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प्रेमपत्र

  • kewal sethi
  • Feb 20
  • 3 min read

प्रेमपत्र

 

जीवन में कुछ अपरिचित लोग अचानक मिल जाते हैं और फिर अलग नहीं हो पाते। कुछ ऐसी ही कहानी मेरी और निशा की है।

हम मिले थे अचानक रोजगार कार्यालय में। नौकरी की तलाश में वहॉं नाम दर्ज कराया था मैं ने और उस ने भी। संयोग से एक बार दोनों एक ही समय लाईन में लगे थे या यूॅं कहें कि मैं लाईन में लगा था क्योंकि लड़कियों को लाईन नहीं लगाना पड़ती थी। ज़माना अभी बराबरी का नहीं था। खैर, तो वहॉं मुलाकात हो गई और चूॅंकि एक ही मौहल्ले में रहते थे पास पास के ब्लाक में। कार्ड रिन्यु करने के लिये हर दो महीने में जाना पड़ता था। इस कारण एक ही दिन जाना होता था। नौकरी तो मिलती नहीं थी पर कोशिश तो करते ही रहना था, इस लिये यह सिलसिला कई महीनों तक चला।

एक दिन पकड़े गया। हुआ यह कि जब वह अपनी गली में मुड़ने लगी और मैं अपने घर की ओर चला तो एक व्यक्ति ने मुझे रोक लिया।

- क्या नाम है तुम्हारा

अब नाम छुपाने की चीज़ तो है नहीं। बता दिया।

- तुम निशा को कैसे जानते हो।

- वह रोजगार कार्यालय में मिली थी।

- कब

- काफी महीने हो गये।

- और आज देखा तुम साथ साथ आ रहे थे।

- वह ऐसा है कि हर दो महीने में कार्ड रिन्यू करने जाना पड़ा है और वह एक ही दिन मेरा और निशा का हैं

- तो हर दो महीने में मिलते हो।

- जी

- और साथ साथ ही आते हो।

- जी, वह मैं भी इसी मौहल्ले में अगले ब्लाक में रहता हूॅ। इस लिये साथ रहता ही है।

- तुम्हारे पिता का क्या नाम है।

- महेन्द्र कुकरेजा

- कहॉं काम करते हैं

- ए जी आफिस में

- कौन से सैक्षन में

- वह तो नहीं पता

- और आज कौन सा कागज़ दे रहे थे निषा को

- जी, वह एल डी सी की परीक्षा का फार्म था।

- बस वही कि कोई प्रेमपत्र था।

- जी नहीं, उस का तो कभी सोचा ही नहीं।

- मैं निशा का बाप हूॅं। बहुत दिन से उस की मॉं बता रही थी कि किसी लड़के के साथ निशा आती जाती है। इस लिय मैं ने सोचा कि आज जान लूॅं हो कौन और क्या चाहते हो। तुम्हारा पक्का विचार है कि वह फार्म ही था, और कुछ नहीं।

तो यह बात थी। अजीब बात है कि लड़कियों के बारे में लोग इतनी शंका में क्यों रहते हैं। मैं ने कभी प्रेमपत्र के बारे मे ंसाचा भी नहीं था। जब हम एक दूसरे से रास्ते मे बस में बातचीत कर सकते थे तो पत्र की क्या आवश्यकता थी। बस स्टाप से घर आते बात कर सकते थे, क्या उतना काफी नहीं था। पर अब जब उस के पिता ने ऐसा कहा तो मेरे मन में भी विचार आया कि क्या वास्तव में यह प्रेम ही है जो मुझे दो महीने की इंतज़ार कराता है कि कब रिन्यू करने का दिन आये। और क्या निषा भी यह इंतज़ार करती है।

तो संक्षेप में किस्सा यह कि उस के पिता ने मेरे पिता का पता भी ले लिया। सैक्षन का पता नहीं था, वह उन्हों ने इतवार को पता कर बताने को कहा। यह भी बताया कि वह इंकम टैक्स दफतर में हैं और वाई शेप बिल्डिंग में हैं और किसी दिन मेरे पिता से मिलें गे। मुझे लगा कि वह जाूससी करें गे कि मैं सच में हूॅं क्या। उस से मुझेे कोई तकलीफ नहीं थी। पर एक नया विचार मन में आ गया निशा के बारे में।

प्रश्न यह था कि फार्म दे तो दिया पर अब वह भर कर दे गी कैसे ताकि मैं उस का और अपना फार्म दफ़तर में जमा करा सकूॅं। इस का सोचा नहीं था पर अब यह ख्याल आया। अभी तीन हफते हैं, कोई सूरत निकल आये गी नहीं तो डाक से तो भिजवा ही सकते हैं।

लेकिन सूरत निकल आई। उन्हों ने कहा कि इतवार को घर पर आ कर बता दें कि पिता का सैक्षन कौन सा है। उन के घर गया जिस का मकसद वास्तव में उस की मॉं को मुझे दिखाना था। उस की मॉं बहुत ममतामयी थी। चाय बिस्कुट भी मिल गये। फार्म आ कर ले जाना, यह भी कह दिया। उस के घर जाने का रास्ता साफ हो गया।

कहानी को छोटा करूॅं। वह गणित में कमज़ोर थी और और उस की तैयारी कराना मेरे ज़िम्मे कर दिया गया।

हम दोनो उस परीक्षा में पास हो गये और सरकारी मुलाज़िम भी बन गये।

और आप समझ ही गये कि अब हम जीवन साथी हैं बिना किसी प्रेमपत्र के।

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