top of page

यात्रा विवरण

  • kewal sethi
  • Apr 24
  • 2 min read

यात्रा विवरण


एक गाना है -

ज़िंदगी ख्वाब है

ख्वाब में भला झूट क्या

और भला सच है क्या

सब सच है।


आज मैं एक ख्वाब की बात बता रहा हूॅं जो बिल्कुल सौ प्रतिशत सच है।

ख्वाब में मैं अपने बेटे को और उस के बच्चों को एक यात्रा के बारे में बता रहा था। काफी रांमांचक आवाज़ में।

जब नींद खुली तो मुझे मालूम पड़ा कि जो मैं ख्वाब में कह रहा था वह तो सत्य एवं पूर्ण सत्य था। इस लिये इसे लिखना आवश्यक है।

बात 1976 की है। उस समय मैं उप सचिव युवक कल्याण था शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय में।

युवा कल्याण का एक कार्यक्रम है ‘‘नेहरू युवा केन्द्र’’। यह 1972 में आरम्भ हुआ था और अभी यह विष्व में सब से बड़ा युवा संगठन है जिस के करीब 85 लाख सदस्य हैं।

पर 1976 में यह शैशव काल में था। न इस का कोई संगठन था न नियम। सब तदर्थ रूप से चल रहा था। उस समय तक 80 ज़िलों में इस की स्थापना हो चुकी थी। मेरे द्वारा इस के नियम बनाये गयें। क्या कार्यकम किये जाना है, यह तय किया गया। और फिर मासिक प्रतिवेदन देने की बात की। इसी के साथ कुछ युवा केन्द्रों का निरीक्षण भी किया गया।

इन में एक केन्द्र था पिथौड़ागढ़ में। आजकल उत्तराखण्ड में है, तब उत्तर प्रदेश में था। काठगोदाम तक रेल यात्रा और उस के पष्चात बस से अल्मोरा जहॉं नेहरू युवा केन्द्र अधिकारी मुझे मिल जायें गे और पिथौड़ागढ़ ले जाये गे।

गाठगोदाम पहुंचा तो विचार आया कि नैनीताल नहीं देखा है, वह भी देख लें। समय था। बस पकड़ी और नैनीताल पहुंच गये। नैनीताल देखा और फिर अल्मोड़ा के लिये बस पकड़ी। यह विवरण उस यात्रा का है।

उस ज़माने में पहाड़ी सड़क थी। संकरी इतनी कि दो कारें एक साथ नहीं रह सकती। बीच बीच में कहीं कहीं पहाड़ काट कर इतनी जगह बनाई गई कि बस एक दूसरे को पास कर सके। और बस भी उसी सड़क के लायक। सात एक फुट चौड़ी हो गी। (सड़क आठ साढ़े आठ फुट की हो गी)। सीट भी उसी परिमाण के हिसाब से पर हुआ यह कि सीट मिली ही नहीं, बस के अंतिम सिरे पर खड़े हो कर जाना पड़ा। और बस भी पता नहीं किस काल की थी। बिल्कुल खटारा। अगली बस का इंतज़ार नहीं कर सकता था क्योंकि अल्मोड़ा समय से पहुॅंचना था। हिचकोले खाते हुये चले। एक तरफ पहाड़, दूसरी तरफ खड - कहीं बीस फुट तो कही 300 फुट। डर तो लगा पर डर कर भी क्या हो सकता था। ऊपर की सांस ऊपर, नीचे की नीचे। भुगतते रहे। एकाध बार सामने से बस आती दिखी या उस का हार्न सुनाई दिया तो कहीं एक तरफ हो कर बस रुक गई। जब दूसरी बस पास कर गई तो फिर चले।

लिखने में वह बात तो नहीं आ पाई जो बोलने में आती है पर विवरण यही है। अल्मोड़ा में तो नेहरू युवा केन्द्र अधिकारी मिल गया। उन्हों ने कहीं से जीप का इंतज़ाम किया था। पिथौडा़गढ़ पहुंचे। निरीक्षण किया। लौटते में लोहाघाट से हो कर आये जहॉं तक जीप छोड़ गई। बाकी रास्ता तो बस तथा रेल से तय कर दिल्ली लौट आये।

 
 
 

Recent Posts

See All
किस्सा एक वारदात का - 3

किस्सा एक वारदात का 3। और यह मामला। हुआ यह कि एक थे डा. वाडिया। अच्छे सुलझे हुए शल्य चिकित्सक थे। करीब 3 साल पहले जिले में आए थे। लंदन से एफ आर सी एस थे। हाथ अच्छा था। ऑपरेशन शायद ही कोई नाकामयाब

 
 
 
किस्सा एक वारदात का - 2

किस्सा एक वारदात का 2। इस स्टेज पर यह बताना आवश्यक है कि यह सब क्या है और क्यों है। इस के बिना पाठक को कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा हो गा। पात्रों का परिचय दिये बिना कहानी शुरू करना नई परिपाटी है और हम ने

 
 
 
the hidden life of trees

a very interesting book came up – the hidden life of trees, author peter wholleben, publishers penguin. it is about european forests of north and central europe. the species mentinoned are oak, pine,

 
 
 

Comments


bottom of page