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चंगेज़ खान - 5

kewal sethi
Mar 12
4 min read

चंगेज़ खान - 5


चिनगीज़ खान जब अवर्गा लौटा तो उसके बाद इतनी लूट की सामग्री थी कि उसे संभालना मुश्किल था। उस के लिपिक दिन रात एक कर के सूचिया बऩा रहे थे पर उस में भी समय लग रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि इन को रखें कहां। इस कारण उस कई नये भवन बनवाए, जिनमें यह माल रखा गया। अब अवर्गा एक अलग थलग स्थान न हो कर व्यस्त होम स्टेशन बन गया।

दूसरी ओर जैसे जैसे लूट का माल बढ़ा, वैसे वैसे ही लोगों का लालच भी बढ़ता गया। अब जीवन के लिये ज़रूरी सामान के साथ विलसिता का सामान भी चाहिये था। इस के बारे में इंतजाम करना, काफी बड़ी चुनौती थी। इस लालच के कारण फिर नया इलाका जीतना लगभग अनिवार्य हो गया था।

परन्तु पहले पूर्व में किये गये अभियान के बारे में विचार करना था। लम्बी अनुपस्थिति के दौरान पूर्व के विजित क्षेत्रों ने खिराज देना बन्द कर दिया था।

टुण्डरा क्षेत्र से जैसे प्रति वर्ष कीमती फर तथा दूसरी सामग्री एवं युवतियां आती थी, वो बंद हो गई। वहाँ की रानी बोतो हुईतारहुन ने इसे बंद कर दिया। चिनगीज़ खान ने सन्देश दे कर अपना दूत भेजा परन्तु रानी ने उसे बन्दी बना लिया। इस कें बाद दूसरे दूत के साथ भी वैसा ही हुआ। चिनगीज़ खान ने तब अपने कमाण्डर को सेना के साथ भेजा। मगाल सैना मैदान में लड़ने की तरकीब जानती थी, परन्तु जंगल में लड़ना उस के लिए मुश्किल था। वहाँ वो एक एक दो दो कर के आदमी आगे बढ़ सकते थे। रानी ने उन्हें अन्दर आने दिया और फिर पीछे से घात लगा कर हमला किया। इसमें मंगोल कमाण्डर सहित काफी लोग मारे गए। इस पर से रणनीति बदली गई। बहुत से सैनिक हमला करने के लिए भेजे गए परन्तु वह जंगल के अन्दर नहीं गये। रानी को उन पर निगाह रखने के लिये अपने आदमी लगाने पड़े। उधर दूसरी ओर से मंगोल सैना ने चुपचाप वृक्ष काट कर एक वैकल्पिक रास्ता बना लिया जो दूसरे स्थान से काफी दूर था। जब रास्ता तैयार हो गया तो मंगोल सेना ने तेज़ी से बढ़ते हुये रानी के मुख्यालय पर हमला किया। रानी को बंदी बना लिया और उसे दूसरे दूत के हवाले कर दिया। दूतों को छुड़ा लिया गया और वहॉं के निवासियों को बन्दी बना लिया गया।

दक्षिण में स्थिति अधिक गम्भीर थी। वहॉं खितान जाति का वर्चस्व था। उन में से तियन शान पर्वत के पूर्व में लोगों ने चिनगीज़ खान की अधीनता स्वीकार कर ली थी तथा उन से सम्बन्ध अच्छे थे। तियन शान के पश्चिम में उन्हीं के भाई बन्धु रहते थे जिन्हें कारा खिातान कहा जाता था (कारा का अर्थ दूरी भी लगाया जाता है तथा अष्वेत भी)। उस समय वहॉं पर गुचलक की हकूमत थी। नाईमन पर आक्रमण के समय उस का एक बेटा गुचलक दक्षिण की ओर भागा। उस ने वहॉं पर षरण ली और वहॉं की राजकुमारी से उस का विवाह भी हो गयां। बाद में उस ने मौका पाकर उसे अपने ससुर की हत्या कर दी और राज्य को हड़प लिया। कारा खितान बौ़द्ध थे किन्तु वहीं मुस्लिम भी रहते थे जो गुचलक एवं बौद्ध शासकों से परेषान थे। थे। उन्हों ने अपने दूत भेजे और चिनगीज़ खान की ताबेदारी मंज़ूर की और मदद की गुहार की। चिनगीज़ खान ने अपने जनरल तेब को बीस हज़ार सैनिकों के साथ भेजा। यह क्षेत्र अवर्गा से लगभग 4000 किलोमीटर दूर था।

चूॅंकि यह अभियान अनुरोध पर हुआ था अतः लूट की इजाज़त नहीं थी। पर इस से पुराने दुश्मन गुचलक से हिसाब करना आसान हुआ। गुचलक खान को घेर लिया गया तथा उस का सिर कलम कर दिया गया। इस से यह भी लाभ हुआ कि चिनगीज़ खान को उत्पीड़ित व्यक्तियों का मुक्तिदाता मान लिया गया।

इस विजय के साथ लगभग पूरा सिल्क मार्ग चिनगीज़ खान के नियन्त्रण में आ गया। उत्पादन करने वाले क्षेत्र तथा उपयोग करने वाल्रे क्षेत्र उस के आधीन नहीं थे पर व्यापार मार्ग पर उस का नियन्त्रण था।

उस समय अफगानिरस्तान से ने कर कैस्पियन सागर तक का क्षेत्र ख्वारिऩ्म के तुर्की सुलतान के आधीन था। चिनगीज़ खान ने व्यापार को बढ़ाने की दुष्टि से सुलतान के पास अपने दूत भेजे कि वह व्यापारियों को सुाक्षा प्रदान करें ताकि व्यापार में वृद्धि हो। कुछ हिचकचाहट के साथ सुलतान ने यह अनुरोध स्वीकार कर लिया।

मंगोल लोग सौदागर नहीं थे। जो काफिला भेजा गया उस में लगभग पॉंच सौ लोग थे जो बौद्ध तथा हिन्दु थे। जब वह ख्वरिज़्म के क्षेत्र औटर में प्रवेश किये तो वहॉं के सूबेदार ने उस काफिले को लूट लिया तथा सौदागरों की हत्या कर दी। उसे नहीं पता था कि वह कितनी बड़ी हिमाकत कर रहा है। जब यह समाचार चिनगीज़ खान तक पहुॅंचा तो उस ने सुलतान को सूबेदार को दण्ड देने की मॉंग की। सुलतान ने न केवल इसे अनुदेखा किया बल्कि दूत की हत्या कर दी और उस के साथियों को अंग भग कर दिया।

अब चिनगीज़ के समक्ष बदला लेने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं ािा। एक बार फिर उस ने बरखान खलदून से आज्ञा मॉगी कि उस ने यह आरम्भ नहीं किया पर इस अब आग बढ़ाना है। आज्ञा मिलने पर अभियान की तैयारी की गई।

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