मोबाईल वार्ता
- kewal sethi
- 15 hours ago
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मोबाईल वार्ता
-- कहो भाई, कैसे हो।
-- बढ़िया। और आप?
-- सुख शांति। बहुत दिन हो गये, मुलाकात ही नहीं हुई।
-- हां भई, अब वह आई आई्र टी का ज़माना तो है नहीं कि हर रोज़ सुबह सुबह तुम्हारी मनहूस शकल देखनी पड़े।
-- पर उस शकल को देखे बिना रहा भी तो नहीं जाता था।
-- अब तो मुद्दत हो गई।
-- ज़माना है ही ऐसा। कमाने के चककर में सब रह जाता है।
-- और मिले भी तो अजीब सी स्थिति में।
-- हॉं, मझे याद है कि हम मिले थे जब सुरेश नहीं रहे थे।
-- मिले भी तो शमशान घाट में। बेचारा। कितने अरमान थे उस के और सब रह गये।
-- हॉं, वह तो है। पर अपनी मुलाकात उतनी ही रह गईं।
-- कालेज के दिनों की बात तो कर ही नहीं पाये।
-- और अपनी मुलाकात तब भी रह गई जब तुम मुम्बई से जनेवा जा रहे थे।
-- अरे, हॉं, उस में तीन चार घण्टे का ब्रेक था दिल्ली में तो मौका था मिल कर किसी पास के होटल में बैठने का।
-- ऐन मौके पर फलाईट ही र्कैंसल हो गई और फिर दूसरी फलाईट पर बुक कर दिया जो सीधे ही जेनेवा जाती थी
-- उस के बाद तो मौका ही नहीं लगा।
-- वक्त की बात है।
-- अब कब मिलें गे, दिल तो कहता है कि दरवाज़ा खोलूं और तुम को सामने पाऊॅं।
-- तो दरवाज़ा खोलो न। मैं दरवाज़े के इधर खड़ा हूं।
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