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चंगेज़ खान - 6

  • kewal sethi
  • Apr 4
  • 8 min read

चंगेज़ खान - 6


चनगीज़ खान ने सीधे ख्वारिज़्म पर हमला नहीं किया। उस ने एक दल को तो ख्वारिज़्म सीमा पर हमला करने के लिये चुना और स्वयं दूसरे दुगर्म रास्ते को चुना। इस क्षेत्र में एक मरुस्थल पड़ता था जिसे रक्त मरुस्थल कहा जाता था। यह इतना दुर्गम था कि सौदागरों के काफिले इस से बच कर निकलते थे भले ही इस के लिये उन्हें सैंकड़ों किलोमीटर अधिक चलना पड़ता था। खानाबदोषों की मदद से चनगीज़ खान के सैनिक इस रास्ते चले। जैसे कि अन्यत्र बताया गया है, वह अपने जानवर यानि कि अपना खाना साथ ले कर चलते थे। कई महीनों का सफर तय कर वह ख्वारिज़्म राज्य के पश्चिमी भाग में प्रवेश किये जहां आमु नदी के एक सहायक नदी के किनारे बड़ा नगर बुखारा था। मरुस्थल पार करने के बाद यहॉं उन्हें कुछ गॉंव मिले जिन से उन्हों ने जानवरों के लिये चारा एवं स्वयं के लिये खाना प्राप्त किया। छोटी छोटी टुकड़ियों में बट कर उन्हों ने गॉंवों में आतंक मचा दिया।

गॉंवों के लोग इस आतंक से बचने के लिये शहर बुखारा की ओर भागे। परन्तु बुखारा के लोग यह नहीं समझ पाये कि यह बड़ा हमला है। वह इन्हें छोटे छोटे समूहों का ही हमला मानते रहे। यहॉं यह बताना उचित हो गा कि ख्वारिज़्म के शासक तुर्क थे जब कि वहां की जनता स्थानीय कबीलों ताजिक इत्यादि के थे। लेकिन जैसे जैसे यह हमले बुखारा के पास आते गये, दहशत बढ़ती गई। इन लोगों के कारण शहर में अफरातफरी बढ़ गई। जिन गाँवों ने मातहती कबूल कर ली उन के साथ नर्मी का व्यवहार किया गया। जिन्हों ने नही की उन के साथ सख्ती का व्यवहार किया गया।

बुखारा में तुर्क् सैना अभी भी समझ रही थी कि मंगोल मुख्य सेना आई नहीं है। वह आये गे तो क्या यह सोच को लगभग 500 सैनिकों को छोड़ कर वह अपनी राजधानी की ओर चल दिये। मंगोल सैना इस के लिये तैयार थी और उन को उन्हों ने आराम से समाप्त कर दिया। जो सैनिक नगर में बचे थे उन्हों ने नगर के किले में पनाह ली जहां वह संरक्षित महसूस कर रहे थे। बाकी नागरिकों ने नगर के द्वार खोल दिये।

आम तौर पर चनगीज़ खान किसी नगर में स्वयं प्रवेश नहीं करता था, वह अपने सरदारों के ही भेजता था। बुखारा एक अपवाद था। नगर के केन्द्र में पहूंच कर उस ने पहला काम नगरवासियों को चारा लने के लिये कहा। नगर में वह वहां की मस्जिद में प्रवेश् किया तथा नगरवासियों को सम्बोधित किया कि उन पर सुलतान इत्यादि ने जो जुल्म किया, उसी कारण उसे उन्हे दण्ड देने के लिये भेजा गया है। उस ने सभी अमीर आदमियों के साथ अपने सैनिक लगा दिये ताकि वह अपनी छिपाई गई दौलत का बता सकें।

किलाबन्द सैनिक आश्वस्त थे कि वह सुरक्षित हैं। पहले भी कई कबीले आये थे पर किला भेद नहीं पाये थे। पर मंगोल सैनिकों के साथ यंत्री भी थे जिन्हों ने उपलब्ध सामग्री से ही शिला प्रक्षेपक बना लिये। इस से न केवल वह पत्थर फैंक सकते थे बल्कि जलते हुये तरल पदार्थ जो आस पास आग लगा सकते थे, भी फैंक सकते थे। दूसरी ओर मज़दूरों को लगा कर सुरंगें बनाने का काम भी शुरू किया गया। कैदियों को धकेल कर खाई को पाटने का कार्य भी किया गया। इन में कई उन के रिश्तेदार थे जो किले में बन्द थे। चनगीज़ खान के लिये युद्ध कोई खेल नहीं था जिस में हार जीत होती है। उस का ध्येय केवल जीत था चाहे उस में कितने भी लोगों की जान जाये। उस का पैगाम सीधा था - जो मातहती कबूल करते हैं, उन का स्वागत है। जो मुकाबला करना चाहते हैं, वे, उन को बीवी बच्चे समेत सभी को समाप्त किया किया जाये गा। मंगोल सैना का कार्य सीधा था - पहले सभी सैनिकों को मारा जाये गा। दूसरे सभी व्यावसायिक लोगों को अलग किया जाये गा। इन में डाक्टर, लिपिक, मुंशी, अध्यापक, इमाम, व्यापारी, इत्यादि शामिल थे। बढ़ई, मोची, कागज़ बनाने वाल नाई, गायक, संगीतज्ञ शामिल थे। शेष को अगले शहर पर आक्रमण के लिये ढाल के रूप में रखा जाता था। विषेष रूप से स्मृद्ध तथा रसूख़ वालों को समाप्त करना ध्येय था ताकि फिर से विद्रोह करने के लिये कोई न बचे। उन का विश्वास था कि आम आदमी को इन को बचाने में कोई रुचि नहीं थी। वे उन से उतने ही त्रस्त थे।

बुखारा पर विजय केवल वहीं तक सीमित नहीं रही बल्कि समरकन्द ने भी हथियार डाल दिये। सुलतान वहां से भाग लिया। सुलतान, जैसा कि पूर्व में कहा गया है, स्थानीय नहीं था और बगदाद के खलीफा के साथ भी उस के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। कलाफा ने चनगीज़ खान की मदद के लिये कुछ ईसाई जो उसे ने क्रूसेड में बन्दी बना लिये थे, चनगीज़ खान को भेजे। चनगीज़ खान को उन का कोई प्रयोजन नहीं था, उस ने उन्हें आज़ाद कर दिया और वह युरोप लौट गये। सुलतान की अपनी मॉं से भी नहीं बनती थी जो अपनी मर्जी़ की मालिक थी। वास्तव में उस का भाई था जिस ने सौदागरों के काफिले को लूट कर चनगीज़ खान को चुनौती दी थी। सुलतान की मॉं को बन्दी बना कर मंगोलिया भेजा गा जहां वह दस वर्ष तक नौकरानी के रूप में कार्य करती रही। उस के साथ आम औरत जैसा ही बर्ताव किया गया। उस के परिवार के सभी लोागें को मार दिया गया। सुलतान भाग निकला किन्तु चनगीज़ खान ने उस का पीछा किया तथा अन्ततः वह मारा गाय। चनगीज़ खान की सैना अफगानिस्तान तक बढ़ती गई। मंगोल सैना का दूसरा भाग कैस्पियन सागर तक पहुॅंच गया और पूरे राज्य पर अधिकार कर लिया। वर्ष 1220 से ले कर सात सौ साल तक चनगीज़ खान के वंषज बुखारा तथा आसपास के इलाकों पर काबिज़ रहे।

अफगानिस्तान पर अधिकार करने के बाद उस की सेना सिंध नदी तक आई तथा दखिण में मुलतान नगर तक पहुॅंच गईं। मगर यहॉं पर उसे एक दूसरे प्रकार के शत्रू का सामना करना पड़ा। यहॉं की गर्मी न सेना को पसंद आई न उन के घोड़ों को। इस कारण चनगीज़ खान अफगानिस्तान लौट गया। यहां वह छह माह तक रुका रहा और सैना के लिये बहुत शिकार का आोयोजन किया। इस का एक प्रयोजन अपने बेटों में सुलह कराने का भी था पर जोची ने इस आखेट में भाग नहीं लिया और अपना अलग प्रबंध किया।

इस अभियान में चनगीज़ खान ने अनेक नगरों का अधिकार किया। चार साल के इस अभियान में बुखारा तथा समरकन्द के अतिरिक्त ओतरार, उरगैंच, बल्ख, बनाखत, खोजेन्ड, मर्व, निसा, निषापुर, तरमे, हेरात, बामियान, गज़नी, पेषावर, कासविन, हमादान, अरदालिब, मारागेह, जबरीज़, तबिल्सी, थलिसि, दरबैंअ, अस्त्राखान नगर भी उस का शिकार बने। इन में हर एक की अपनी कहानी थी किन्तु एक बात समान थी। कोई नगर मंगोल सैना के समक्ष टिक नहीं पाया। न प्रार्थना का असर हुआ न रिशवत का। तबाही ही समान थी। किन्हीं में समय लगा तो कुछ दिनों में ही जीत लिये गये। उरगैंच को जीतने में छह माह का समय लग गया। उरगैंच में रक्षक सैनाओं ने डट कर मुकाबला किया। पूरे नगर को जला दिया गया किन्तु जले हुये मकानों से भी वह लड़ते रहे। आखिर में एक नदी पर बांध बना कर उस का रुख नगर की ओर किया गया जिस में पूरा नगर बह गया।

निशापुर को जीतते समय समय नहीं लगा किन्तु जब मंगोल सैना आगे चली गई तो उन्हों ने विद्रोह कर दिया। मंगोल सैना लौटी और उस पर दौबारा कब्ज़ा किया परन्तु इस में चनगीज़ खान का दामाद ताकुचर मारा गया। चनगीज़ खान ने अपनी बेटी को बदला लने का पूरा अधिकार दे दिया। परिणामस्वरूप निशापुर का न केवल हर व्यक्ति मारा गया वरन् वहां के जानवर, कुत्ते, बिल्लियों तक को नहीं छोड़ा गया।

इसी प्रकार बामियान पर हमले के समय चनगीज़ खान को पौता मतुजेन मारा गया। इस का परिणाम भी बामियान में अनकही जु़ल्म की कहानी रही।

कितने लोग इस अभियान में मारे गये कहना कठिन है। कुछ मुस्लिम इतिहास कारों ने तो संख्या को काफी बढ़ा चढ़ा कर बताया है। उन के अनुसार केवल निशापुर में मरने वालों की संख्या 17,47,000 थी। हेरात में मरने वालों की संख्या 16 लाख बताई गई। पर इस सब को छोड़ दिया जाये तो भी पूरे अभियान में संख्या 150 लाख मानी जाती है। इस का अर्थ यह भी हुआ कि प्रत्येक मंगोल सैनिक ने सौ से अधिक लोगों को मारा। यह उल्लेखनीय है कि इस अभियान में मंगोल सैेनिको की संख्या एक लाख से सवा लाख के भीतर थी।

यहॉं यह बताना उचित हो गा कि सैना को हराने से अधिक ज़ोर नगरों को तबाह करने पर था। बदले की भावना से अथवा डर पैदा करने के लिये नगरों में विनाश लीला का आयोजन किया गया। इस के अतिरिक्त इन नगरों को व्यापार रास्ते के लिये खतरा मान कर भी नष्ट किया गया। जो नगर व्यापार के रास्ते में थे तथा जिन की रक्षा की जा सकती थी, वह वैसे ही रहे। नगरों के विध्वंस के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों को भी खाली करने का कार्य किया गया। सिंचाई के लिये बनाये गये बांध नष्ट किये गये जिस से खेती बन्द हो गई तथा वे स्थान चरागाह में बदल गये। यही बात उस ने चीन में की थी तथा वही बात मध्य एशिया में भी की गई। ध्येय केवल यह था कि मंगोल सैना का रास्ता नहीं रुकना चाहिये।

एक बात और। चनगीज़ खान ने बहुत लोागों को मारा लेकिन उस ने कभी बाकी जनता को डराने के लिये सैनिकों को अथवा अन्य को यंत्रणा देेने का अथवा अंग भंग करने का अनैनिक कार्य नहीं किया जो उस ज़माने का चलन था। अगस्त 1228 में 400 मंगोल सैनिक ख्वारिज़्म सुलतान के बेटे के काबू में आ गये। उन्हें घोडों के पीछे बांध कर नगर में घुमाया गया। फिर उन्हें मारा गया तथा शवों को कुत्तों को खिलाया गया। स्पष्टतः ही इस का बदला नगरवासियों से लिया गया। इसी प्रकार पकड़े गये मंगोल सैनिकों को सिर में कीलें ठोक कर मारा गया। इसी प्रकार भारत में एक राजा द्वारा मंगोल सैनिकों को हाथियों द्वारा कुचलवाया गया।

इस प्रकार की यन्त्रणा केवल इसी काल की घटना नहीं है वरन् यह उस ज़माने का सामान्य चलन था। वर्ष 1014 में जब बाईजैंटीन के सम्राट बासिल ने बलगेरिया को हराया तो उन के 15,000 सैनिक बन्दी बनाये गये। उस में प्रत्येक सौ कैदियों में से 99 की आंखें निकाल दी गईं और एक व्यक्ति को छोड़ा गया ताकि वह उन्हेें उन के घरों तक ले जा सके। वर्ष 1160 में सम्राट बारबरोसा ने इटली के लोमबार्ड नगर पर आक्रमण किया। इस में विशेषता यह थी कि दोनों ओर से बर्बरता की प्रदर्शन किया गया। सम्राट के लोगों ने अपने बन्दी बनाये गये लोगों का सिर काटा और फिर किले के नीचे के मैदान में उन से फुटबाल खेला। किले में के लोगों ने बन्दी बनाये गये लोगों को किले की दीवार पर ला कर उन के बाज़ू तथा लातें खैंच कर उन के साथियों को दिखाये। बदले में नीचे के लोगों ने कुछ बन्दियों को ला कर उन को उन के साथियों के सामने फॉंसी दी। बदले में किले के लोगों ने किले की दीवार पर बन्दियों को फॉंसी दी। नीचे के लोगों ने तब बच्चों का पकड़ा तथा उन्हें शिलाप्रक्षेपक से किले की दीवारों पर फैंका। आम तौर पर यह शिलाप्रक्षेपक पत्थरों से दरवाज़े तोड़ने के काम आते हैं।

मंगोल सैना ने ऐसा कुछ नहीं किया पर अपनी गति से तथा दक्षता से अपनी जीत दर्ज की। उन्हों ने अमीर तथा महत्वपूर्ण लोगों को जमकर अपना विशेष निशाना बनाया।

ख्वाथज़्म राज्य को नष्ट करने के बाद चनगीज़ खान वापस अवर्गा लौट गया। पर अभी उसे एक युद्ध और लड़ना था। जब उस ने ख्वारिज़्म राज्य पर हमला करने का कार्यक्रम बनाया तो तानगुट के शासक को भी अपनी सेना भेजने के लिये कहा। वहॉं के शासक ने यह कह कर मना कर दिया कि यदि चनगीज़ खान के पास इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अकेले इस अभियान पर निकले तो उसे निकलना ही नहीं चाहिये। उस समय चनगीज़ खान का पूरा ध्यान अभियान पर था इस कारण तांगुट के खिलाफ कुछ नहीं किया परन्तु अब उस का समय आ गया था। उस ने तांगुट पर आक्रमण किया। संयोगवश शासक का नाम बुरखान था जो कि चनगीज़ खान के पावन पर्वत का नाम था। इस कारण चनगीज़ खान ने मृत्यु दण्ड देने से पूर्व शासक का नाम बदलने पर ज़ोर दिया।

इस अभियान के दौरान एक बार चनगीज़ खान घोड़े से गिरा पर उस से उस के अभियान में रूकावट नहीं आई। तरंगुट पर विजय के अंतिम क्षणों में चनगीज़ खान को अंतिम बुलावा आ गया। उस के शव को अवर्गा लाया गया जहॉं उसे उस के प्रिय स्थान की ओर ले जाया गया जहां उसे अज्ञात स्थान पर दफनाया गया।

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