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यात्रा भत्ते की सम्भावनायें - 2्

  • kewal sethi
  • Jun 19, 2025
  • 3 min read

यात्रा भत्ते की सम्भावनायें - 2्र


जी फाईल नाम की एक संस्था है जो उन अधिकारियों का सम्मान करती है जिन्हों ने प्रशासनिक कार्य में नवाचार किया हो। बहुत सुन्दर विचार है। यदि यह संस्था हमारे ज़माने में होती तो इस में कोई संदेह नहीं है कि हमारे वित्त सचिव श्री शिवरमन को यह सम्मान मिलता। बल्कि एक बार से अधिक मिलता। उन का प्रशासन में योगदान अवलोकनीय है। एक वाक्या प्रस्तुत है।

वरिष्ठ अधिकाियों को सरकारी कार मिलती ही है। और इस में भी शायद ही किसी को संदेह हो कि इस कार का उपयोग सरकारी कार्य के अतिरिक्त अन्य कार्य के लिये भी किया जाता है। और अधिकारी का परिवार इस से लाभ न उठाये, यह तो अकल्पनीय है। अब इस उपयोग को किसी आदेश द्वारा रोकना भी कठिन है। वैसे ऐसे आदेश तो समय समय पर जारी होते ही रहते हैं।

तो हमारे मित्र के मन में विचार आया (या शायद उन की श्रीमती ने सुझाया हो) कि इस उपयोग का कुछ लाभ उठाया जाये। इस कारण उन के कहने पर शासन का आदेश हुआ कि अधिकारी से 120 रुपये प्रति माह कार के ऐसे उपयोग के लिये वसूल किये जायें गे तथा इसे वेतन से ही काट लिया जाये गा।

देखिये, बैठे बिठाये शासन का आय का एक स्रोत बन गया। अब ऐसे नवाचार पर सम्मान होना ही चाहिये।

(यह अलग बात है कि हमारी श्रीमती का जब पता लगा तो कार का बाज़ार जाने के लिये उपयोग करने पर हमारी बात को हवा में उड़ा दिया गया)।


कुछ समय के बाद श्री शिवरमण के मन में एक और विचार आया। (इस में श्रीमती शिवरमण का हाथ तो स्पष्टतः ही नहीं था। शायद उन के ड्राईवर का रहा हो)। सरकारी कार दौरे पर भी इस्तेमाल की जाती थी (और अब भी की जाती है) और यह समय चालक द्वारा पैट्रोल का हिसाब किताब रखने में काम आता है। अब बीस लिट्टर भरवाया और पच्चीस की रसीद ली तो इस को कैसे चैक किया जाये। पैट्रोल पम्प और ड्राईवर की मिली भगत अब और कब काम आये गी। दोनों का फायदा। अधिकारी तो पैट्रोल भरवाने के लिये जा नहीं सकता। अपनी निजी कार के लिये भी वह कई बार नहीं जाता।

तो इस तरह के उपयोग को रोकने का कैसे बन्दोबस्त किया जाये। यहॉं पर श्री शिवरमण को एक अनोखा विचार आया। उस ज़माने में कार के माडल होते ही कितने थे। उन्हों ने तय किया कि हर माडल में प्रति लिट्टर गाड़ी कितनी चलती है, इस की संगणना की जाये। इस के लिये विभिन्न माडल के लिये ऑंकड़े तय किये गये। तदानुसार शासकीय आदेश निकाले गये।

इस के बाद महीने में गाड़ी कितनी चली, यह देख कर देय राशि को तय किया जाये गा। और यह दैनिक भत्ते का भाग हो गा। अब ड्राईवर क्या करे गा। मीटर को आगे बढ़ाना तो बहुत कठिन कार्य है। शासन को बचत तो हो गी ही।

(नोट - अगली बार जब मैं शासकीय कार से दौरे पर गया तो ड्राईवर को कहा कि कार पचास से अधिक गति से नहीं चलना चाहिये। इस पर बेहतरीन माईलेज मिलती है। संगणा के अनसुार यह शासन द्वारा निधार्रित माईलेज से दो या तीन किलो मीटर अधिक थी। नतीजा उस यात्रा के लिये अधिक पैसा दैनिक भत्ते के रूप में मिला। जब वित्त सचिव को बताया तो उन का कहना था, ऐसे संगणना करने वाले अधिकारी यदि शासन में अच्छी संख्या में होते तो प्रदेश उन्नति के शिखर पर होता। किसी आदेश की आवश्यकता ही नहीं होती)

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