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चंगेज़ खान -- भाग 4

kewal sethi
Mar 10
8 min read

चंगेज़ खान

भाग 4

मंगोल क्षेत्र के सर्वोच्च शासक बनने के चार वर्ष पश्चात, जब वह 48 वर्ष का था, उस के पास जर्चड राज्य के शासक, जिसे स्वर्णिम खान कहा जाता था, का एक प्रतिनिधि मण्डल उस के यहां आया। जर्चड राज्य की राजधानी ज़ोनगडू थी जो आजकल के बीज्रिग के स्थान पर थी। उन के राज्य में मंचुरिया, इन्नर मंगोलिया तथा चीन का बहुत सा भाग था। पूर्व में ओंग खान ने उन की अधीनता स्वीकार की थी तथा अब वह चिनगीज़ खान से भी वही चाहते थे।

जर्चड राज्य उन मार्गों को नियन्त्रित करते थे जिन से चीन का बहुत सा सामान एक स्थान से दूसरे को जाता था। इन का सामान मंगोल क्षेत्र में भी आता था। ऐसे में चयन इस बारे में करना था कि अधीनता स्वीकार की जाये ताकि सामान आता रहे या फिर इस सामान को ज़बरदस्ती लूटा जाये। जब स्वर्णिम खान का दूत चिंगीज़ खान के समक्ष आया तो चिंगीज़ खान ने दक्षिण की ओर मुॅंह कर थ्रूक दिया तथा बिना कुछ कहे, उत्तर की दिशा का चल दिया। स्पष्ट रूप से यह इंकार था और इस का अर्थ युद्ध था। बचाव तथा आक्रमण में का निर्णय करने से पूर्व चिनगीज़ खान ने खुरितलाई बुलाई जिस में उईगर तथा तांगुट के प्रतिनिधि भी बुलाये गये। यद्यपि युद्ध के मैदान में आदेश का पालन किया जाना अनिवार्य था, खुरीतलाई में हर व्यक्ति अपना मत व्यक्त कर सकता था।

खुरीतलाई में चर्चा के पष्चात चिंगीज़ खान में सर्वोच्च सत्ता से पास के पर्वत में जा कर आशीरवाद चाहा। उस ने कहा कि वह युद्ध नहीं चाहता परन्तु उस से बचाव भी नहीं है। चौथे दिन चिनगीज़ खान लौटा तथा कहा कि उसे आशीरवाद मिल गया है कि विजय हमारी ही हो गी।

यहॉं पर चीन के बारे में कुछ विवरण देना उचित हो गा। चीन में तीन राजवंश थे जिन में सुंग राजवंश का क्षेत्र सब से बड़ा था। जर्चड दूसरे स्थान पर था। इस के अतिरिक्त मंगोलिया के दक्षिण में कई छोटे छोंटे राज्य थें। इन में खेती भी होती थी और यह चरागाह भी थे। इन में अलग अलग समय पर अलग अलग कबीलों का वर्चस्व रहता था। जीवन आरामदेह था तथा एक के आरामपरस्त होने पर उत्तर से दूसरा कबीला आ कर उन को निकाल बाहर करता था। जर्चड के पश्चिम में तांगुट तथा उस के पश्चिम में उईघर राज्य थे। उईघर राज्य के साथ तो मित्रता हो गई थी। उईगर राज्य के पश्चिम में खितान राज्य था। वह तियन सान पर्वत तक था।

तांगुट राज्य पर चिनगीज़ खान ने वर्ष 1207 तथा 1209 के बीच आक्रमण कर उन्हें अपने आधीन कर लिया था। तानगुट मूलतः तिब्बत के रहने वाले थे जो यहाूं आ कर बसे थे। इन का क्षेत्र छोटे छोटे मरुस्थल उद्यानों की श्रृंखला थे जो पूर्व तथा पश्चिम के बीच का मार्ग थे जिस से सामान एक से दूसरी ओर जाता था। वास्तव में तानगुट क्षेत्र को जर्चड राज्य ने हरा कर अपने तहत कर लिया था।

तांगुट लोगों ने नगरों की किलाबन्दी कर ली थी। यह मंगोल लोगों के लिये नया अनुभव था कि किलाबन्दी को कैसे जीता जाये। नदी के जल को एक बार बॉंध बना कर नगर को सैलाब में बहाने का प्रयास किया पर नौसिखिये मंगोल लोगों का अपना कैम्प ही बह गया। पर वह धीरे धीरे तकनीक को समझने लगे। जो हो, तानगुट पर आक्रमण एक प्रकार से जर्चड के विरुद्ध युद्ध के अभ्यास सरीखा था।

यहां पर मंगोल लोगों के युद्ध के तरीकों पर विचार करना आवश्यक है। शिकार तथा मवेशी पालन उन की जीवन शैली थी। एक तो इस के लिये घुड़सवारी के माहिर होना आवश्यक था। दूसरे उन का भोजन सामिष था। उन की खेेती तो थी नहीं। वह न केवल अपने घोड़े ले कर चलते थे बल्कि अन्य जानवर भी सैना के साथ होते थे। इन्हीं पर उन का भोजन निर्भर था। उन्हीं से दूध प्राप्त करते थे। मार कर गोष्त खाते थे। इन घोड़ों तथा जानवरों के लिये चरागाह होना बहुत आवश्यक था। इस कारण वह प्रस्थान से पूर्व इस बात का पता लगाते थे कि रास्ते में चरागाह कहां मिले गी। दूसरी विषेष बात यह थी कि सैना की प्रत्येक ईकाई अपने में पूर्ण होती थी। आवश्यकता होने पर वह कच्चा किन्तु नर्म किया हुआ मांस भी खा लेते थे जो वह घोड़ों की काठी के नीचे रख कर कर सकते थे। सूखाया गया गोश्त तथा सुखाई गई दही भी रखते थे।

इस के विपरीत जर्चड क्षेत्र कृषि आधारित था। उन का खाना उन्हें पहुंचाना होता था। इस से उन की सप्लाई मार्ग लम्बा हो जाता था। खाना बनाने के लिये आग की आवश्यकता भी रहती थी। उन में वह फुर्ती नहीं थी जो मंगो्ल सिपाहियों में थी। उन को रसद चाहिये होती थी और उस के लिये लम्बा रास्ता तय करना आवश्यक था। दूसरी और खेतों में मेढ़ इत्यादि के कारण मंगोल घोड़ों को कष्ट होता था। इस लिये मंगोल जब विजय के पश्चात लौटते तो खेतों की मेढ़ों को नेस्तो नाबूद कर देते थे ताकि अगर फिर आने की आवश्यकता हो तो सुविधा रहे।

एक बात और ध्यान देने योग्य है। मंगोल सेना जब चलती थी तो उस का जमाव एक निश्चित प्रणाली में होता था। बीच में कमाण्डर तथा उस के चारों ओर दूसरे दस्ते। मंगोल सैनिक मुख्यतः अनपढ़ थे अतः उन का निद्रेष देने में तुकान्त आदेष होते थै ताकि आराम से समझ आ सकें। चूॅंकि सभी कैम्प का जमाव एक जैसा होता था, इस कारण जो वस्तु चाहिये, उसे पाने के लिये अधिक खोज नहीं करना पड़ती थी। आपस में आदेश का आदान प्रदान भी मौखिक ही होता था। आम तौर पर सेना जब चलती है तो गीत गाने के साथ। यह गीत दूसरी सैनाओं में औरतों के बारे में, घर के बारे मे, युद्ध के बारे में होते हें परन्तु मंगाल सेना में यह गीत आदेशों के बारे में रहते थे।

चिंनगीज़ ने सब से पहले खितान को जर्चड से अलग करने का प्रयास कियां। खितान को जर्चड हीन समझ कर वैसा व्यवहार करते थे। इस से उन में क्षोभ तो रहता ही था। उन्हें मंगोल सैना राहत दिलाने वाली प्रतीत हुई।

मंगोल सेना को किलों से लड़ने का तरीका नहीं आता था यद्यपि उन्हों ने इसे सीखने का प्रयास किया। उन का तरीका दुश्मन में घबराहट पैदा करना था। अक्सर वह आस पास के गांवों पर हमला करते, उसे तहस नहस करते और भाग लेते। स्थानीय किसानों को कैद भी कर लेते तथा उन से अपने लिये तथा घोड़ों के लिये खाना व चारा इकठ्ठा करने का काम करवाते। उन से एक काम पत्थर ढोने तथा किलों के आस पास की खाई को पाटने का काम भी करवाते। गॉंवों को जलाने का कार्य जब किया जाता तो वहॉं के लोग षहर की ओर भागते। रास्ते बन्द हो जाते और जुड़चन्द सेना के लिये रसद पहुॅंचना भी मंुष्किल हो जाती। षहरों में इन षणार्थिया्रें के कारण इंतज़ाम करना कठिन हो जाता। इस का परिणाम दंगों की षकल में भी देखने को आया। इन के दमन के लिये जुड़चन्द सैना को भी सामने आना पड़ा।

जर्चड सैना तथा मंगोल सैना में मनोवृति में फरक था। भागने का मतलब जर्चड सैना के लिये हार थी। पीछा करना उन के लिये जीत थी। इस के विरुद्ध मंगोल सैनिक की मनोवृति दुश्मन को मारने की थी। वह कैसे हो, इस से अन्तर नहीं आता था। भागते हुये भी मारना पड़े तो मारते थे। कई बार वह इस तरह व्यवहार करते थे जैसे हार गये हों। अपना सामान भी छोड़ कर चल देते थे। दूसरे सैनिक यह समझते कि मंगोल हार गये, वह पीछा करते तथा सामान को नगर में ले जाना चाहते। पर मंगोल का भागना धोका था, वह लौटते और बाहर आये सैनिकों का काटते तथा नगर द्वार खुले होने हो वह अन्दर दाखिल हो जाते तथा इस प्रकार विजय प्राप्त करते।

एक बार मंगोल सैना ने एक बड़े सैनिक काफिले पर हमला किया। वह दल किसी नगर में अतिरिक्त कुमक के तौर पर जा रहा था। कमाण्डर को बन्दी बना लिया गया और स्वयं एक मंगोल उस की वर्दी पहन कर तथा उस के कागज़ ले कर नगर में प्रवेश कर गया। घेरा डाले हुई मंगोल सैना हट गई जिस का अर्थ यह लगाया गया कि नवीन कमाण्डर एवं कुमक आने से वह हार कर भाग लिये। नकली कमाण्डर ने धीरे धीरे रक्षा के उपायओ को कम कर दिया। सिग्नल मिलने पर मंगोल सैना फिर लौटी और आराम से नगर पर कब्ज़ा कर लिया। ं

जब हार कर भागना पड़ता तो भी चालाकी से बाज़ नहीं आते। अपना सामान रास्ते में गिरा देते ओर जब विजयी सैना उस को समेटने में लगती तो वह बच निकलते।

स्टेप पर आपस के युद्ध में किसी रूकावट का सामना नहीं होता पर किला बन्द नगरो के लिये जर्चड सैना गुलेल - शिला प्रक्षेपक -ं का इस्तेमाल करती। यह तरीका मंगोल सैना ने भी सीख लिया। इस से पत्थर, जलते हुये तरल पदार्थ, तथा ूदसरी वस्तुये दीवार के पार फैंकने के लिये इस्तेमाल की जाने लगी। इस कौषल का पाने के लिये यंत्रियों का सम्मान किया गया तथा उन्हें पुरस्कृत किया गयां। इसी प्रकार इन की मदद से जलते हुये बांस के अन्दर बारूद भर का धोड़ों पर फैंका जाता जिस से वह बिदक जाते।

जब भागना पड़ता तो मंगोल सैनिक छोटे छोटे समूह में अलग अलग दिषा में भागते जिस से पीछा करने वाली सैना भी अलग अलग समूहों में बट जाती जिन से निपटना आसान हो जाता।

एक साल के युद्ध के पश्चात मंगोल सेना के लिये नई मुसीबत पैदा हुई। न वे, न ही उन के घोड़े उस उमस भरे वातावरण के आदी थे जो नदियों के किनारे होती थी। गरमी तथा उमस के मारे मंगोल अपने उच्च ठण्डे स्थान के ओर लौट गये ताकि आराम मिल सकें। मौसम ठीक होने पर वे फिर लौट आते।

उस मसय सविर्णम खान को स्वयं अपने परिवार के विद्रोह एवं षडयन्त्र के कारण लम्बे युद्ध के लिये अपने का असमर्थ पाया और चिनगीज़ खान से समझौता करना ही उचित माना। उस में तीन हज़ार घोड़े, 500 युवा देने का इरादा ज़ाहिर किया और अपनी राजकुमारी भी चिंगीज़ खान को विवाह में दी। उस समय तक खितान स्वतन्त्र हो चुके थे और उन की पूर्व के राजा शासक को सत्ता मिल गई थी। कुछ क्षेत्र जर्चड राजा के पास भी छोड़ दिया गया। चिनगीज़ खान को सीधे किसी क्षेत्र का प्रशासन सम्भालने का इरादा नहीं था। उईगर तथा तांगुट की तरह यह भी अपने क्षेत्र में कायम रहे। उसे तो केवल अपना सामान नियमपूर्वक प्राप्त करने का इरादा था।

अब रुकने का कोई मतलब नहीं था पर गर्मी आरम्भ हो गई थी और गोबी मरुस्थल को पार करना कठिन था। अतः मंगोल सैना रुकी रही।

जर्चड के राजा ने माहतैती तो स्वीकार कर ली थी पर वह अपने इकरारनामे से पलट गये। सविर्णम खान ने अपने राजधानी ज्क्ष्वांगडू से बदल कर केेिंग कर ली जो उन के विचार से मंगोल सैना से काफी दूर थी तथा इस कारण सुरक्षित थी। तीन साल से अपने क्षेत्र से दूर होने के बावजूद चिनगीज़ खान ने वहीं रहना उचित समझा। ज़्वांगडू के लोग यह समझते थे कि उन्हें बेसहारा छोड़ दिया गया है अतः बहुत से सैनिक तथा उन के अधिकारी मंगोल सैना की ओर आ गये। नगर का जीतना कठिन नहीं था पर इस बार नगर को जम कर लूटा गया। उस ने यह कात खिलान सेना के कमाण्डर को दिया जो जानते थे कि नगर में कहॉं क्या है। वह लूट का माल चिनगीज़ खान के पास लायें गे और वह उन को बॉंटे गा।

तातार पर विजय के बाद ही लूट का माल कायदे से वितरित किया जाता था पर उस के नये साथियों को यह नहीं पता था। वह अपने तरीके से बॉंटने में लग गये। जब चिनगीज़ खान को पता लगा तो उस ने लूट का सारा सामान ज़प्त कर लिया औ स्वयं बॉंटा।

लौटती बार चिनगीज़ खान ने सब बंधानों इत्यादि को तोड़ कर खुली जगह चरागाह के लिये बना दी। ज़मीन को घोड़ों के खुरों से रौंदा गया जिस से वह फिर खेत न बन सकें। इस अभियान से वे जानवर भी उन क्षेत्रों में लौट आये जो मंगोल जाति के लिये भोजन थे।

जब चिनगीज़ खान अपने लूट के साथ लौटा तो इस तरह लग रहा था जैसे पूरा रास्ता रेशमी कपड़े का ही हो। ऊॅंटो और बैल गाड़ियों को भी रेशमी कपड़े से लपेटा गया था।

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