top of page

भ्रष्टाचार क्यों आवश्यक है

  • kewal sethi
  • Sep 7, 2022
  • 7 min read

भ्रष्टाचार क्यों आवश्यक है


भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार है। याद हो गा कि जसपाल भट्टी ने एक सीरियल बनाया था। उस की बेटी की शादी उस के मनपसंद लड़के से नहीं हो रही थी। लड़के के बाप रईस थे और पैसा कमाने के लिये उन्हें किसी बात से परहेज़ नहीं था। ऐसे में मित्र की राय से भट्टी ने अपने घर पर आयकर अधिकारियों से छापा डलवा दिया। उस का रुतबा बढ़ गया और लड़के का बाप भी प्रभावित हुआ। रिश्ता तय हो गया।

कहने का अभिप्राय यह है कि जब समाज किसी बात को अच्छा मानता है तो उस से परहेज़ नहीं किया जा सकता। हर व्यक्ति में आगे बढ़ने की लालसा होती है। चाहे आदमी अमीर हो अथवा गरीब, यह इच्छा सब में रहती है। समाज की अपनी मान्यतायें होती हैं जिस से वह व्यक्ति का महत्व परखता है। अच्छी शाला में प्रवेश, अच्छी कार, अच्छा मकान, अच्छा रहन सहन, यह ही वह संकेतक हैं जिन से समाज मानता है कि कौन कितने पानी में है।


अब किसी अधिकारी की बात लें। वह अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में नहीं भेज सकता। एक तो वहॉं का वातावरण उसे नहीं भाता पर उस से अधिक दूसरों के ताने नहीं भाते। पर अच्छे स्कूल में प्रवेश आसान थोड़ा ही है। अगर वह ऐसा अधिकारी है कि कुछ देने की स्थिति में है, तो सौदा पट जाता है नहीं तो नकद पैसा देना पड़ता है। अब पैसा आये कहॉं से। वेतन तो बंधा है। खाने पीने पर व्यय तो कम नहीं किया जा सकता। और भी अपना रुतबा बनाये रखने के लिये साधन चाहिये। अतः भ्रष्टाचार ही एक मात्र रास्ता रह जाता है।


हफता की परम्परा बड़ी पुरानी है। लोग बेकार ही पुलिस वालों को बदनाम करते हैं। उस समय जब पुलिस नहीं होती थी तो स्थानीय दादा सब की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी ले लेता था। उस को भी जीवन यापन के लिये कुछ रकम देना होती थी। अब यदि दुकान ऐसे स्थान पर लगई गई है जहॉं वह कानूनी ढंग से नहीं लग सकती तो उस के लिये कुछ सहूलियत तो दादा को देना ही हो गी। हर बात का मूल्य होता है जो चुकाना पड़ता है। इस के लिये पैसा चाहिये। उस का रास्ता कई सुझा सकते हैं, बस आदमी को तैयार रहना चाहिये। रहा पुलिस का सवाल तो उस के हफता वसूली का भी कारण है। इस के लिये एक उदाहरण देना हो गा।


हर आदमी का बजट होता है जिस प्रकार किसी उद्योग का होता है। उद्योग में मशीनरी पर खर्च होता है, मज़दूरी पर होता है, यातायात पर होता है। और तो और सुरक्षा पर भी होता है। अगर कुल लागत 100 रुपये आती है तो इस से अधिक पर ही माल बेचा जा सकता है। कर की राशि का भी ध्यान रखा जाना है। पर इस से बचने के भी तरीके हैं। मान लें कि एक निश्चित राशि तक बिक्री होने पर कर से राहत है। मान लें कि यह सीमा पॉंच लाख वार्षिक है। अब अगी बिक्री साढ़े पॉंच लाख हो जाती है तो क्या प्रतिक्रिया हो गी। एक ऑंकड़ों में फेरबदल किया जाये, दूसरे नये नाम से कुछ बिक्री की जाये। देखना यह है कि खतरा किस में कम है। इसी लिये एक ही पते पर कई दुकानें चल रही है। इस में कुछ भी अवैधानिक नहीं है भले ही नैतिकता का अनदेखा किया जाता हो। अनैतिकता तथा कानून का उल्लंघन अलग अलग बातें हैं।


हम पुलिस वाले की हफता वसूली की बात कर रहे थे। अब उस का घरू बजट का ध्यान करें। उस का मान तभी हो गा जब समाज उस के रहन सहन से प्रभावित हो गा। अब वेतन तो उतना है नहीं तो हफता वसूली ही तरीका रह जाता है। यह कहना सही नहीं हो गा कि वरिष्ठ अधिकारी भी वसूली करते हैं। उन का वेतन तो कम नहीं है। वह सही है पर ओहदे के साथ समाज की अपेक्षायें भी बढ़ जाती हैं। इस कारण उसे समाज के कायदे के अनुसार ही चलना पड़ता है। केवल इस बात का ध्यान रखना होता है कि वह किसी की बुरी निगाह में न आ जाये। जोखिम तो है पर देखना यह है कि उस की तुलना में आराम कितना है। यह एक समीकरण जिस का हमेशा ध्यान रखना पड़ता है। चूक हो जाने पर दण्ड का भागी होता है।


एक दूसरा मौका देखें। मुझे सुबह छह बजे स्टेशन पर किसी को लेने जाना था। चौक पर पहुॅंचा तो देखा लाल बत्ती है और 180 सैकण्ड तक रहे गी। आम तौर पर कायदा है कि रात को ब्लिंगक मोड पर कर देते हैं पर जिस को यह करना था, उस ने नहीं किया। अब दो रास्ते हैं। 180 सैकण्ड तक रुका जाये ताकि कानून का पालन हो। गाड़ी के आने का समय भी सर पर हो, कोई पुलिस वाला, कोई कार वाला आस पास नहीं हो, ऐसे में कोई बिरला ही हो गा जो तीन मिनट तक रुका रहे। सुविधा किस में है, यह देखा जाये गा और उस का मूल्य हम चुकाने की स्थिति में हैं या नहीं, यह ध्यान में रखा जाये गा। मुझे याद है जब बिना रोशनी के साईकल रात को चलाते थे तो सामने से आने वाला आवाज़ दे देता था - अग्गे मामा ई। तब साईकल से उतर कर पैदल ही उस पुलिस वाले को - जिसे मामा कहा गया था - पार कर लेते थे। आजकल यह बात हैल्मट पर लागू होती है। अगर डिक्की में हो तो निकाल कर पहन लेते हैं नहीं तो पैदल चल देते हैं।

दोनों ही स्थिति में आदमी अनैतिक नहीं है। अधिकतर लोग ईमानदार हैं कुछ एक अपवादों को छोड़ कर। मौका उसे इस सुगम रास्ते - शार्ट कट - को अपनाने के लिये मजबूर करता है। और जैसा कि पूर्व में कहा गया है, अनैतिकता तथा कानून का उल्लंघन अलग अलग बातें हैं।


कहा जाता है कि सख्त कानून बनाने से भ्रष्टाचार में कमी हो गी। चीन से अधिक सख्त कानून कहॉं हों गे। बताया जाता है कि वहॉं भ्रष्टाचार के खिलाफ 1200 कानून हैं। परन्तु वहॉं पर भ्रष्टाचार कितना व्यापक है, यह कुछ किस्सों से पता चलता है। एक उदाहरण के तौर पर चीन में जनरल हो शिकार - जो फौजियों की पदोन्नति का कार्य देखते थे - के बारे में बताया जाता है कि उन के यहाँ जब छापा मारा गया तो उन के यहाँ पाई गई नकद राशि को ले जाने के लिए 12 ट्रकों का प्रयोग करना पड़ा। अन्दाज़ है कि चीन में भ्रष्टाचार के कारण प्रति वर्ष 86 अरब डालर की हानि होती है। वर्ष 2000 के बाद से लगभग 2000 अरब डालर राशि देश से अवैध रूप से बाहर गई है। भारत के काले धन के किस्से तो मशहूर हैं। कई विद्वानों का अनुमान है कि आधी अर्थव्यवस्था काले धन पर ही आधारित है। प्रश्न यह है कि सरकारें तथा न्याय व्यवस्था कानून को लागू कराने में किती सक्षम हैं।


सख्त कानून की बात छोड़ें तो देखा जाये गा कि इस घोषित भ्रष्टाचार के बावजूद चीन ने इतनी प्रगति की है कि वह विश्व में दूसरे नम्बर की आर्थिक शक्ति बन गया है। भ्रष्टाचार इस में आड़े नहीं आया। अतः भ्रष्टाचार को प्रगति में बाधक होने का दोष देना उचित नहीं है।


वास्तव में भ्रष्टाचार के तीन चरण होते हैं। पहले चरण में वह व्याप्त किन्तु अनुपूर्वानुमेय होता है अर्थात उस का पूर्व अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। कब किस मौके पर, किस को, और कितनी भेंट देना हो गी, यह निश्चित नहीं होता है। पुलिस वाला अगर बिना अनुमति किसी को ठेला चलाते देख ले तो राशि का मौल तौल ही करना पड़ता है। आदमी की हैसियत के अनुसार वसूली होती है। यदि व्यक्ति कुछ भी देने की स्थिति में न हो तो आम पुलिस वाला उसे चेतावनी दे कर छोड़ देता है। गाड़ी के बारे में कहते हैं कि अगर नई गाड़ी वर्कशाप से निकाली जाये तब भी उस के चालान के भी अवसर रहते हैं। कानून ही इस प्रकार का है। पर पुलिस वाले सब का चालान नहीं करते। उन की भी सीमायें है। पर मौका पड़ने पर वह चूकते भी नहीं। प्रश्न यहॉं भी वही है कि आराम किस में अधिक है तथा जोक्षिम किस में।


इस के विपरीत भ्रष्टाचार केे दूसरे चरण में राशि तथा लाभन्वित होने वाला व्यक्ति निश्चित है। मलेशिया में कहा जाता था कि रिश्वत की राशि उच्चतम स्तर पर तय होती थी तथा उस का भुगतान किया जाता था। उस के पश्चात नीचे के किसी व्यक्ति को कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती थी। सब का सहयोग प्राप्त हो जाता था। दक्षिण वियतनाम में राशि तय हो जाने के पश्चात दोनों पक्ष कल्ब में जाते थे तथा एक पक्ष निश्चित राशि जुये में हार जाता था। इस का बाकायदा हिसाब कल्ब में रहता था।


तीसरे चरण में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मान लिया जाता है। संयुक्त राज्य अमरीका में लाबी संस्कृति है। खुले आम उद्योग द्वारा तथा अन्य संस्थाओं द्वारा लाबी का काम किया जाता है। वर्ष 2021 में अनुमान के अनुसार लाबी करने पर 373 करोड़ डालर व्यय किये गये थे। परन्तु इस का दूसरा पहलू यह भी है कि भ्रष्टाचार जब श्ष्टिाचार नहीं रह जाता तो दण्ड कठोर होता है। ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर सीनेट में रिक्त स्थान पर व्यक्ति को नामित करने पर सौदा किया गया तो सम्बन्धित राज्यपाल को पद से हटना ही पड़ा और साथ में चौदह वर्ष के कारावास की सज़ा भी हो गई। भारत में तो दोषी पाये जाने, जेल हो जाने के पश्चात, बीमारी के कारण नेता जी बाहर हैं तथा धड़ल्ले से अपने राजनैतिक दल का संचालन कर रहे हैं।


इस सब चर्चा का सार यह है कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने की बात बेकार है। इस के साथ ही रहना हो गा। इस का इस्तेमाल देश की प्रगति के लिये कैसे किया जाये, इस पर विचार करना हो गा। इस के लिये एक तो राजनैतिक दलों की उगाही को कानूनी मान्यता देना हो गी क्योंकि वही गंगोत्री है। एक बार उस में पारदर्शिता आ जाये तो दूसरे मदों पर ध्यान दिया जा सकता है। दूसरे न्याय प्रक्रिया को बदलना हो गा ताकि यदि अनाप शनाप भ्रष्टाचार किया जाये तो उस का तुरन्त तथा असरकारी दण्ड सुनिश्चित किया जा सके। कम से कम यह प्रावधान तो हो कि जितनी राशि का भ्रष्टाचार किया गया है, उस से दुगनी राशि वसूल की जाये तथा वह मिलने तक व्यक्ति जेल में सश्रम सज़ा भुगता रहे जिस में टी वी देखना, खेलकूद में भाग लेना, प्रति दिन रिश्तेदारों तथा प्रशंसकों से मिलना तथा बीमारी का बहाना बना कर सहूलियत प्राप्त करना वर्जित हो।


सार यह है कि भ्रष्टाचार को होने दों पर उस की सीमा बॉंध दो और यह सीमा बॉंधने का काम समाज करे गा, कानून नहीं।



Recent Posts

See All
cause and effect a statistical riddle

cause and effect a statistical riddle a new medicine was invented for preventing heart attack. it was cllimed, it was good for people. statistics were quoted. 120 persons were examined, sixty who us

 
 
 
the hidden life of trees

a very interesting book came up – the hidden life of trees, author peter wholleben, publishers penguin. it is about european forests of north and central europe. the species mentinoned are oak, pine,

 
 
 
was changiz khan cruel

was changiz khan cruel it is the general impression that changez khan was a cruel person. in fact. in that period, cruelty was a regular feature between adversaries but it has to be distinguished that

 
 
 

Comments


bottom of page