भाव सं किया जाना है. यह हमें काम करने से रोकती नहीं है, काम करने का एक नया तरीका सुझाती है. यह हमें अपने जीवन को अधिक शॉंत, अधिक अनुशासित, बनाने की ओर ले जाती है. जीवन का संग्राम हमारे चारों ओर चलता रहता है. हम भी इस संग्राम के एक पात्र हैं. लेकिन हम इन से अलग भी हैं. जैसे फिल्म निर्माण में लगा अभिनेता जानता है कि यह उस का वास्तविक जीवन नहीं है, उसी प्रकार हम में भी संसार में आसक्ति नहीं होना है. इस से अलग हो जाना है, . अपने परिवार के, हमारे देश के प्रति, अपने प्रति कोई कर्तव्य नहीं है, यह निर्लिप्तता का भाव नहीं है. बल्किनिल्र्पितता तो हमें इस के लिए प्रेरित करे गी. हमें अपने कर्तव्य का अधिक बौध कराएगी. जब स्वार्थ समाप्त हो जाएगा तो परार्थ उत्पन्न हो गा. . निर्लिप्तता का भाव कमल पत्र पर पानी की बूंद के समान है. पानी की बॅंद पत्ते पर है पर पत्ते का भाग नहीं है. यदि वह अलग हो जाये तो कमलपत्र को कोई फर्क नहीं पड़ता. उसे स्वयं को कोई फर्क नहीं पड़ता। वह उसी प्रकार रहता है. निर्लिप्तता न तो अकर्मण्यता है और न ही अनैतिकता. इस का यह अर्थ नहीं है कि हम कुछ भी करने को स्वतन्त्र हैं। अनैतिक काम करने वाला यह तर्क नहीं ले सकता कि उस ने निर्लिप्त भाव से यह कार्य किया है क्योंकि वह कार्य उस की इच्छाओं की पूर्ति के लिए होगा. उस की इंद्रियों के सुख के लिए हो गा. उस की कामनाओं के अधीन हुआ हो गा. अत: वह निर्लिप्त कभी नहीं हो सकता. निर्लिप्त कार्य मिले तो सदैव दूसरों की भलाई के लिए होगा. निर्लिप्त होने की वास्तविक अर्थ है स्वयं के लिये फल की इच्छा न करना। इस स्थिति में ईश्वर के नाम पर कार्य का फल अर्पित करने का भाव रहेगा. अपने पास ही रखा रखने का प्रयोजन हुआ तो फिर निर्लप्तता कैसी. अतः उसे किसी ऐसे के नाम पर ही किया जा सकता है जिस की पहचान बताई नहीं जा सकती है. अन्यथा फिर उस में अप्नत्व का प्रश्न आ जाए गा. यह मेरा देश है, यह मेरा नगर है और जहां 'मेरा' की भावना आई निर्लिप्तता समाप्त हुई. यह नहीं कि देश महत्वपूर्ण नहीं है. नगर महत्वपूर्ण नहीं है। देश के लिये, नगर के लिये कार्य भी पुण्य का कार्य है। इस में अन्तर केवल भावना का है. नितर्लप्ताा वास्तव में जीवन से, देश से, संसार से भी ऊॅंची ईकाई को पहचानना है। ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना है. इस की पहचान शॉंत मन,एक रूपता, पूर्ण अनुशासन है. कर्म कर और फल की इच्छा न रख यही इस का सार है।


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