top of page

मोबाईल वार्ता

  • kewal sethi
  • Feb 15
  • 1 min read

मोबाईल वार्ता

 

--     कहो भाई, कैसे हो।

--     बढ़िया। और आप?

--     सुख शांति। बहुत दिन हो गये, मुलाकात ही नहीं हुई।

--     हां भई, अब वह आई आई्र टी का ज़माना तो है नहीं कि हर रोज़ सुबह सुबह तुम्हारी मनहूस शकल देखनी पड़े।

--     पर उस शकल को देखे बिना रहा भी तो नहीं जाता था।

--     अब तो मुद्दत हो गई।

--     ज़माना है ही ऐसा। कमाने के चककर में सब रह जाता है।

--     और मिले भी तो अजीब सी स्थिति में।

--     हॉं, मझे याद है कि हम मिले थे जब सुरेश नहीं रहे थे।

--     मिले भी तो शमशान घाट में। बेचारा। कितने अरमान थे उस के और सब रह गये।

--     हॉं, वह तो है। पर अपनी मुलाकात उतनी ही रह गईं।

--     कालेज के दिनों की बात तो कर ही नहीं पाये।

--     और अपनी मुलाकात तब भी रह गई जब तुम मुम्बई से जनेवा जा रहे थे।

--     अरे, हॉं, उस में तीन चार घण्टे का ब्रेक था दिल्ली में तो मौका था मिल कर किसी पास के होटल में बैठने का।

--     ऐन मौके पर फलाईट ही र्कैंसल हो गई और फिर दूसरी फलाईट पर बुक कर दिया जो सीधे ही जेनेवा जाती थी

--     उस के बाद तो मौका ही नहीं लगा।

--     वक्त की बात है।

--     अब कब मिलें गे, दिल तो कहता है कि दरवाज़ा खोलूं और तुम को सामने पाऊॅं।

--     तो दरवाज़ा खोलो न। मैं दरवाज़े के इधर खड़ा हूं।

Recent Posts

See All
किस्सा एक वारदात का - 3

किस्सा एक वारदात का 3। और यह मामला। हुआ यह कि एक थे डा. वाडिया। अच्छे सुलझे हुए शल्य चिकित्सक थे। करीब 3 साल पहले जिले में आए थे। लंदन से एफ आर सी एस थे। हाथ अच्छा था। ऑपरेशन शायद ही कोई नाकामयाब

 
 
 
किस्सा एक वारदात का - 2

किस्सा एक वारदात का 2। इस स्टेज पर यह बताना आवश्यक है कि यह सब क्या है और क्यों है। इस के बिना पाठक को कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा हो गा। पात्रों का परिचय दिये बिना कहानी शुरू करना नई परिपाटी है और हम ने

 
 
 
किस्सा एक वारदात का

किस्सा एक वारदात का हैलो ।....... हॉ., मै. बोल रहा हूॅ. .........हॉ. हॉ., कहिये ..........हैलो .... गुड मार्निगं सर, मै. शर्मा बोल रहा हूॅ. .......... जी सर .......... जी सर ..........ठीक है सर, मै.

 
 
 

Comments


bottom of page