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कृष्णामूर्ति और कबीर

  • kewal sethi
  • Jul 22, 2020
  • 3 min read

कृष्णामूर्ति और कबीर


दर्शन एक निरन्तर प्रक्रिया है। यह समय के साथ साथ विकसित होता है परन्तु मौलिक सिद्धाँतों में अन्तर नहीं आता है। कम से कम भारत में तो ऐसा ही होता है। यहाँ पर मूल सिद्धाँत बहुत पहले से निश्चित हो चुके हैं। परन्तु फिर भी हर चिन्तक के साथ कुछ न कुछ नवीन दृषिटगोचर होता है। जैसा कि बच्चन ने कहा था

स्थल भर गया है पथों से

नाम कितनों के गिनाऊँ

है जगह इतनी कहाँ

कि पथ अपना एक बनाऊँ

राह जल पर भी बनी है

पर कभी रूढ़ी हुई न वो

एक तिनका भी बना सकता

यहाँ पर मार्ग नूतन

भारत की यही खासियत है कि यहाँ पर रूढ़ीवाद कभी पनप नहीं पाया। इसी कारण यहाँ पर हर नये विचारक का स्वागत होता है। इन्हीं विचारकों में एक हैं कृष्णामूर्ति।

भारत की एक विशेषता यह भी है कि रूढ़ीवाद के अभाव में भी एक निरन्तरता दृषिटगोचर होती है। समय समय पर जो पुराने विचारक, कवि अथवा संत हुए हैं और उन्हों ने जो विचार व्यक्त किये हैं वही विचार नये विचारकों ने अपने शब्दों में कहे हैं। इसी लिये नये तथा पूराने विचारकों के मत मेल खाते हैं।

कृष्णामूर्ति बीसवीं सदी के प्रसिद्ध विचारक हैं तथा कबीर सौलवीं शताब्दी के। फिर भी इन में कई विचारों के बारे में समानता साफ दिखती है। न तो कबीर ने और न ही कृष्णामूर्ति ने कोई नया पंथ चलाने का प्रयास किया और न ही उन्हों ने कोई मठ स्थापित करने और अपनी परम्परा स्थापित करने का प्रयास किया। न तो कबीर ने और न ही कृष्णामूर्ति ने किसी वेद, किसी किताब या किसी विशिष्ट सिद्धाँत का प्रतिपादन किया। कृष्णामुर्ति का कहना था कि किसी सिद्धाँत के प्रतिपादन करने की आवश्यकता नहीं है मनुष्य अपना जीवन जिये, यही काफी है। कबीर ने कहा।

न मैं धर्मी न अधर्मी,

न मैं जाति न कामी हो

न मैं कहता न मैं सुनता

न मैं सेवक न स्वामी हो

न मैं बंधा न मैं मुक्ता

न मैं बिराती न रंगी हो

न कहु से न्यारा हौ

न कहु से संगी हो

कृष्णमूर्ति का विचार था कि पुण्य को विकसित नहीं किया जा सकता। वह तो स्वयं भू है। वह यह नहीं मानते थे कि संसार में अच्छाई तथा बुराई में युद्ध हो रहा है। यदि ऐसा हो तो एक की विजय हो गी और फिर उस का ही शासन हो गा। पर मनुष्य का अंतिम ध्येय तो आत्म स्वरूप को पहचानना है और उस अवस्था में न पाप न पुण्य बचता हैं

कबीर इस को दूसरी तरह से कहते हैं

अगम अगोचर गामी नहीं

तहाँ जगमग जोत

जहाँ कबीरा बंदगी,

पाप पुण्य नहीं होत

कृष्णामुर्ति ने कहा है कि ''इस सीमित संसार में मन का स्वरूप भिन्न है। वह उन बातों को भी ग्रहण कर लेता है जो इन्द्रियों के बस की बात नहीं है। वह ऐसे स्थान पर भी जा सकता जहाँ इन्द्रियाँ नहीं पहुँच सकती हैं। पर अन्त में मन की सत्ता भी समाप्त हो तो ही उच्च अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। क्योंकि मन के परे बुद्धि है जिस के द्वारा सभी ज्ञान का प्रत्यक्ष दर्शन किया जा सकता है।

कबीर ने भी इसी तर्ज पर कहा है

हद चले सो मानवा

बेहद चले सो साध

हद बेहद दोनों तजे

ता कर मति अगाध

कृष्णामूत्र्ति ने कभी अपने किसी आध्यात्मिक अनुभव का वर्णन नहीं किया। न ही कबीर ने अपने को साधारण मानव से अधिक निरूपित किया है। इसी प्रकार मुत्यु के बारे में भी दोनों के विचार समान हैं।

कृष्णामुर्ति की मानना थी कि विचार केवल निरन्तरता में ही उत्पन्न हो सकता है। और वह केवल उन वस्तुओं के बारे में हो सकता है जो अनुभव की गई हैं या फिर जिन के बारे में बताया गया है। कृष्णामूर्ति अगले जन्म की बात नहीं करते। वह केवल मृत्यु की बात करते हैं। मुत्यु के पश्चात भी आत्मा या चित्त जीवित रहता है। उस का निरन्तर रहना या न रहना उस के कर्मो पर निर्भर है। उन का कहना था ''मुत्यु का अर्थ नवीनीकरण है। एक ऐसा परिवर्तन जिस में विचार समाप्त हो जाते हैं। जब मृत्यु होती है तो एक परिवर्तन हो जाता है। आत्मा रहती है पर शरीर नहीं। पुर्नजन्म तो केवल परिवर्तित निरन्तरता है। जब पुर्नजन्म भी नहीं होता तो ही निरन्तरता समाप्त होती है।

कबीर के भी विचार में मृत्यु कोई भयप्रद बात नहीं है। वह तो उस की प्रतीक्षा करते हैं ताकि नये अनुभव हो सके

जा मरने से जग डरे

सो मेरे परमानन्द

कब मरहूँ कब देखियूँ

पूरण परमानन्द




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