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खवाब दर खवाब

  • kewal sethi
  • 13 hours ago
  • 2 min read

खवाब दर खवाब


मेरे ख्वाब भी बड़े अजीब होते हैं। अब देखिय,े कल रात को खवाब आया कि मैं खवाब से जग गया हूॅं। और फिर मुझे नींद नहीं आ रही। करवटें बदलते हुये जब समय हो गया तो उठ बैठा। और तो कुछ करने को था नहीं, बाहर टहलने निकल गया कि थकावट हो गी तो षायद सो सकूं। रात्रि का अंतिम पहर था। सुनसान सी सड़क। चला जा रहा था तो एक कचरा बीनने वाला दिख गया। उस ने भी मुझे देख लिया। बोला - सेठ, तुम क्या सवेरे सवेरे बीनने निकल पड़े। मैं बोला -

- तुम्हें क्या मैं सेठ दिखता हूॅ।

- बुरा मत मानना, हमारी बरादरी ने फैसला किया है कि हम एक दूसरे को सेठ ही कहें गे। पर तुम कहो, सेठ, क्या बीनने निकले। थैला तो दिख नहीं रहा है।

- मैं कचरा बीनने वाला नहीं। पत्रकार हूॅं - घमन्तु पत्रकार। स्टोरी इकठ्ठी करता हूॅं।

- तो मेरे ऊपर ही एक स्टोरी बना दो न, सेठ।

- तुम्हारे जैसे ही किसी पर पिछले महीने बनाई थी। सम्पादक बोला, यह क्या कचरा उठा लाये हो।

- हॉं, अखबार वालों को तो बस यह चाहिये कि मोदी ने कौन सी गप मारी। राहुल ने किस को गाली दी।

- सही कहा, उन्हें तो चटपटी खबर चाहिये। किसी सेठ की कहानी से क्या मतलब।

- तो तुम्हें चटपटी खबर चाहिये। आगे दूसरी गली में बायें मुड़ जाना। मिल जाये गी।

सोचा, जाने क्या देख कर आया है यह। चलो चल कर देखते हैं। तो बताई गई गली में मुड़ गया। कोई ढंग की चीज़ दिखी नहीं जिसे चटपटी कहा जा सके। बस एक मकान के बाहर एक व्यक्ति दिखा। चलो, इस से ही बात करते हैं।

- क्यों भाई क्या कर रहे हैं।

- देख रहे हो आलू छील रहा हूं। और यह प्याज़ भी काट कर रखें हैं।

- क्या करों गे इन का, यह तो काफी अधिक लग रहे हैं।

- नत्थू स्वीट मार्ट को जानते हो।

- अरे क्येां नहीं। क्या लज़ीज़ पकौड़े बनाता है। मज़ा आ जाता है।

- तुम भी पप्पु ही ठहरे।

लो यहॉं भी पप्पू आ गया। सेठ ने भी उसे याद किया था। यह राहुल उर्फ पप्पू क्यों इतना पापुलर है। पर ज़ाहिरा तौर पर इतना ही कहा

- पप्पु? वह कैसे भाई।

- जैसे पप्पू बात करता है, वही बात है। नत्थू पकौड़े बेचता है, बनाता नहीं है। पप्पू भी बोलता है, सोचता कोई और है।

- और मोदी जो गप मारता है, वह (मुझे सेठ की बात याद आ गई)

- मोदी? उस के पास तो ढेर सारे सरकारी अफसर हैं। वे और करते क्या हैं। मोदी को बताते हैं, क्या कहना है।

- तो कभी वह अपने मन से नहीं कहता। मन की बात तो हर महीने आती है।

- कभी कभी कह जाता है।

- जैसे कि?

- अब उस ने कहा कि पकौड़े बनाना भी बिसनैस है। तो मैं भी पकौड़े बनाने लगा।

- तो क्या तुम इंजीनियर हो।

- नहीं, मैं तो एम बी ए हूं।

- तो फिर अमरीका क्यों नहीं गयेे।

- अमरीका जाते है अहमदाबाद, बंगलौर वाले। छोटे षहरों वाले नहीं। हम यहीं फिट बैठते हैं।


बस, यहीं तक। मुझे कहानी मिल गई और नींद भी खुल गई। नींद के साथ आंखें भी खुल गई - अक्षरषः भी, सांकेतिक भी।

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