घर की बात
- kewal sethi
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घर की बात
रात के नौ बजने वाले थे। दरवाज़े की घण्टी बज उठी।
इस वक्त कौन आया होगा, पत्नि ने पति से पूछा।
देख कर ही पता चले गा, कहते हुये पति ने दरवाज़ा खोला और चौंक गया।
‘‘सुधा, तुम? इस वक्त। और प्रणेश कहॉं है। सब खरियत है न।’’
सुधा सुबक उठी।
‘‘चलो, चलो, अन्दर आओ,बताओ तो क्या बात है। परेशान क्यों हो।’’
मॉं ने जल्दी से उसे एक गिलास में पानी दिया ताकि कुछ दम ले पाये।
पानी पी कर थोड़ी शॉंत हुई। बताया ‘‘प्रणेश तो दौरे पर गया है। तीन चार दिन में लौटने का कह रहे थे।’’
‘‘पर तुम्हें घर छोड़ने की क्या ज़रूरत थी। आगे तो ऐसा नहीं होता था।’’
एक बार फिर सुधा को रुलाई आ गई। फिर शांत हुई तो बताया कि प्रणेश के पिता कह रहे थे कि प्रणेश के रोज़ रोज़ दौरे से वह परेशान हैं। चाहते हैं कि वह कोई दुकान शुरू करे।
‘‘तो इस में इस वक्त घर छोड़ने की क्या बात है’’
‘‘उन का कहना है कि मैं अपने पिता से 50,000 रुपये ले कर आऊ।, तभी कुछ हो पाये गा।’’
सुधा ने बताया कि तीन चार रोज़ से यही चल रहा था और मॉं जी भी यही रट लगाये हुई थी।
आज उन्हों ने घर से निकाल दिया कि जब पैसा ले कर आओ गी, तभी धर में घुसना।
‘‘पर इतनी रात’’
‘‘मेरा ख्याल था, वह थोड़ी देर में शांत हो जायें गे। तब मैं घर में जा सकूॅं गी। मैं ने कहा भी कि कल आप से बात करुं गी। पर उन्हों ने दरवाज़ा ही नहीं खोला। तो मैं क्या करती। पैसे वगैरा भी पास नहीं थे तो पैदल ही यहां तक आना पड़ा। इस लिये देर हो गई।’’
‘‘चलो, पहले मुॅंह हाथ धो लो। खाना भी कहॉं खाया हो गा। कुछ खाओ पियो। सुबह देखें गे’’। मॉं ने कहा।
‘‘अरे, देखना क्या है। उस का बाप बहुत लालची है। जितना दे दो, उतना उस के लिये कम है। यह पचास हज़ार तो पहली किस्त हो गी। शादी में ही पच्चीस हज़ार नकद की मांग पर अड़ गये थे। पता नहीं, उन को कब संतोष हो गा।’’
मां ने कहा कि कल मिल कर बात तो करना पर पिता ने साफ मना कर दिया। कहा, ‘‘मैं उस के मुॅंह नहीं लगना चाहता। गुस्सा आ गया तो कण्ट्रोल नहीं कर पाऊं गा’’।
छह दिन सुधा अपने मां बाप के घर रही। सुसराल से कोई संदेश नहीं।
सातवें दिन सुबह नौ बजे दरवाज़ा खोला तो सामने प्रणेश खड़ा था।
थोड़ी हैरानी तो हुई और गुस्सा भी आया पर कुछ ठण्डे दिल से सोचा और कहा,
‘‘ आओ, आओ, बहुत दिन में याद आई। पिता जी का क्या हाल है’’
‘‘पता नहीं’’, प्रणेश ने कहा, ‘‘मैं ने घर छोड़ दिया है।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘अरे, वहॉं खड़े खड़े ही बात करो गे क्या?’’ मां ने कहा, ‘‘आओ बेटा, बैठो , क्या लो गे, चाय या ठण्डा’’।
उस ने सुधा को आवाज़ दी - सुधा, देखो कौन आया है।
सुधा कमरे से निकली तो हैरानी से प्रणेश को देखा। ‘‘आप’’?
‘‘ हॉं बेटा, रास्ता भूल गया है’’, पिता ने कहा।
‘‘रास्ता भूला नहीं, सही रास्ते पर आ गया हूॅ’’, प्रणेश ने कहा, ‘‘सुधा चलो, अपने घर चलें’’।
‘‘कौन से घर?’’ पिता ने पूछा।
‘‘मैं ने एक घर किराये पर ले लिया है। अब हम वहीं रहें गे’’- प्रणेश।
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