धन्यवाद ज्ञापण
- kewal sethi
- 18 hours ago
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धन्यवाद ज्ञापण
एक तरह से देखा जाये तो गोडसे को धन्यवाद दिया जाना चाहिये कि उन्हों ने गांधी के सपने को साकार कर दिया।
एक बार गांधी ने कहा था कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बने गां। पाकिस्तान तो बन गया पर लाश नहीं बनी। नवाखली में कुछ दिन और रह जाते तो उन का सपना पूरा हो जाता। पर शायद यम देवता को वह जगह रास नहीं आई या फिर सरकार ने सोचा कि नवाखली तो पाकिस्तान में हो गा। साल में दो बार जन्म दिन पर और मरन दिवस पर पाकिस्तान सरकार की अनुमति ले कर जाना पड़े गा। इस लिये उन्हें दिल्ली लाया गया।
नोट करें कि उन्हे साबरमती आश्रम नहीं ले जाया गया जो उन का प्रिय स्थान था। वहॉं भी श्रद्धॉंजलि देने में थोेड़ी दिक्कत तो आती ही क्योंकि सरकार तो दिल्ली में थी। साथ ही आगुन्तक विदेशी सम्मानित महत्वपूर्ण अतिथि गण को भी असुविधा होती।
दिल्ली में वह बालमीक कालोनी में दो दिन रुके। पर यह जगह पहाड़गंज, नबी करीम और करोलबाग के बहुत पास थी। सरकार ने उन की सुरक्षा के लिये उन्हें अत्यन्त सुरक्षित स्थान नई दिल्ली पहुंचा दिया।
ऐसे में गोडसे को थोड़ी तकलीफ तो हुई हो गी पर उसे गांधी के सपने को साकार तो करना ही था। जो उस ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुये किया।
बाकी तो इतिहास है।
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