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चुनाव पर कुछ विचार

  • kewal sethi
  • Sep 9, 2025
  • 2 min read

चुनाव पर कुछ विचार


उप राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा है। इस में दो प्रत्याशी हैं। दो नहीं होते तो चुनाव नहीं होता इस लिये दो हैं। अब हैं तो वोट बटोरने का प्रयास तो किया ही जाना है। अब जिनके पास वोटर की नुकेल है, उस से नहीं मिलें गे तो खेल बदल सकता है। अब नुकेल वालेे को किसी अदालत ने अपराधी घोषित कर दिया है तो इस में हाय तोबा मचाने की क्या ज़रूरत है। नुकेल तो नुकेल है। अदालत ने इसे थोड़े ही अपराधी घोषित किया है। खैर, जलने वाले जला करें, हम तो अपने खेल खेेलें गे ही।

अब इस खेल में दूसरी आवाज़ है - आत्मा की आवाज़ पर वोट देने की। चलिये इसी बहाने पता चला कि वोट देने वालों की आत्मा भी होती है। अपना विचार तो यह था कि जब उसे संसद के लिये प्रत्याशी बनाया जाता है तो पहली शर्त यह होती है कि आत्मा को हाई कमाण्ड के पास जमा करवाना पड़ता है। वैसे ही जैसे कानून में प्रत्याशी बनने के लिये ज़मानत जमा कराना पड़ती है। यदि उतने वोट नहीं मिलें जितनी प्रत्याशी की अपेक्षा है तो यह ज़मानत ज़प्त भी हो सकती र्है। इसी प्रकार अगर प्रत्याशी हाई कमाण्ड की मंशा के अनुसार मतदान न करे तो उस की आत्मा ज़प्त कर ली जाती है और उस की सदस्यता समाप्त हो जाती है। जब सदस्यता समाप्त हो जाती है तो उस की आत्मा उस के पास लौट कर आ जाती है और वह इसे दूसरे दल को ज़मानत के रूप में देने के लिये अधिकृत हो जाता है।

पर आत्मा के अतिरिक्त एक अन्तरात्मा भी होती है। यह आत्मा से थोड़ी भिन्न होती है। इसे हाई कमाण्ड के पास जमा नहीं करना पड़तां। परन्तु वास्तविक जगत में इस का कोई उपयोग नहीं होता है सिवाये तब जब गुप्त मतदान होता है। उस में हाई कमाण्ड बेबस हो जाता है। इस लिये हर प्रत्याशी अन्तरात्मा के नाम पर वोट मांगता है। आत्मा के नाम पर वोट मॉंगना अपराध है पर अन्तरात्मा के नाम पर नहीं।

एक और वस्तु भी होती है वोट मॉंगने के लिये। इसे संविधान कहते हैं। वास्तव में संविधान इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि वह पुस्तक जिस में इसे लिखा होता है। इसी किताब के नाम पर शपथ ली जाती है। एक नेता इसे सब को दिखा कर कहते हैं कि संविधान खतरे में है यानि कि यह किताब खतरे में है। इसे उन से छीन लिया जाये गा। इस किताब का रंग लाल रखा गया है जो खतरे की निशानी है ताकि किसी को शक न रहे कि खतरा नहीं है। वैसे हरा भी रख सकते थे, पीला भी, नीला भी पर उस से वह प्रभाव नहीं पड़ता। यही नेता नहीं, सभी प्रत्याशी इस किताब को बचाने के चक्कर में रहते हैं। यह किताब दूसरे के हाथ में पड़ गई तो कयामत आ जाये गी यानि कि उन की शामत आ जाये गी।

होता है यह तमाशा शबो रोज़ मिरे आगे।

हम तो तमाशाई हैं, बाकी की वह जानें।।

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