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भौगोलिक स्थिति का धर्म पर प्रभाव

kewal sethi
Aug 28, 2020
5 min read

भौगोलिक स्थिति का धर्म पर प्रभाव


मध्य एशिया से निकले इन तीनों धर्मों (यहूदी, ईसाई, इरस्लाम)में समानता यह थी कि तीनों एकेश्वरवादी है। विपरीत प्राकृतिक स्थितियों के कारण तीनों में व्यक्ति के स्थान पर सामाजिक एकजुटता पर अधिक ध्यान दिया गया है। इस्लामी शैली में इसे इजतिमाहित कहा गया है। इसलिये व्यक्तिगत स्वतंत्रता के स्थान पर धार्मिक पेश्वाओं और सत्ताधीशों का वर्चस्व बढ़ता गया.


मध्य एशिया के इन तीनों धर्मों का स्वभाव एक जैसा रहने का कारण वहां की जलवायु और अर्थव्यवस्था को भी है। रेगिस्तान में शाकाहारी वस्तुओं का अभाव था इसलिये मांसाहार उन की प्राथमिकता बन गई। जन्म से लेकर मृत्यु तक उन के जीवन में अस्थिरता, युद्ध, प्रतिशोध,और क्रूरता मुख्य आयाम बन कर रह गये। अरब के जन जीवन में जो त्यौहार, रीति रिवाज आदि देखने को मिलते हैं, वे सभी यहां की भौगोलिक परिस्थितियों से कहीं ना कहीं प्रभावित होते है। परिवार जन की मृत्यु के समय वह संवेदना देखने को नहीं मिलती है जो कृषि प्रधान देशों में आस्तित्व में है। जंगलों के अभाव में मुर्दे को गाड़ देने के अतिरिक्त क्या उपाय हो सकता था? रेगिस्तान की बंजर जमीन का कोई उपयोग नहीं था। जानवरों को चराने के अतिरिक्त कोई व्यवसाय नहीं था। उन के जीवन का सबसे बड़ा सहारा ऊॅंट था इसलिये उसे जान से प्यारा समझते थे। इस शुष्क और बंजर देश में अहिंसा की बात कुछ अटपटी ही रहती है। इसलिये खानपान और आचार में तामसिकता आज भी विद्यमान है.


कृषि प्रधान देश भारत से हिंदू धर्म का उदय हुआ। जैन और बौद्ध दर्शन की हवायें चलीं। अरब के पड़ोसी कृषि प्रधान देश ईरान में जरतुश्त और चीन से कन्फयूशियस धर्म की पताका फहरीं। यह सभी कृषि प्रधान देश है, इस लिये इन का स्वभाव व्यवहार भी कृषि सभ्यता के अनुसार था। इस का परिणाम यह हुआ कि अध्यात्म का प्रसंग यहां पर गूॅंजा और अहिंसा धर्म का प्राण है, ये नाद सर्वत्र गूजने लगा। इस का यह अर्थ कदापी नहीं हुआ कि यहां धर्म के नाम पर युद्ध नहीं हुये. लेकिन युद्ध के साथ क्षमा तथा करुणा की विचारधारा भी समाज में देखने को मिली। इस देशों में भी कुछ ना कुछ प्रतिशत में मांसाहार का चलन देखने को मिलता है, विषेशकर सागर के पास के इलाकों मे, लेकिन साथ ही उस का विरोध भी मौजूद है। चीन में शरद ऋतु में तब कृषि साधन नहीं थे तो जो भी उपलब्ध था, वही खाद्य पदार्थ था। कृषि प्रधान देशों में निकले धर्म लगभग सभी परिवार आधारित थे इसलिये उन में परिवार की एक जुटता तथा स्वतंत्रता पर भार अधिक था। लेकिन रेगिस्तान से निकले तीनों धर्म सामूहिक स्वभाव के होने के कारण उन में व्यक्ति के स्थान पर समाज तथा समाज के नेतृत्व ही सर्वे सर्वा था। इस का नतीजा यह हुआ कि कृषि प्रधान देश से निकलने वाले धर्मों में तानाशाही और कट्टरता नहीं पनपी, जबकि मध्य एशिया के धर्म बहुत जल्द स्वयं को तानाशाही में बदलने में सफल हो गये। उन की संस्थायें संस्थान बन गई, इस में जो कुछ था संगठन था, व्यक्ति की ना तो पहचान थी और ना ही उसकी कोई स्वतंत्रता। कठोर जीवन में उसे अपने ही जैसे लोगों की आवश्यकता पड़ती थी, जो आगे चल कर के कबीले बन गये, चूॅंकि उन की धर्मसत्ता ही राजसत्ता थी इस लिये वह राजनीतिक धर्म बन गये। अध्यात्म तथा राजनीति में प्रथमतः जो अन्तर होता है, वही अंतर कृषि प्रधान और रेगिस्तान से निकले धर्मों में स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इस स्थिति में यदि वह सहिष्णु और उदारवादी होते तो अपना वर्चस्व किस प्रकार स्थापित कर सकते थे। इस लिये हिंसा उन के जीवन में घुल मिल गई .


इस्लाम जब आस पास के देशों में पहुंचा तो उस ने अपने को बदलने से साफ इनकार कर दिया। उन्हों ने धर्म के नाम पर कोई समझौता नहीं किया। बल्कि जो कुछ था, जो कुछ प्राप्त किया, वह अपने धर्म की ही देन है, ऐसा विचार मन में ठूंस लिया। इस लिये मुस्लिम समाज बाहर निकलने के बावजूद अपनी रिवायत से अलग नहीं हुआ। उस की कबीलाई मनोभावना तनिक भी नहीं बदली जिसका परिणाम यह हुआ कि उसकी हिंसक मानसिकता नहीं बदल सकती जो आज भी ज्यों की त्यों है.


अपनी सोच से इस भावना ने इस्लाम को बहुत नुकसान पहुंचाया। अरब प्रायद्वीप के जो लोग इस्लाम को इंसान के सम्मान और स्वाभिमान को जगाने के लिये लाये थे वह उस ने अपने लिये तो माना लेकिन दूसरे धर्म के लोगों के लिये स्वीकार नहीं किया। प्रकृति के भिन्न-भिन्न जलवायु एवं पर्यावरण में शासक बन कर गया, परन्तु अपनी प्रारंभिक जीवन शैली को ही वहॉं पर लादने का प्रयास किया। अपने इस अलगाववादी चरित्र के कारण वह बहुत जल्द सामान्य जनता से अलग-थलग पड़ गया। किसी भी उदारता और संशोधन को उस ने अपने लिये रोड़ा समझा। इसलिये जब कभी उसे हार मिली तो मुसलमानों का एक बहुत छोटा वर्ग यह महसूस करता था कि अच्छे हथियार ना होने के कारण और तकनीक के अभाव के कारण वे विफल रहे। लेकिन बहुत बड़ा वर्ग यही समझता था कि छठी शताब्दी के इस्लाम की आत्मा उस में नहीं रही, इस लिये वह सफल ना हो सका। इस कारण कट्टरवादिता की ओर मुड़ना उसे आकर्षक लगा।


ईसाई समाज भी इस दौर से गुजरा किन्तु उदारवादी तथा समझदार गुट सतत लड़ा और इस गुट ने धर्म को सत्ता के बाहर धकेल दिया. लेकिन उन की भी हिंसक प्रवृति पर लगाम नहीं लगा। एषिया, अमरीका तथा आस्ट्रेलिया में मूल निवासियों का व्यापक संहार इस के उदाहरण हैं। अफ्रीका के मूल निवासियों को गुलाम बनाना भी इसी का एक रूप है।


लेकिन इस्लाम में मौलाना वर्ग ने यह आंशिक परिवर्तन भी नहीं होने दिया, जिस कारण इस्लाम सत्ता के संकीर्ण दायरे में ही बंधा रहा। कुल मिला कर जो अरबस्तान का जो पिंड था, मुस्लिम उस से छुटकारा प्राप्त नहीं कर सका। इस्लाम धर्म सलामती का धर्म है यह बात शेष दुनिया के गले नहीं उतरवा सका.


इस का परिणाम यह हुआ कि इस्लाम हर देश के भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश में जिस नजरिये से देखा जाना चाहिये, वह विचार धारा आगे नहीं बढ़ सकी. कुछ देशों के राजनीतिज्ञों ने भी इस स्वतन्त्र और राष्ट्रवादी धारा को अपने हित में सार्थक नहीं समझा, इस लिये कुल मिला कर इस्लाम को अपने प्राचीन रूप में ज्यों का त्यों रहने दिया। किसी धर्म के मूल सिद्धॉंत, जो सनातन है, उन में तो परिवर्तन का सवाल ही पैदा नहीं होता, लेकिन अपने देश की भाषा और अपनी संस्कृति में जब उस का रूपांतरण हो जाता है तो वह अधिक सरल और सुविधाजनक हो जाता है. उस का जो वाह्य रूप है, उस पर तो वार्तालाप की पूरी गुॅंजाईश है।


(‘‘इस्लाम और शाकाहार’’ पुस्तक पर आधारित। लेखक मुजफ्फर हुसैन। प्रकाशक विद्या विहार, नई दिल्ली)

इस पुस्तक का स्मर्पण इस अनुसार है -

‘‘स्मर्पण

उस मॉं के नाम

जिस ने अपनी छह बेटियों के साथ साथ छह गायों को भी अपने आंगन में स्थान दिया

उस पिता के नाम

जिस ने हर बेटी की विदाई के अवसर पर अपने दामाद से कहा

तुम्हें दो गायों को सौंप कर अपने सामाजिक दायित्व से मुक्त हो रहा हूं

दोनों की रक्षा तुम्हारा कर्म ही नहीं, जीवन का धर्म भी है और मर्म भी’’


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