वेश्यावृत्ति का अर्थशास्त्र
वेश्यावृत्ति का अर्थशास्त्र
(यह स्टीवन डी. लेविट और स्टीफन जे. डबनर की किताब "सुपर फ्रीकोनॉमिक्स" में दिये गये विवरण पर आधारित है।)
इसकी शुरुआत शिकागो में वेश्यावृत्ति पर चर्चा से होती है। सुधीर वेंकटेश नाम के एक भारतीय ने शिकागो के तीन इलाकों में वेश्यावृत्ति पर तीन साल से ज़्यादा समय तक रिसर्च की।
इसमें हर जगह अर्थशास्त्र ही दिखता है। कुछ वेश्याएं दलालों (pimps) के ज़रिए काम करती हैं, जबकि कुछ खुद अपना काम करती हैं। रिसर्च में पाया गया कि भले ही दलाल कमाई का बड़ा हिस्सा ले जाते हैं, फिर भी ऐसी वेश्याएं ज़्यादा कमाती हैं। इसके अलावा, दलालों की वजह से वे पुलिस से सुरक्षित रहती हैं, क्योंकि दलालों का पुलिस के साथ लंबे समय का समझौता होता है।एक दिलचस्प बात यह है कि 4 जुलाई, मेमोरियल डे या क्रिसमस जैसे मौकों पर परिवारिक मिलन होते हैं। लेकिन यह समय वेश्याओं के लिए भी काम में तेज़ी का समय होता है। वेंकटेश ने पाया कि इस दौरान कई आम घरेलू महिलाएं भी इस काम में शामिल हो जाती हैं। यह अर्थशास्त्र का एक सीधा सा नियम है: जब बाज़ार में तेज़ी आती है, तो कई नए लोग इसमें शामिल हो जाते हैं, और तेज़ी खत्म होते ही वे गायब हो जाते हैं।
पुस्तक में हाई-एंड (महंगी) वेश्याओं की भी बात भी की गई हैं। उनके अपने अपार्टमेंट होते हैं। वे खुद अपने ग्राहक चुनती हैं। वे पुलिस से सुरक्षित रहती हैं और आम वेश्याओं की तुलना में कहीं ज़्यादा कमाती हैं।
वेंकटेश ने देखा कि पहले महिला दलाल (या मैडम) का बोलबाला था, लेकिन धीरे-धीरे पुरुषों ने उनकी जगह ले ली। यह भी आर्थिक नियमों का एक उदाहरण है। पुरुषों को महिलाओं की तुलना में बेहतर मौके मिलते हैं और बेहतर कमाई उन्हें आकर्षित करती है, जिससे महिलाएं इस काम से बाहर हो जाती हैं।
पुलिस और कम्युनिटी लीडर्स की क्या भूमिका रहती है? वे इसे पसंद नहीं करते, लेकिन कई वजहों से उनका दखल न के बराबर होता है। बिना दलाल वाली वेश्याएं सुरक्षा के लिए पुलिसवालों पर कृपा (आमतौर पर सेक्स के ज़रिए) करती हैं, जबकि दलाल समझौतों के ज़रिए सुरक्षा का इंतज़ाम करते हैं। समझौता में यह वायदा किया जाता है कि बच्चों के पार्क को इसे दूर रखा जाएगा और ज़्यादातर गतिविधियां घर के अंदर ही होंगी।
वेंकतेश ने पाया कि वेश्यों की कमाई गत दशकों में कम हो रही है। क्यों? उन का कहना है कि पिछले पचास सालों में समाज में खुलापन बढ़ा है। शादी से पहले (और शादी के वादे के बिना) सेक्स बढ़ रहा है; जब पुरुषों को सेक्स मुफ्त में मिल सकता है, तो वे उस पर पैसे क्यों खर्च करें? यही बात एक्स्ट्रा-मैरिटल सेक्स (शादी के बाहर सेक्स) पर भी लागू होती है। (नोट - यह अमेरिका के हालात हैं। भारत को अभी इस स्थिति तक पहुँचना बाकी है)। (प्रकाशक – एलन लेन (पेंगुइन बुक्स की एक इकाई – 2009))
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