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संत ज्ञानेश्वर

kewal sethi
Oct 4, 2020
4 min read

संत ज्ञानेश्वर


संत ज्ञानेश्वर के दादा और पिता धार्मिक विचारों के थे और देशस्थ ब्राह्मण थे। उस के पिता विðल पंत आपगाॅंव के कुलकर्णी (लेखा पाल) थे। उन का विवाह अलन्दी के कुलकर्णी की बेटी रुकमणीदेवी के साथ हुआ था। एक बार संत ज्ञानेश्वर के पिता तीर्थ यात्रा पर काशी गये। वहाॅं पर उन्हों ने स्वामी रामानन्दाचार्य से दीक्षा ले ली तथा सन्यासी बन गये।


एक बार जब स्वामी रामानन्दाचार्य रामेश्वर की यात्रा पर जा रहे थे तो रास्ते में अलन्दी से गुज़रे, जहाॅं रुकमणीबाई भी उन के दर्शन को आई। उन्हों ने उसे पुत्रवती होने का आशीरवाद दिया पर पूरी बात का पता लगने पर कि विðल पंत ने बिना पत्नि को बताये सन्यास ग्रहण कर लिया है, उन्हों ने उसे आदेश दिया कि वह वापस ग्रहस्थ आश्रम में लौट जाये।


फलस्वरूप गुरू की आज्ञा शिरोधार्य कर विðल पंत लौट आये। उन के तीन पुत्र एवं एक बेटी हुये। ज्ञानेष्वर दूसरे पु़त्र थे। उस काल के ब्राह्मणों ने सन्यास से वापस ग्रहस्थ में आने की बात को स्वीकार नहीं किया और विðल पंत एवं परिवार जाति बाहर कर दिये गये। परिवार ने अलन्दी छोड़ दिया और नासिक चले गये। बच्चों का इस कारण यज्ञोपवीत संस्कार भी सम्पन्न नहीं हो सका। वहाॅं पर एक बार शेर के सामने आ जाने से ज्येष्ठ पुत्र निवृतिनाथ परिवार से अलग हो गये और एक गुफा में छुप गये। वहाॅं उस की मुलाकात गहानीनाथ से हुई जिन्हों ने उसे नाथ सम्प्रदाय में शामिल कर लिया। आगे चल कर निवृतिनाथ ने ही ज्ञानेष्वर तथा दूसरे भाई एवं बहन का दीक्षा दी।

इधर विðलपंत नासिक से वापस अलन्दी लौट आये और ब्राह्मणों से परायश्चित का मार्ग पूछा। उन के अनुसार मृत्यु के अतिरिक्त कोई परायश्चित नहीं हो सकता। इस कारण उन्हों ने काशी में जा कर जल समाधी ले ली। कुछ समय पश्चात माता रुकमणी देवी ने भी जल समाधी ग्रहण की। इस के पश्चात बच्चों को बिरादरी में वापस ले लिया गया। (एक वृतान्त के अनुसार चारों बच्चे आरम्भ से ही ज्ञानी थे तथा उन की विलक्षण एवं अलौकिक क्षमता देखते हुये बिरादरी ने तय किया कि उन्हें यज्ञोपवीत इत्यादि की आवश्यकता ही नहीं है)। तीनों भाई और बहन प्रसिद्ध योगी एवं कवि के रूप में ख्याती पाये। निवृतिनाथ ने ज्ञानेश्वर को तथा अन्य भई बहन को भी नाग सम्प्रदाय में दीक्षा थी तथा उन के गुरू बने।


संत ज्ञानेश्वर ने इसी काल में पंद्रह वर्ष की आयु में ज्ञानेश्वरी ग्रन्थ की रचना की। इस में उन्हों ने भगवद गीता पर टीका दी है। वर्ष 1290 की यह कृति मराठी भाषा में प्रथम ग्रन्थ माना जाता है। इस से पूर्व धार्मिक साहित्य संस्कृत में ही लिखा जाता था। यह रचना ओवी छन्द में लिखी गई है जो उस समय के लोक गीत का प्रचलित छन्द था। इस में चौथी लाईन को संक्षिप्त रखा जाता है जबकि पहली और दूसरी या तीसरी लाईन का तुकान्त एक होता है। इस के प्रथम दो छन्द हैं -


ॐ नमो जी आद्या। वेद प्रतिपाद्या।

जय जय स्वश्वेद्या। आत्मरूपा।।

देवा तूंचि गणेषु। सकला धर्मतिप्रकाषु।

म्हणे निवृतिदासु। अवधारिजो जी।।


निवृतिनाथ ने ज्ञानेश्वरी को सामान्य जन के लिये कठिन माना और ज्ञानेश्वर को सरल भाषा में टीका लिखने को कहा। इस का परिणाम अमृतानुभव ग्रन्थ में हुआ। ज्ञानेश्वरी में रूपक तथा उपमायें दूसरे ग्रन्थ से अधिक हैं। उस में सांख्य तथा योग के बारे में जानकारी भी अधिक है। इस के विपरीत अमृतानुभव में मायावाद, शून्यवाद की जानकारी अधिक है परन्तु यह ग्रन्थ सरल भाषा में लिखा गया है जो कि आश्य था। इस में दर्शन की गहराई का पता चलता है। इस में एक से अनेक की भावना का अदभुत वर्णन किया गया है। अमतानुभव का आरम्भ इस प्रकार होता है -


‘‘मैं शंकर तथा पार्वती को नमन करता हूॅं जो इस समस्त ब्रह्मण्ड के रचियता है। वह पूर्ण रूप से एक नहीं हैं औेर वह एक दूसरे से अलग भी नहीं हैं। कह नहीं सकते कि वह क्या हैं। उन का मिलन कितना प्रिय है। पूरा संसार उन के लिये कम है परन्तु वह एक अणु में भी प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं।’’

और फिर?

‘‘दो वाद्य यंत्र, एक स्वर

दो फूल, एक महक

दो दीप, एक प्रकाश

दो होंठ, एक शब्द

दो नयन, एक दृष्टि

वे दो, एक संसार’’

उपरोक्त पुस्तकों के अतिरिक्त संत ज्ञानेश्वर ने कई अभंग की रचना की है जो पण्ढारपुर तथा अन्य तीर्थ स्थानों की यात्रा के दौरान रचित हैं। एक अभंग का अंश देखिये -


ऐसें अवस्थेचे पिसें लाविलेसे कैसें ।

चित्त नेलें आपणियां सारिसेंगे माये ॥

बापरखुमादेविवरें लावियेले पिसें ।

करुनि ठेविले आपणिया ऐसेंगे माये ॥


संत ज्ञानेश्वर ब्रह्म को विचार पु०ज का आश्रय मानते हैं जिस से विचार तथा अभिज्ञान होता है। उन का मत है कि सत् स्वयं सिद्ध है तथा इसे प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है। वह प्रमाण को ही एक मात्र अभिज्ञान का स्रोत मानते थे परन्तु इस की भी सीमायें हैं। प्रमाण को भी अधिक गहण विचार की आवश्यकता होती है। यहाॅं तक कि वह वेद को भी अपने ज्ञान के आधार पर ही सत्य मानने को कहते हैं। इस में वह मीमांसा तथा वेदान्त से भिन्न हैं जो वेद में पूर्ण विश्वास रखते हैं।


नैतिकता के सम्बन्ध में उन के विचार भगवद गीता के तेरहवें अध्याय को प्रतिबिम्बित करते हैं। श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, प्राणीमात्र के प्रति अहिंसा, क्षमाभाव, सरलता, शुद्ध अन्तःकरण, आसक्तिरहित व्यवहार, वह नैतिक गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में पाये जाना चाहिये। इस के साथ ही गुरू तथा ईश्वर के प्रति श्रद्धा होना आवश्यक है। वह सभी मनुष्यों को समान मानते थे। संत जन सभी चेतन तथा अचेतन वस्तुओं को अपने सरीखा ही मानते हैं।


श्रीमद भवगद् गीता के सोलहवें अध्याय के अनुरूप उन का निर्देश है कि

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शानितरपैशुनम्।

दया भूतेश्वलोलूप्तत्वं मार्दवं ह्नाचापलम्।।

तेजः क्षमा धृति शौचमद्रोहो नातिमानिता।

भवन्ति संपंदं देवीमकत्रभिजातस्य भारत।। 16। 2,3।।


इसी में उन के विचारों का निचोड़ शामिल है।


उन के नाम से बहुत से अलौकिक चमत्कार प्रसिद्ध हैं जैसे कि एक भैंस द्वारा वेदाच्चार जो उन का मत दिखाता है कि सभी मनुष्य तथा जीव बराबर हैं तथा कोई भी भेदभाव सृष्टि के नियमों के विरुद्ध हैं। इसी प्रकार एक योगी का घमण्ड ततोड़ने की बात है। वह योगी बाघ की सवारी करता था। जब वह मिलने आया तो संत ज्ञानेष्वर अपने भाई बहन के साथ एक दीवार पर बैठ गये। उन की आज्ञा पा कर वह दीवार ही चलने लग गई।


जब वह इक्कीस वर्श के थे तो उन्हों ने महसूस किया कि उन्हों ने अपने जीवन का लक्ष्य पूर्ण कर लिया है। उन्हों ने गुरू निवृतिनाथ तथा अन्य वरिष्ठ जन की सहमति से सजीवन समाधी ग्रहण कर ली।


उन की अल्पायु के जो महान विचार हैं, वे आज भी मनुष्य के जीवन में श्रद्धाजनित है।


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