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लाल बत्ती

  • Dec 22, 2025
  • 3 min read

लाल बत्ती

भारत स्वतन्त्र तो काफी देर से हो गया है पर हम सामन्तवाद से मुिक्त नहीं पा सके। सामन्तवाद की विशेषता थी कि हर व्यक्ति का स्थान एवं क्रम निश्चित था। यह कई चिन्हों के माध्यम से प्रकट होता था। यहाँ तक कि पगड़ी के अंदाज़ से भी इस का पता लगाया जा सकता था। इस भूतकाल के प्रभाव का ही प्रताप है कि आज भी यह चिन्हों का प्रेम सर्वत्र दिखाई देता है।

यह स्वाभाविक सा लगता है कि चपरासी अपनी चपरास से, अधिकारी अपने बंगले के आकार से, मंत्री अपनी कार की संख्या से और नेता अपनी ज़ैड श्रेणी की सुरक्षा से हर किसी को प्रभावित करने का प्रयास करे। आलीशान बंगले, शानदार वाहन, साथ में मुसाहबों का हजूम यह हमारे लिये आवश्यक ही नहीं हैं, अनिवार्य हैं। कभी हाथी पर बैठ कर जलूस घूमता था। अब ऊँचाई का ज़माना तो नहीं है पर साथ में काली बिल्लियाँ अर्थात ब्लैक कैट रखने का ज़माना है। जिस के साथ जितनी अधिक काली बिल्लियाँ हैं वह उतना बड़ा नेता माना जाये गा। इसी कारण ज़ैड वर्गीकरण की लालसा मन में बनी रहती है। और इसे विरासत में देने का रिवाज भी चल पड़ा है। प्रधान मंत्री की बीवी बच्चे ही क्या, उस के दामाद और नाती को भी इन की आवश्यकता रहती है। और वे जब प्रधान मन्त्री नहीं रहते हैं तो उस के बाद भीं।

अधिकारी कुछ अपवादों को छोड़ कर बिल्लियों के योग्य तो नहीं पाये गये पर इस के स्थान पर दूसरे चिन्ह तो उपलब्ध हैं। इन में से एक चिन्ह है लाल बत्ती। किसी समय यह केवल कानून एवं व्यवस्था देखने वालों को घटना स्थल पर जल्दी पहुँचने के लिये एक सुविधा थी या फिर बीमार घायल व्यक्ति को शीघ्र चिकित्सालय पहुँचाने का एक साधन। अब यह केवल प्रतिष्ठा का प्रश्न बन कर रह गया है। हर बड़ा अधिकारी जो अपने को बड़ा समझता है, लाल बत्ती लगा लेता है। इस खेल में बड़ा आनन्द आता है।

किसी पुस्तक में एक उल्लेख पढ़ा था। खरगोश और क्योट, जिस का भोजन खरगोश था, का। जब खरगोश बहुत हो जाते हैं तो क्योट के लिये उन्हें पकड़ना आसान हो जाता है। इस से खरगोशों की संख्या कम हो जाती है। क्योट को पूरा भोजन नहीं मिल पाता जिस से वह कमज़ोर हो जाते हैं। इस से वह खरगोश को पकड़ नहीं पाते और उन की संख्या बढ़ जाती है। संख्या बढ़ जाने पर क्योट उन्हें आराम से पकड़ सकते हैं। यह क्रम चलता रहता है।

कुछ ऐसी ही हालत लाल बत्ती की लगती है। हर अधिकारी (जिन में मंत्री, मंत्री के समकक्ष घोषित, अपने को मंत्री के समकक्ष समझने वाले शामिल हैं) लाल बत्ती लगाता है। हर अधिकारी, जो अपने को बड़ा समझता है (और सब समझते ही हैं), लाल बत्ती लगा लेता है। इस से लाल बत्ती का महत्व कम हो जाता है। फिर सरकार एक परिपत्र जारी करती है। इस में लाल बत्ती न लगाने के आदेश होते हैं। फिर पुलिस इन गाड़ियों की बत्ती उतार देती है। ऐसी कारें कम हो जाती हैं। जो रह जाती हैं उन्हें सम्मान मिलना शुरू हो जाता है। फिर हर अधिकारी व नेता, जो सम्मान के बिना नहीं रह पाता, अपने लिये लाल बत्ती के आदेश माँगता है। इस के लिये जोड़ तोड़ की जाती है। धीरे धीरे इन की संख्या बढ़ जाती है। और वही खरगोश वाला किस्सा शुरू हो जाता है।

स्पष्ट है कि लाल बत्ती के लाभ होते हैं। इसी कारण तो सब कोई इन के पीछे भागता है। या प्रकारान्तर से कहें तो हर कोई इन के नीचे बैठ कर भागना चाहता है। सैना में झण्डा लगी कार का जो महत्व है वही पुलिस के लिये लाल बत्ती का है। सैना में कर्तव्य पर तैनात व्यक्ति को किसी अधिकारी के पद का ज्ञान नहीं होता है विशेषतया असैनिक अधिकारियों के पद का। यही कारण है कि झाँसी के आयुक्त ने अपनी कार पर भी एक झण्डा और तीन स्टार लगा लिये थे। मुझे याद है कि मैं ने भी ग्वालियर में इसी तर्ज़ पर एक झण्डा बना लिया था। स्टार लगाने की नौबत आती, उस से पहले मुझे उस पद से हटा दिया गया।

अभी जब राष्ट्रपति भोपाल आये थे तो लाल बत्ती का महत्व देखने को मिला। लाल बत्ती वाली कारें आराम से भवन के अहाते में जा सकती थीं। बिना बत्ती वाले वाहन को एक किलोमीटर दूर स्थल पर रुकने को कहा जाता था। भले ही दोनों को उसी कार्यक्रम के लिये एक से निमन्त्रण पत्र दिये गये थे। कार पार्किंग लेबल देखना कठिन है पर बत्ती आराम से नज़र में आ जाती है। ऐसे नज़ारे रोज़ देखने को मिल जाते हैं।

अंतिम समाचार मिलने तक लाल बत्ती का यह मनोरंजक खेल जारी था।

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