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बाक्साईट गाथा

kewal sethi
Feb 18
1 min read

बाक्साईट गाथा


एल्यूमीनियम का उद्योग में योगदान के बारे में कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है। विदित है कि बाक्साईट एल्यूमीनियम बनाने के लिये कच्चा माल है।

पर वास्तव में यह कहानी बाक्साईट की नहीं है। यह कहानी है कोटा, लाईसैन्स, परमिट राज की जो स्वतन्त्रता के बाद दो दशक तक भारत का प्रमुख उद्योग रहा। इस का लाभ कई राजनेताओं को तथा वरिष्ठ अधिकारियों को हुआ। रातों रात क्या, दिन में ही लक्ष्मी जी की उन पर कृपा हो गई।

तो बाक्साईट की बात पर आये। बाक्साईट से अलूमीनियम एक्सट्रैक्ट करने के लिये जरूरत पड़ती है कास्टिक सोडा की। कोरबा के सरकारी कारखाने में बाक्साईट बनता है। उस के प्रबंधकों ने सोचा कि यदि कास्टिक सोड़ बाज़ार से खरीदने की बजाये खुद बनाया जाये तो लाभांश बढ़ सकता है। प्रस्ताव बना और सरकार को भेजा गया।

और वह अस्वीेकार हो गया।

कारण?

सरकारी रिर्काड के अनुसार कास्टिक सोड़ा भारत में जितना चाहियेश, उतना बन रहा है बल्कि आवश्यकता ये अधिक बन रहा है। कोरबा में बनाना आर्थिक दृष्टि से अस्वीकार्य है।

कोरबा के अधिकारी हैरान। आश्यकता से अधिक बन रहा है तो बाज़ार में उपलब्ध क्यों नहीं है।

जांच की गई तो पता लगा कुछ साल पहले बिरला ने कास्टिक सोड़ा बनाने का कारखाना डालने के लिये लाईसैन्स ले लिया था। कारखाना तो लगा नहीं पर सरकारी रिकार्ड में उत्पादन दर्ज हो्र गया।

हो गया तो हो गया और अब और की ज़रूरत नहीं।

अधिकारी बाज़ार थोड़ा ही जाते हैं, न ही उन को इस के लिये वेतन मिलता है। वे तो फाईलों में रहते हैं। उन में जो उपलब्ध है, वह उपलब्ध है।

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