चंगेज खान - 2
- kewal sethi
- 4 days ago
- 8 min read
चंगेज खान
द्वितीय अध्याय
बोरते के मिलन के पश्चात तेमुजिन एक दौराहे पर खड़ा था। वह अपने पुराने समय में लौट जाये अर्थात शिकारी जीवन व्यतीत करे अथवा चरवाहा जीवन में आ जाये। अपने छोटे से कबीले में अपने परिवार की रक्षा करना उसे कठिन लगा। इस कारण उस ने जेमुका के साथ रह कर दूसरा रास्ता चुना। जेमुका ने पुनः भाईचारे अर्थात अन्दास का वायदा कियां। दोनो कबीले साथ ही रहने लगे।
यहॉं पर एक बात वषिष्ट रूप से बताना हो गी। जैसा कि बताया गया है एक विवाह तो सामान्य था और दूसरा अपहरित स्त्री के साथ था। दोनों की संतानों में अन्तर था। नियमित विवाह करने वालों की औलाद श्वेत वर्ग में कहलाती थी तथा अपहरित स्त्री वांले की औलाद अश्वेत वर्ग की। श्वेत वर्ग वाले अपने को वरिष्ट समझते थे। जेमुका श्वेत वर्ग का था और तेमुजिन अश्वेत वर्ग का। कुछ देर तक तो दोनो अन्दास के रूप में एक बराबर रहे। परन्तु दोनों का अपने साथियों से व्यवहार में अन्तर था। तेमुजिन अधिक मित्रवत था। इस कारण वह अधिक पसंद किया जाने लगा। जेमुका को यह पसंद नहीं आया। वह अपने को वरिष्ट मान कर चलता था। उस के मन में थोड़ा अन्तर आ गया।
एक बार जब शरद ऋतु आरम्भ हुई तो रस्म के अनुसार कबीले को दक्षिण के इलाके में जाना था जहां घास मिल सकती थी। उस समय जेमुका ने तेमुजिन को कहा कि वह भेड़ बकरी ले कर केरलन नदी के किनारे पर जाये जबकि वह शेष जानवर ले कर दूसरी ओर जाये गा। इन में घोड़े भी शामिल थे जो उन के जीवन चर्या को देखते हुये अधिक महत्व के मान्रे जाते थे। तेमुजिन का यह बुरा लगा और परिवार की सलाह से वह रातों रात अपने सभी जानवर ले कर अलग हो गया। उन का विचार था कि जेमुका पीछा करे गा किन्तु जेमुका ने ऐसा नहीं किया। पर इस से दोनोें में जो रार पैदा हुई वह बीस वर्ष के संघर्ष के रूप में प्रकट हुई।
उस समय तेमुजिन की आयु उन्नीस वर्ष की थी। उस समय उस ने निर्णय लिया कि वह एक योद्धा का जीवन अपनाये गा। अपने अनुगामी बनाये गा। मंगोल कबीले में नेता को खान कहा जाता था और तेमुजिन ने खान बनने का निर्णय लिया। अगले पांच साल तक जेमुका तथा तेमुजिन दोनो ने अपना अपना समूह बनाया और उस का विकास किया। तेमुजिन का विचार था कि अपने मंगोल कबीले को प्रभावशाली बनाये। इस के लिये उसे और साथी चाहिये थे। जिस के लिये उस ने प्रयास किया।
सताईस वर्ष की आयु में तेमुजिन ने खान बनने का दावा पेश किया। इस का तरीका यह था कि एक समागम बुलाया जाता था जिसे खुरिलताई कहा जाता था। इस में सभी को आमंत्रित किया जाता था। यह एक प्रकार का चुनाव था पर उस में वही शामिल होते थे जो सहमत थे। तेमुजिन ने खुरिलताई नीली झील के किनारे एक पर्वत के नीचे बुलाई थी। इस में अधिक लोग तो शामिल नहीं हुये पर खान की पदवी तो मिल ही गई। पर अभी भी वह ओंगखान के आधीन ही था। तेमुजिन ने अपना दूत ओंगखान के यहॉं भेजा जिस में उसे वरिष्ट माना तथा उस के प्रति वफादारी का वायदा किया। अेांगखान ने इस नई पदवी की मंज़ूरी दे दी। इस के बाद तेमुजिन ने कबीले के अधिकारियों की नियुक्ति की। बारचू और जैलमे, जो बहुत पूर्व से उस के साथ थे, को सर्वोच्च पद दिये गये। सब से महत्वपूर्ण पद खाना बनाने वालों का था। कुछ तीरअंदाज़ बने, कुछ जानवरों के रक्षक, कुछ कैम्प के रक्षक अर्थात पूरी व्यवस्था एक सुनियोजित स्वप्रशासित संगठन की हो गई।
उधर जेमुका ने भी अपनी व्यवस्था मज़बूत कर ली। उस के विचार में अश्वेत वर्ग वाला तेमुजिन उस की बराबरी नहीं कर सकता था। इस बार खुल कर संग्राम हुआ जिस में तेमुजिन की पराजय हुई। इस में जेमुका ने पकड़े गये लोगों को बहुत बेरहमी से मौत के घाट उतारा। कुछ को तो खोलते पानी में डाला गया जो मंगोल कबीले में अत्यन्त निकृष्ठ माना जाता था क्योंकि इस से व्यक्ति की आत्मा भी नष्ट हो जाती थी। दूसरी निकृष्ट बात खून का ज़मीन पर गिरना माना जाता था पर वह भी जेमुका ने किया जब सिर काट कर रोंधा गया। इस जुल्म का प्रभाव उलटा पड़ा और बहुत से नीची जाति के कबील्रे तेमुजिन की ओर हो गये।
मंगोल जाति में तातार कबीला अधिक जनसंख्या वाला तथा अधिक सम्पत्ति वाले थे। उन के दक्षिण में जुड़चंद नाम का कबीला था जो काफी मज़बूत था। वे मंगोल कबीलों के आपसी झगड़े में कभी एक ओर से तो कभी दूसरी ओर से सहायता कर उन्हें आपस में लड़ाते रहते थे। इस बार उन्हों ने तातार कबीले के विरुद्ध मोर्चाबन्दी की। ओग खान को एक ओर से आक्रमण का कहा और स्वयं दूसरी और से आये। ओंग खान ने तेमुजिन को साथ लिया तथा तातार पर आक्रमण किया। इस में सफलता हुई और बहुत सारा लूट का माल मिला। तातार समूह काफी स्मृद्ध था और ऐसी वस्तुयें तेमुजिन के साथियों को मिली जो उन्हों ने अपने पिछड़े इलाके में कभी देखी ही नहीं थी। तातार समूह के बच्चे भी सैटिन के कपड़े पहनते थे। इस अप्रत्यशित विजय के कारण और बहुत से कबीले तेमुजिन के पक्ष में आ गये।
तेमुजिन ने महसूस किया कि जुड़चन्द कबीले का तरीका मंगोल कबीलों को आपस में लड़ाने का था। वह कभी एक पक्ष में हो जाते तो कभी दूसरे पक्ष में। इस ऑतंरिक वैमन्यस्था का लाभ वह उठाते थे। तेमुजिन के विचार में इस स्थिति में परिवर्तन लाना चाहिये था। मंगोल संघर्ष में लूट का लोभ अधिक रहता था। दूसरे कबीले के लोग यदि कमज़ोर होते थे तो भाग निकलते थे तथा उन का पीछा नहीं किया जाता था। लूट अधिक आकर्षक थी। भागने वाले फिर से एक जुट हो जाते और इस प्रकार यह संघर्ष चलता रहता।
तेमुजिन ने जब तातार पर आक्रमण किया तो जुरकिन नाम के कबीले को भी सहायता के लिये कहा। जिस का उन्हों ने वायदा किया परन्तु ऐन समय पर वह आये ही नहीं। जीत के बाद जब दावत की गई तो उस में जुरकिन के लोगों को भी बुलाया गया था। इस दावत के समय घोड़ों की रखवाली के लिये बेलगुताई को नियुक्त किया गया था। जुरकिन कबीले के एक व्यक्ति ने घोड़ा चुराने का प्रयास किया और बेलगुताई ने उस का पीछा किया। उस समय जुरकिन के पहलवान बुरी ने उसे रोका और हरा दिया। मंगोल परम्परा के अनुसार उसे बेलगुतई को मार देना चाहिये था किन्तु बुरी ने केवल तलवार से एक छोटा सा वार किया जिस से खून निकला जिसे अपमान माना जाता था। एक और घटना में जब तेमुजिन वहॉं नहीं था तो जुरकिन के लोगों ने आक्रमण कर दस लोगों को मार दिया तथा घोड़े ले गये।
अपना क्षेत्र बढ़ाने के लिये तेमुजिन ने जुरकिन को चुना। उन्हें हराने के पश्चात तेमुजिन ने मंगोल परम्परा में परिवर्तन कर जुरकिन कबीले के प्रमुख व्यक्तियों की तो हत्या की परन्तु शेष को अपने कबीले में ही मिला लिया। इस के लिये एक खुरीतलाई कर सर्व सम्मति से निर्णय लिया गया। इस नई परम्परा से बार बार के संघर्ष को समाप्त करने का प्रयास किया गया। जुरकिन के जो लोग मिलाये गये, वह दास नहीं थे, जैसी कि परम्परा थी वरन् बराबर के सदस्य माने गये। इस में टोकन स्वरूप तेमुजिन ने जुरकिन कबीले के एक लड़के को अपना पुत्र मान कर परिवार में शामिल कर लिया।
इस मौके पर एक दावत की गई जिस में जुरकिन कबीले के व्यक्तियों को भी बुलाया गया। इन में बुरी पहलवान भी था। इस में दोस्ताना कुश्ती बेलगुताई और बुरी की गई जिस में बुरी तेमुजिन के गुस्से का शिकार होने के डर से हार गया परन्तु असल मकसद उसे मारने का था और इस प्रकार बदला लिया गया। इस से यह सन्देश गया कि किसी अपमान को सहन नहीं किया जाये गा।
जुरकिन पर विजय के बाद तेमुजिन ने अवरगा नाम के स्थान को अपना मुख्यालय बनाया जो अन्त तक उस का मुख्यालय रहा। यह दो नदियों के बीच में था तथा पवित्र पर्वत बुरखान खलदून के 200 किलोमीटर दक्षिण में था।
यहॉं पर एक मंगोल परम्परा का उल्लेख करना हो गा। कबीलों के युद्ध में पहली बात दुश्मन का डराने की होती थी। जब वह भाग जाते थे तो लूट होती थी। दुश्मन सुरक्षित रहता था। इस डराने के लिये शामन - ओझा - को भी सामने लाया जाता था। दोनो पक्ष के शामन अपना प्रयास करते थे जिस में ढोल इत्यादि बजाये जाते थे।
जेमुका की चुनौती अभी बरकरार थी। उस ने चुनौती के लिये खुरीतलाई बुलाई जिस में कई सम्भ्रान्त कबीले शामिल हुये। इस में जेमुका ने अपने गुर-खान होने की सहमति प्राप्त की। गुर-खान का अर्थ था सभी मंगोल कबीलों का प्रमुख। यह बात न केवल तेमुजिन के लिये चुनौती थी बल्कि ओंग खान के लिये भी। इस कारण दोनों ने मिल कर चुनौती को स्वीकार किया। इस युद्ध में ताईचिंद कबीला जेमुका के साथ था। दोनों सैनायें आमने सामने थीं। इस में शामनों द्वारा अपने पक्ष के विजयी होने का प्रचार किया गया। किस्मत से इस समय एक भयंकर तूफान आ गया। जेमुका के सैनिकों ने इस आसमानी सन्देश समझा और मैदान छोड़ कर भाग निकले। ओंग खान ने जेमुका का पीछा किया और तेमुजिन को ताइचिंद का पीछा करने को कहा। तेमुजिन तथा ताईचिंद की सैनाओं में दिन भर लड़ाई हुई जिस में ताईचुंद का पलड़ा भारी रहा। इस में तेमुजिन ज़ख्मी भी हुआ लेकिन ताईचिंद वालों को यह पता नहीं था। रात में ही ताईचिंद के सैनिक तितर बितर हो गये। तेमुजिन के लोगों ने पीछा किया। उन के अधिकतर नेता मारे गये तथा बाकी को तेमुजिन ने अपने साथ मिला लिया। तीस वर्ष पूर्व जिस परिवार ने उसे ताईचुंद के चुंगल से बच निकलने में मदद की थी, उसे दासता से मुक्त कर दिया। उधर जेमुका ओंग खान से बच निकलने में सफल रहा।
वर्ष 1202 में ओंग खान ने एक बार फिर तेमुजिन को तातार पर आक्रमण के लिये कहा। ओंग खान स्वयं मेरकिड के साथ संघर्ष के लिये पीछे रहा। इस आक्रमण में तेमुजिन ने सामान्य मंगोल युद्ध के नियमों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किये। एक यह कि जब तक पूर्ण विजय तक न हो जाये तब तक लूट का आरम्भ नहीं हो गा। दूसरा परिवर्तन यह कि लूट का माल एक स्थान पर इकठ्ठा किया जाये गा और तेमुजिन उसे सब योद्धाओं में बॉंटे गा। तीसरे जो योद्धा लड़ाई में नहीं रहे, उन का ह्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रिस्सा उस की विधवा तथा बच्चों में बॉंटा जाये गा। तातार हमले के पश्चात कुछ लोगों ने लूट का माल जमा नहीं कराया पर उन्हेें तमुजिन के गुस्से का शिकार होना पड़ा।
इन परिवर्तन से कुछ कबीलों के सरदार नाराज़ हुये क्योंकि वह अपनेे साथियों में लूट का माल अपने हिसाब से नहीं बांट पाये। उन में से कुछ जेमुका से जा मिले।
तातार पर विजय के पश्चात उन के नेताओं को भी मृत्यु दण्ड दिया गया जब कि शेष कबीले में शामिल कर लिये गये।
इस के साथ तेमुजिन ने एक बड़ा परिवर्तन और किया। उस ने सैना का पुनर्गठन किया। दस दस व्यक्तियों का एक दल बनाया गया। इस में सभी कबीलों के लोग थे। यह कहा गया कि इस दल के सभी सदस्य आपस में भाई हैं। कोई किसी को अकेला नहीं छोड़्रे गा। आयु में सब से अधिक व्यक्ति को दल का मुखिया बनाया गया। दस दलों को मिला कर एक ज़ागुन बनाया गया। इन का नेता उन के द्वारा चुना गया। दस ज़ागुन को मिला कर एक मिंगन बनाया गया। इस प्रकार मिंगन में एक हज़ार व्यक्ति थे। दस मिंगन का एक तुमेन बनाया गया जिय में दस हज़ार व्यक्ति थे। तुमेन के नेता को तेमुजिन द्वारा नियुक्त किया जाता था। जहॉं तक सम्भव था सैना के इस पुर्नगठन में पिता, पुत्र, भाई एक साथ एक मिंगन में रह सकते थे।
कबीले के सभी लो्गों में काम भी बांटा गया। यदि वे सैना में नहीं थे तो सप्ताह में एक दिन किसी सार्वजनिक कार्य में कार्य करते थे। इस में जानवर पालना, जलाने के लिये गोबर इकठ्ठा करना, औज़ार मरम्मत इत्यादि थे। संगीत को भी एक कार्य माना गया। स्पष्टतः ही श्वेत अश्वेत का कोई प्रश्न नहीं था।
एक काम और किया गया। ओनोन, खेरल्रेन, तुल नदियां जहां से आरम्भ होती थी, उन्हें तथा बुलखान पर्वत के इलाके को पवित्र करार देकर वहां सब का प्रवेश वर्जित कर दिया गया। केवल उस के अपने परिवार के लोग ही वहां जा सकते थे। अगले दो सौ साल तक राज परिवार के लोगों को वहां दफन किया गया। वहां बाहर को कोई व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकता था।
तातार विजय के बाद निस्संदेह अब तेमुजिन स्टेप के सब से महत्वपूर्ण व्यक्तियों में शामिल हो गया था।
(adopted from genghis khan -- jack weatherfort -- random house -- 2003)
Comments