• kewal sethi

नीना

एक कहानी और।

कई साल पहले लिखी थी जब मोबाईल नहीं थे। स्मार्ट फोन नहीं थे। अब इण्टरनैट ने मौका दिया है बताने का।

इसी का लाभ उठाया जा रहा है।

नीना


केवल कृष्ण सेठी


नीना सुंदर सुडौल हंसमुख लड़की थी। अभी-अभी शास्त्र विषय के साथ बी ए किया था। उस के बाद सैक्रीटिएट ट्रेनिंग भी ले ली थी। नौकरी की तलाश में उसे ज़्यादा भटकना नहीं पड़ा था। उस की शिक्षा ने और उस से भी बढ़कर उस के रूप में उसे पी ए के पद पर नियुक्त करा दिया था। उस का बास उस के कार्य से विशेष रूप से प्रसन्न था। सब कुछ सुघड़, सुचारू रूप से वह कर रही थी। उस का बास उस से पूर्व काम करने वाली निजी सहायक से काफी परेशान था। कई बार वह उस की गलतियों के, उस के भुलक्कड़पन, उस के गलत व्यवहार के किस्से सुना चुका था। और मुकाबले में उस की प्रशंसा के पुल बॉंध चुका था। इतने कि कभी कभी नीना, जो कि प्रशंसा की उतनी ही दीवानी थी जितना कि उस की स्थिति में, उस की आयु में कोई भी होता, भी शर्म महसूस करती थी। क्या वाकई ही वह उतनी ही अच्छी थी।

यही नहीं, कि उस का बास ही उस की कार्यकुशलता से प्रभावित था। दफतर के अन्य लोग भी वैसे ही उसकी तारीफ करते थे, विशेषतः अशोक। अशोक अभी हाल में ही एम बी ए क रके प्रोबेशनरी अधिकारी के पद पर नियुक्त हुआ था। आकर्षक व्यक्तित्व, बातचीत में निपुण। उस की प्रशंसा बीना के मुख पर लाज की लालिमा लाये बिना न रहती थी। वह नीना के कार्य से, नीना से प्रभावित था और नीना उस से। दोनों अब कभी कभी दफतर के बाद साथ साथ भी जाने लगे थे। चाय पर, होटल में बैठ कर, एक दूसरे का हाल जानने लगे थे। दफतर के लोग उन की बढ़ती हुई घनिष्टता को चर्चा का विषय बनाने लगे थे। बड़ी अच्छी जोड़ी है यह अधिकतर लोगों का विचार था। फंस रही है - यह कुछ अन्य जो अपने को समझदार समझते थे, सोच रहे थे। उन की नजर में अशोक ज़रूरत से ज्यादा होशियार, चुस्त व चालाक था। शायद यह उन के रकाबत की बात थी या उन की जलन की।

नीना, लैटर लेना लाल एंड संस के प्रबंध संचालक के नाम- माय डियर - तुम्हें नहीं कह रहा हूं - लिखो माय डियर सो एंड सो, प्लीज़ रैफर टू ........

ठीक, लिख लिया

यस सर

सॉरी, थोड़ा लंबा है और हां इसमें स्टेटमेंट भी साथ लगाना है। चड्ढा से लेकर टाईप कर लेना।

यस सर

सॉरी, थोड़ा समय लगे गा। साढ़े पा¡च बज जाए गे लेकिन क्या करूं, आज भेजना जरूरी है

कोई बात नही सर

तुम्हारी बस मिस हो जाएगी

कोई बात नहीं। मैं दूसरी ले लूं गी सर

ठीक है

लेकिन स्टेटमेंट वाकई ही लंबा था। 5;30 बजे तक भी पूरा नहीं हो पाया। अशोक पूछने भी आया कि कब चलना है लेकिन नीना इसे समाप्त करके ही जाने के मूड में थी। अशोक ने थोड़ी देर तक इंतजार किया और फिर चला गया। दफतर में केवल नीना तथा उस का बास रह गए।

6;30 बजे टाइपिंग समाप्त हुई। बास ने उसे देखा, परखा और सही पाया।

चलिये यह काम तो हो गया। उस ने इतमीनान की साॅंस लेते हुए कहा। फिर चैकीदार को आवाज देकर उसे कमरे बंद करने की हिदायत देते हुए वह नीचे आ गये।

देर हो रही है। अभी रश का समय है। चलो, मैं तुम्हें घर पर छोड़ देता हूं। सड़क पर आते आते उस ने कहा।

नहीं सर, मैं चली जाऊंगी

अरे कौन रास्ते से ज्यादा बाहर है। आधा मील ही तो है। मुश्किल से दो चार मिनट लगें गे।

नतीजा यह हुआ कि कुछ समय बाद वह उस की कार में घर की तरफ जा रही थी


2

इधर उधर की बात करते हुए अचानक उसने कहा।

अरे मैं ने तुम्हें बताया था ना कि मेरी पत्नी तुमसे मिलने की बहुत इच्छुक है। कई बार तुम्हारी तारीफ कर चुका हूं ना। बड़ी मुश्किल से आजकल कोई अच्छा वर्कर मिलता है

जरुर मिलूंगी सर।

आज ही चला न। अभी रास्ते में ही है।

नहीं सर आज तो देर हो गई है। फिर आ जाऊंगी।

भई, हमें तो यह तुम्हारी आदत कभी नहीं लगी कि आज का काम कल पर डालो। ख्याल आ गया है। लगे हाथों इसे निपटा ही देना चाहिए। बस एक कप चाय। 10 मिनट ज्यादा ज्यादा। उस के बाद तो तुम जानो और वह।

बास में गाड़ी का रुख अपने घर की तरफ कर दिया था। वह अभी भी बातें किया जा रहा था। नीना तय न कर पा रही थी कि वह क्या करें। घर वाले उस के थोड़ा लेट आने की आदत से वाकिफ थे। इधर उधर किसी सहेली के यहां चली गई हो गी। कोई ऐसे इंतजार भी नहीं करता। अक्सर वह बाजार हो कर ही घर जाती थी। सामान खरीदने के लिए। फिर बास कह रहा है तो पाॅंच दस मिनट और सही। कुछ देर बैठ ले गी।

वह इसी उधेड़बुन में थी कि कार रुक गई। वे बास के मकान के पास आ गए थे। ऊॅंचा दस बारह मंज़िल का भवन था। पॉंचवें या छटे तल पर उस का अपार्टमेंट था। वह मुम्बई के उस इलाके में था जिसे पाश कहा जाता है। स्वचलित लिफ्ट पर वे ऊपर पहुंचे। एक अपार्टमेंट के सामने। । बास ने बैल बजाई। पर कोई उत्तर नहीं आया। थोड़ा इंतजार करने के बाद फिर बैल बजाई पर वही स्थिति।

लगता है कहीं चली गई हो गी आसपास। उस ने अपने जेब से चाभी निकालते हुए कहा। दरवाज़ा खोला।

आइए। गरीब खाने को नवाज़िये।

कमरा अच्छा सजा हुआ था। सोफा कुर्सी। खाने की मेज़, दो व्यक्तियों के लिए।

आइए बैठिए। क्या पियें गी आप। । बीयर? काफी गर्मी है या फिर कोल्ड ड्रिंक। या चाय?

कोल्ड ड्रिंक ही काफी रहेगी

माईण्ड मैं अगर मैं बीयर ले लूं ।

ओ नो।

थैंक्स

बास अन्दर रसोई में गया और थोड़ी देर में 1 मग में बियर और एक गिलास में थोड़ा कोल्ड ड्रिंक ले आया।

आई नहीं अभी तक। पता नहीं कहां चली गई है। फोन पर तो यही कहा था ठीक समय पहुंच जाएगी

इट इज़ ऑल राइट, कहते हुए नीना ने कोल्ड ड्रिंक उठा ली

कमल- बास - ने भी बीयर की चुस्की लेना शुरू की।

अचानक नीना को लगा उसका सर कुछ बोझिल सा हो रहा है। जैसे वह थक गई हो। उसे नींद आ रही हो।

अरे, यह मुझे क्या हो रहा है - वह घबराहट में बोली।

कुछ नहीं, कमल ने बियर पीते हुए कहा, सिर्फ नींद की गोली का असर।

क्या? हैरानी से बोली नीना।

हां, मुझे लग रहा था तुम थकी थकी सी हो। मैं ने थोड़ा आराम करने का इंतजाम कर दिया है। अन्दर बैडरूम की तरफ इशारा करते हुए उस ने कहा।

यू, यू, कहां है तुम्हारी पत्नी।

मेरी पत्नी। वह यहां नहीं है। वह यहां आने वाली भी नहीं है। यह मेरा निजी कक्ष है। । उसे तो इस का पता भी नहीं है। मैं भी कभी कभी ही यहाॅं आता हूॅ। कोई तुम सा सुंदर शिकार फंसता है तो, कमल ने हंसते हुए कहा।

तो यह सब धोखा है, बेईमानी है, धोखेबाज, मक्कार

देखो यह सब बातें बेकार हैं। तुम थकी हो। सो रही हो। ऐसे में प्रतिरोध मुश्किल होता है। बस यही मेरी सफलता का राज है। आओ आराम करें।

कहते हुए उस के पास आ गया और उस की कमर में हाथ डाल दिया। नीना ने उठना चाहा पर उस में उठने की हिम्मत नहीं थी। चिल्लाई पर शायद आवाज ही नहीं निकल सकी।


3

जब उसे होश आया तो लगा काफी समय बीत चुका है। वह अंदर के रुम में बिस्तर पर पड़ी थी। उस के कपड़े अस्त व्यस्त थे। एक चादर उसके शरीर पर थी। सामने कमल एक आराम कुर्सी पर बैठा सिगरेट पी रहा था।

उस को जागते देख कर कमल ने मुस्कुराते हुए कहा

जाग गईं आप। मैं कब से इंतज़ार कर रहा था। उठो, फिर तुम्हें घर छोड़ आऊॅं। मैंने कपड़े पहनाये नहीं। सोचा नहा-धोकर फ्रेश हो कर जाना अच्छा रहता है

नीना खोई खोई आंखों से उसे देख रही थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था यह सब क्या हो गया। कमल की बातों से उसे अपनी स्थिति का ध्यान आया। यह क्या हो गया, अब मैं किस को मुॅंह दिखाऊंगी। वह सिसकने लगी। साथ ही वह कमल गालियां भी सुना रही थी। गालियाॅं जो उसे पता भी नहीं था कि उसे आती हैं।

लेकिन कमल मुस्कुराता रहा।

देखो, जो होना था हो चुका। यकीन करो मैं इस का नाजायज फायदा नहीं उठाऊंगा। यहां रहने का तो इरादा नहीं है तुम्हारा। कपड़े पहन लो। शायद शर्म आ रही हो। जरुरत तो नहीं है पर खैर, मैं बाहर बैठा हूं।

यू यु रास्कल

ठीक है, ठीक है। मैं बाहर हूं। पर जल्दी करो। घर वाले राह देखते होंगे। लगभग 8 बज रहे हैं।

कमल बाहर निकल गया। नीना ने आस पास पड़े हुए कपड़ों को देखा और बुझे मन से पहनने लगी। अब उस का मस्तिष्क काम करने लगा था। यहां से, जाना है, जल्दी जाना है। इस का बदला लेना है। बेईमान बास भी याद रखें, ऐसा बदला। इंतकाम। उसे इसी के लिए ज़िंदा रहना है

कपड़े पहने। चेहरा देखा। याद आया कि घर जाना है। घर पर यह बात बता भी नहीं सकती। चेहरे को कुछ संवारा बाहर निकली।

कमल खिल उठा। तुम तो पहले से भी सुंदर लग रही हो मेरी जान। मजा आ जाए गा दोनों को। ऐसा करना आज तो तुम्हें देर हो रही है। कल आ जाना इसी समय। मैं इंतजार करूंगा।

यू ब्लडी इडियट। बेईमान ........ नीना ने गालियों की बौछार लगा दी।

बस बस, ज्यादा नहीं। मैं दरवाजा खोल रहा हूं। कोई सुन लेगा तो सारी बात मिट्टी में मिल जाएगी। चुप चाप निकल जाएं गे। कोई देख भी नहीं पायेगा। हमारी बात यहीं तक रह जाए गी।

कमल ने नीना को उस के मकान के पास वाले नुक्कड़ पर छोड़ दिया। जाते हुए कहा -

कल मिलेंगे। 6 बजे वहीं। अगर मुझे देर हो जाए तो इंतजार करना। एक चाबी पर्स में डाल दी है। हां तुम्हारा वेतन तो बढ़ाना ही हो गा। इस महीने से ढयोड़ा। बाई बाई, कल 6 बजे। और नहीं तो अशोक तक यह खबर पहुंच जाएगी। समझी्।


4

नीना रात भर सो नहीं सकी। खास तौर पर आखिरी बात उसे कचोटती रही। खबर अशोक तक पहुॅंच जाए गी। जाने और किस-किस तक पहुंच जाएगी। फिर उस का क्या होगा। बदनामी। घर भर की बदनामी। अब वह क्या करे। क्या वह शिकायत करें। किस से । कौन माने गा। क्या वह अपनी रजामंदी से उस की कार में नहीं बैठी थी। क्या उस से वहीं पर शोर मचाया था। कौन माने गा उस की बात। कल वह दफतर नहीं जाए गी, किसी भी कीमत पर नहीं जाए गी। पर बदनामी। पर बदला। कैसे ले गी वह बदला। उसे दफतर जाना ही हो गा।

सुबह उसे मोहल्ले के एक गुंडे का ध्यान आया। काफी बदमाश था वो। कई बार वह जेल जा चुका था। उस से बात तो कभी नहीं हुई थी पर उस के बारे में वह जानती थी। सारा मौहल्ला जानता था। नाम था करमा। पूरा नाम क्या था, क्या मालूम। हट्टा कट्टा। वह आवारागर्दी करता रहता था। मोहल्ले में उस के डर से कोई घुसता नहीं था। मौहल्ले का वह चेहता नहीं था पर सब जानते थे कि एक अर्थ में वह मोहल्ले का रक्षक है। आसपास के बदमाश इधर आ नहीं पाते थे। वैसे तो वह इलाका अच्छा नहीं था पर बुरा भी नहीं था। पर जैसे आज कल के शोहदों का चलन है आती-जाती लड़कियों पर आवाजें कसना, फिल्मी गीत गाना तो फैशन ही था लेकिन उन के मौहल्ले में ऐसा नहीं होता था। उस के द्वारा कभी किसी से ज्यादती नहीं की गई। शायद करमा अपने को उस गली के लड़कियों का मुहाफिज़ समझता था। कुछ हुआ और उस ने लड़ाई मौल ली। इसी कारण मोहल्ले में उस के प्रति एक अजीब सा भाव था। इज्जत तो नहीं थी पर क्या, शायद कृतज्ञता।

जो भी हो, नीना को उस का ध्यान आया। वह कमल से बदला ले सकता था। उसे इस बारे में बताया जा सकता है। पूरा बताना तो जरूरी नहीं है। कुछ भी कहा जा सकता है। क्या कहना चाहें गी वह कमल के बारे में। क्या करना चाहे गा वह कमल के साथ। करमा ही कुछ सोचे गा।

दफतर जाने के लिए वह जल्दी तैयार हो गई। आज दफ्तर में काम था, इस लिये। बहाना बना कर बीस पच्चीस मिनट पहले निकल आई। कैसे करे गी वह करमा से बात, आज तक तो की नहीं थी पर बात नाजुक थी। आज ही का मौका था। फिर न जाने क्या हो।

गली के नुक्कड़ पर करमा बैठा था। ऐसे ही खाली, रोज़ की तरह। एक बीड़ी सुलगाए हुए। बिखरे हुए बाल, गठा हुआ शरीर, बेपरवाही उस की रग रग से प्रगट थी। नीना ने गुजरते हुए अचानक नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़ दिए। करमा अवाक रह गया। वह यह क्या देख रहा है। पहले तो नीना ने कभी ऐसा नहीं किया था। वह रोज ही वहां बैठा रहता था, नीना रोज है वहाॅं से गुजरती रहती थी, पर नमस्ते तो कभी नहीं हुई। वह क्या करें। तभी नीना ने कहा - एक जरूरी बात करनी थी तुम से। बस स्टॉप तक चल सको गे मेरे साथ। करमा के मुॅंह से एक शब्द भी नहीं निकला। वह चुपचाप उठकर साथ चल दिया, धागे से बन्धा हुआ सा। यह सब बातें उस के लिए नई थीं और अनोखी। बस स्टॉप के पास जा कर नीना आने नीना ने कहा - यहां भीड़ है, जरा आगे चलेंगे। और वह आगे चल दिए।

देखो, तुम्हें पता है तेरी नौकरी लग गई है

हां हां लगभग रुंधे गले से करमा ने कहा

हां, अच्छी जगह है, तनख्वाह भी अच्छी है, पर एक मुसीबत है। मेरा बॉस बहुत बदमाश है। परेशान कर दिया है मुझे। न जाने कैसे घूरता रहता है। यहां गली में तो तुम्हारे रहते हुए शांति रहती है पर दफ्तर में, उफ़।

साला, बदमाश - करमा ने दांत भींजते हुए कहा। उसे लगा उस के आरक्षित व्यक्तियों पर कोई बुरी नजर डाल रहा है। वह उसे कच्चा चबा जाए गा। सचमुच कमल अगर सामने होता तो उसकी गर्दन मरोड़ देता।

नीना को लगा, उस का काम बन जाएगा। उस ने फिर एक गहरी लगभग प्यार भरी नजर करमा पर डालते हुए कहा - हां, वह बदमाश मुझ पर डोरे डालना चाहता है। डिक्टेशन देते हुए कल उस ने हाथ भी छू दिया। ‘केवल हाथ ही छू दिया’, सोच कर, नीना का गला भर आया फिर वह संभल कर बोली - कुछ भी कहता है वह, जैसे मैं कोई बाजारु औरत हूं।

ऐसा, देखता हूं उस को। साले को छठी का दूध याद ना करा दिया तो मेरा नाम नहीं

पर उसे पकड़ो गे कहां और लोग ना छुड़ा लें गे क्या

यह बात तो सच है। तुम ऐसा करो उसे किसी जगह बुला लो। फिर देखो

हां, यही सोच रही थी मैं, देखो मेरी एक पहेली है। आजकल बाहर गई है मां बाप के पास। उस का फ्लैट खाली है। चाभी मेरे पास है। तुम उस में चले आना। मैं कमल- वह मेरा बास है - बदमाश, लोफर, आवारा। उसे वहीं आने को कह दूं गी एक चाबी भी उसे दे दूं गी ताकि मुझे साथ ना आना पड़े।

यह ठीक है। पर अपण को जगह का पता नहीं है।

वो तो मैं तुम्हें साथ ले चलूॅं गी। पर तुम अकेले कर पाओ गे क्या। वह बदमाश पता नहीं क्या-क्या साथ रखता हो। किसी को साथ ले लो।

कोई बात नहीं। मैं लाला को साथ ले लूं गा। पर मैं तुम्हें कहां मिलूं।

मिलने की जगह तय हो गई और नीना दफतर की ओर बढ़ गई। करमा लाला की तलाश में निकल पड़ा।


5

दफ्तर में नीना को नाटक करना था। उस के मन में क्रोध का बवंडर था। पर चेहरे पर उसको सादगी रखना थी। जैसे कि कुछ हुआ ही ना हो। उसी पहले के ढंग से डिक्टेशन लेना। बल्कि एक बार तो थोड़ा मुस्कुरा भी दी थी। कितना दर्द हुआ था उसे मुस्कुराने से।

पर कमल का मन खिल उठा। इतनी आसानी से लड़की पट जाएगी, उसे मालूम न था। उसे यकीन नहीं हो रहा था। बुझी बुझी तरह से काम करेगी, उस की अपेक्षा थी। शायद डयोढ़े वेतन ने बाज़ी मार ली थी। आगे की बात करने में समय लग जाएगा। चाभी देना तो सिर्फ छलावा था। उसे मालूम था कि चाबी देने से कभी कभी काम निकल पड़ता है। पर इतनी जल्दी, ऐसा नहीं। दो चार रोज़ बाद याद कराना पड़ता है कि चाबी उस के पास है। आज उस का इस्तेमाल करें नहीं तो ..........। अकसर यह धमकी काम कर जाती थी। पर यह तो ज्यादा ही मॉडर्न निकली। क्या कुछ पिलाने की जरुरत भी थी। वह तो गधा है। सब को एक जैसा ही मानता है। पर इतनी सुंदर, इतनी जल्दी। मजा आ गया। उस का दिल शाम के ख्याल से बल्लियों उछलने लगा। पर अरे। उसे तो मिलने जाना था प्रोपराइटर से। वह बहाना बना ले। आज की सुनहरी शाम। लेकिन नहीं, यह मुलाकात बहुत ज़रूरी थी। वह इसे पहले करा ले। नहीं, उस के लिए मुझे वजह बताना पड़ेगी। नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता। पर वह हाॅ, हाॅं करता रहे गा, शीघ्र ही छूट जाए गा। कोई बहस नहीं, केवल सहमति।

कब शाम हो, कब हो मिलन की बेला। बेबस लड़की से क्या होता है। मजा तो जब है जब वह आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई। अरे वाह, यह मारा तीर उस ने।

अशेक को उस ने गर्व भरी नजर से देखा जो कि नीना से बात कर रहा था। हॉं, यह तो बात ही करता रह जाए गा। और वह।

नीना अशोक से बात तो कर रही थी पर उस का मन उस में ना था। उसे भी जल्दी थी। कब काम खत्म हो। 5 बजें और वह चलें। 5 बजे जाने से क्या होगा उस ने तो 5ः45 का समय दे रखा था।

अचानक उस ने सुना - अशोक कह रहा थ, यहां तो तुम व्यस्त ही रहती हो। दफतर के बाद सामने के रेस्टोरेंट में चाय पिएं गे, तभी बात हो पाएगी।

हॉं, हॉं , 5 बजे चलें गे - उस ने कहा। सोचा, आधा घंटा चाय और उस के बाद।


6

आज कुछ उदास क्यों हो

मैं, उदास क्यों होने वाली होने लगी मैं

यह तो मैं नहीं जानता। आज सारा दिन तुम्हारे चेहरे से उदासी झलकती रही। कोशिश तो बहुत की तुम ने, लेकिन नामुमकिन है हालते दिल अशोक से छुपाना।

गलतफहमी हो गई है तुम्हें। उदास नहीं हूं मैं

यूं ही सही, परमात्मा करे, तुम कभी उदास ना हो

थैंक्स

वैसे कहो तो मैं तुम को तुम्हारी उदासी की वजह भी बता दूं.

क्या?

बॉस - श्री कमल

ओ, नानसेन्स

जिस तरह से तुम उस की तरफ देख रही थी आज, उस से ज़ाहिर है

अशोक, तुम्हें क्या हो गया है

सॉरी, पर कल उस ने कुछ बदतमीजी की क्या

यू शट अप

एंड हैव टी, ओ के

चाय आ गई थी। नीना उस का घूंट गले से उतार नहीं पाई। क्या अशोक को सब पता चल गया है। उस के चेहरे से सब कुछ ज़ाहिर था। क्या अशोक का कोई दूसरा सोर्स है। या यह सिर्फ उस की कल्पना में उड़ान है। अशोक उसे यह सब क्यों बता रहा है। क्या चेतावनी के तौर पर। या कोई अन्य कारण है। क्या उसे शक है और उस से वह उगलवाना चाहता है। आखिर वह अशोक के बारे में क्या जानती है। कौन है, कैसा है। बदमाश है या शरीफ। भेड़ है या भेड़ की खाल में छुपा हुआ भेड़िया।

मैं ना कहता था, तुम खोई खोई सी हो।

ओह। सॉरी, मैं कुछ सोच रही थी।

इस उम्र में कुछ सोचने का मतलब बहुत नाजुक होता है।

तुम तो गधे हो।

या फिर बहुत भयानक -जैसे उस ने सुना ही नहीं।

नीना चौंक गई। क्या यह आदमी तो कुछ ज्यादा ही होशियार है

अच्छा, थैंक्स फार दी टी। जरा जाना है एक सहेली से मिलने।

ओ के, बाय।


7

कमल खुश था। उस ने अपने प्रोप्राइटर को 40 मिनट में ही निपटा लिया था। सिर्फ सवा 6 बजे थे। इंतजार कर रही हो गी, उसे यकीन था। शायद न भी हो। कोई बात तो हुई नहीं। कोई इशारा भी नहीं। उस ने आंख मार पर पता क्यों नहीं कर लिया। पर नहीं, जल्दी मैं सब गड़बड़ हो सकता है। देख लेते हैं। है तो अच्छा है नहीं तो कौन से जिंदगी खत्म हो गई है। अगर वह हुई तो अगला घंटा डेढ़ घंटा कितने मज़े का बीते गा। वह घर से कोई बहाना बना कर आई हो गी। जाने की कोई जल्दी नहीं हो गी। सपने सुनहरे होंगे उस के, कितनी बार वह हो गी उस की। एक बार दो बार पर ज्यादा नहीं। क्या एक बार के बाद उसे बताए कि यह पहली बार थी। कल कुछ नहीं हुआ था। सिर्फ कपड़े इधर-उधर किए गए थे। कैसे चौंके गी, क्या कहे गी वह। सोच कर उस का मन खिल उठा। क्या बढ़िया दिल्लगी रहे गी। आज वह मुस्कुरा कर कहे गी, कल भी क्या जरुरत थी गोली की। तुम मुझ से कहते तो सही।

फ्लैट के सामने पहुंचकर उस ने घंटी बजाई पर कोई जवाब नहीं। शायद शरमा रही है। कल की बात और थी पर आज तो होशो हवास में होगी। मिलन की बेला में शर्म आ ही जाती है। कितना खुश नसीब है वह। दौबारा घंटी की पर जवाब नदारद। हौले से उस ने चाबी लगा कर घुमाई और अंदर दाखिल हो गया।


8.

सामने दो व्यक्ति सोफे पर बैठे शराब पी रहे थे।

कौन? कौन हो तुम?

डरो नहीं, तुम्हारे दोस्त ही हैं बेटा

कैसे आये तुम यहां पर

दरवाज़ा खोल कर

जानते नहीं, यह मेरा घर है। मेरी इजाज़त के बगैर यहां आये कैसे

अरे, अब क्या खड़े खड़े ही सवाल पूछते रहो गे कि आगे भी आओ गे।

तुम्हारे घर आये हैं, तुम्हीं से मिलने।

पर शायद तुम्हें किसी और का इंतज़ार था। आ गये हम।

काफी निराशा हुई हो गी न बेटा।

अब आ ही गये हैं तो इन की कुछ खातिर तवाजा तो की जाये। इन्हीं का घर है। इन को आराम तो मिलना चाहिये।

यह सब बातें नीना बैडरूम से सुन रही थी। उस ने करमा और लाला को बाहर ही छोड़ दिया था या उन्हों ने उस को अन्दर बन्द कर दिया था। वह स्वयं वहाॅं रह कर देखना चाहती थी कि क्या हो गा पर करमा नहीं माना। उसे लगा कि यह बात नीना के देखने लायक नहीं हो गी। आखिर फैसला यह हुआ कि वह बैडरूम के अन्दर से डायलाग सुने। बैड रूम तथा बैठक के बीच में खिड़की नहीं थी जिस से वह एक्शन देख सकती।

सिवाये पहले के वाक्य के कमल कुछ नहीं कहा था। करमा और लाला ही आपस में बात कर रहे थे। वह चाहती थी कि एक्शन शुरू हो। वह देखना चाहती थी पर देख नही पा रही थी। उसे मना कर दिया गया था। शायद बाहर से कुण्डी भी लगा दी गई थी। पर फिर भी वह प्रसन्न थी।

कमल कुछ समझ नहीं पा रहा था। कम से कम बोल तो नहीं रहा था। फिर नीना को लगा कि कोई कुर्सी पलटी। फिर मारपीट होने लगी। कमल का क्या मुकाबला उन से। दोनों .- करमा और लाला - हृष्ट पुष्ट थे। नीना मन ही मन कमल के पिटने की कल्पना कर रही थी। प्रसन्न हो रही थी।

इसी बीच शीशा टूटने की आवाज़ आई। शायद किसी अल्मारी का शीशा टूटा। फिर कमल की आवाज़ आई।

तो वह दगाबाज़ लाई तुम को यहां। पर तुम यह समझो कि मैं कल का छोकरा हूं तो यह तुम्हारी बेवकूफी है। अब आओ आगे।

यह क्या? क्या कमल उन पर भारी पड़ रहा है। राम, उस का क्या हो गा। यह तो कमल उन को ललकार रहा है। वह तो समझ रही थी, दोनों मिल कर उस कर कचूमर निकाल दें गे। क्या पासा गल्त पड़ गया। कमल ज़्यादा चालाक निकला। क्या उस के पास पिस्तौल ......। नीना सिहर उठी।

दरवाज़ा बाहर से बंद था। वह क्या कर सकती थी। खुला भी होता तो वह क्या कर सकती। मजबूर, बेबस। लाला और करमा को उस ने फंसा दिया। पर क्या वह अपनी रक्षा नहीं कर सकते।

फिर एक बार बाहर संग्राम की आवाज़। काफी देर तक उलटा पलटी होती रही। शायद कुर्सी भी फैंकी गई। फिर थोड़ा सन्नाटा। तेज़ सांसों की आवाज़।

फिर। फिर एक चीख। और किसी के गिरने की आवाज़। कौन गिरा। क्या हुआ। उस ने दरवाज़ा पीटना शुरू किया। वह अब और सहन नहीं कर सकती थी। यह क्या हो रहा है। अब क्या हो गा।


9

दरवाज़ा खोल दिया गया। वह बाहर आई। करमा और लाला खड़े थे। अपने कपड़ों को और शायद अपने ज़ख्मों को सहलाते हुए। कमल ज़मीन पर पड़ा था। एक चाकू उस के सीने में गड़ा था।

मर गया साला, शायद - करमा ने कहा

इस के पास तो काफी माल है। कुछ पी लिया जाये।

मेरा दिल भी धक-धक कर रहा है। थोड़ा आराम मिले गा।

अल्मारी में से शराब निकाल कर वह दोनों पीने लगे।

नीना का अब क्या दायित्व था। कहां तो उस का ख्याल था कि कमल की पिटाई हो चुकने के बाद वह उस के मुंह पर थूके गी। और फिर चल दे गी अपना बदला पूरा कर के। पर अब?

घीरे से वह दरवाजे की तरफ बढ़ी पर लाला ने रास्ता रोक लिया।

ठहरो। जा रही हो। हमें इस मुसीबत में छोड़ कर कहाॅं जा रही हो।

इतनी जल्दी ठीक नहीं - करमा ने कहा

लेकिन हमें यहां रुकना नहीं चाहिये - नीना ने कहा।

डरो मत, कोई नहीं आता यहाॅं, यह इस का अड्डा था, इसी काम के लिए। अब कौन आए गा -

लाला रास्ता रोके हुए कह रहा था।

जाना ही है यहां से सब को। क्या आगे, क्या पीछे। देखो यह साला जल्दी चला गया - करमा बोला।

तो तुम क्या चाहते हो, यहीं पड़े रहना।

करमा, बता इसे, हम क्या चाहते हैं।

नहीं नहीं, लाला, तुम ही कहो, तुम्हीं ही बताओ।

मैं बताऊॅं, लड़की, हम वही चाहते हैं जो यह बदमाश चाहता था।

क्या - लगभग चीख पड़ी नीना

चिल्लाओ मत, जानते हो कैसी जगह हो तुम, कोई आ गया तो। हम तो किराये के आदमी हैं पर वजह हो तो तुम ही हो। चाभी भी थी तुम्हारे पास। सुनो, हम भी मर्द है। हमारी भी इच्छायें हैं। यह जगह अच्छी है, यह शराब अच्छी है, तुम अच्छी हो, मौका अच्छा है, बिस्तर अच्छा है। समझीं।

लाला, ज़बरदस्ती नहीं

ज़बादस्ती कौन साला करता है। हम तो इसे हालात के बारे में बता रहे हैं। फैसला तो इस को करना है।

हां फैसला तो इसे ही करना है पर एक ही फैसला। और जल्दी। समय नहीं है।

पर इतनी जल्दी भी नहीं - करमा ने कहा।

ठीक है। देख लड़की। आधे घंटे का समय देते हैं। हम जबरदस्ती नहीं किया करते पर दोनों चीजें तुम्हारे हाथ में है। या तो तुम हमारी बाहों में होगी या फिर पुलिस की। और वह तो जोर जबरदस्ती भी कर लेते हैं और कई कई। पर तुम नहीं मानी तो बस तुम्हें यहां बंद कर पुलिस को खबर कर दें गे।

और हां चिल्लाई तो लोग खुद ही आ जाएंगे। हमारा काम भी आसान हो जाए गा।

यहां इस कमीने के साथ दम घुट रहा है। बाहर थोड़ा घूम आयें - करमा ने कहा।

ठीक है, आधे घंटे में आते हैं। सोच लो तुम्हें क्या कबूल है।

हम जबरदस्ती कभी नहीं करते।

उसे धकेल कर बाहर से दरवाज़ा बन्द कर दिया गया।




10.

नीना निढाल सी सोफे पर गिर पड़ी। कहां तो वह चली थी वह ब्लैकमेल से बचने और अब। उस ने अपने अपमान का बदला तो ले लिया कमल से पर अब जो अपमान हो गा, उस का बदला कौन ले गा। अब वह इसी रास्ते की हो कर रह गई है। है भगवान कैसी बुरी साईत में उस ने करमा से सहायता माॅंगने की सोची। पर यह करमा तो सही मालूम देता था। इस का दोस्त लाला ही असल में हरामी है। इसी ने बरगला दिया इसे। पर अब क्या। क्या करमा उस की तरफदारी करे गा। करना होती तो पहले ही न करता। नहीं, यह दोनों की मिली भगत थी। उस की सोच थी कमल को डराने की। उसे वश में करने की। पर क्या करमा ने पहले से ही कमल को मारने की सोची थी। या अचानक ही यह सब हो गया। कया पहले से सोचा हुआ प्लान था। पर अब वह किस को मुॅंह दिखलाये गी। घर कैसे जाये गी। नहीं नहीं, इस ज़िदगी से तो ज़हर खा लेना अच्छा है। पर इस घर में ज़हर मिले गा कहाॅं। शायद कमल नींद की गोलियाॅं रखता है। कितनी हों गी। वह सारी की सारी साथ ही खा ले तो। लम्बी सदा की नींद आ जाये गी।

वह रसोंई में गई पर कोई डिबिया नहीं मिली जिस में गोलियां हों। शायद कमल अपनी जेब में रखता था। क्या वह उस की जेब देखे। एक लाश की जेब, कल वह उस की लाश - लगभग लाश - से खेलता रहा। आज वह ......

वह सिहर उठी। उसे लगा जैसे कि किसी ने दस्तक दी। नहीं, नहीं, उसे धोका हुआ है। आधे घण्टे का कह गये थे। अभी तो सात आठ मिनट ही हुए हैं। वह जल्दी जल्दी नींद की गोलियां देखने लगी। पर चारों ओर शीशे बिखरे थे। उसे बच बच कर जाना हो गा। कमल की - लाश की जेब देखने के लिये।

तभी दस्तक फिर हुई। इस में कोई शक नहीं था। कोई दरवाज़ा खटखटा रहा था। क्या किसी पड़ोसी ने सुन लिया। क्या पुलिस को खबर कर दी गई। पर इस तरह धीरे धीरे क्यों खटखटा रहा है। पुलिस इस तरह धीरे से थोड़े ही खटखटाये गी। क्या करमा, लाला लौट आये पर वह दरवाज़ा क्यों क्षटखटायें गे, उन के पास तो चाबी है। बाहर से तो चाबी ही काम करती है।

क्या दरवाज़ा नहीं खुल सकता। क्या वे अन्दर नहीं आ सकते। ओफ खुदा। वह उन दरिन्दगों से बच गई। वह अन्दर नहीं आ सकते चाहै जो भी वजह हो। वह उस की अस्मत से नहीं खेल सकते। अस्मत - वह तो रही ही नहीं। पर, पर। वह पुलिस को तो खबर कर सकते हैं। ओह भेगवान।

दस्तक बढ़ती जा रही थी। कोई बहुत जल्दी में था। पर यह दस्तक आ कहॉं से रही थी। उसे लगा कि यह उस दरवाज़े से नहीं थी जिस की तरफ वह देख रही थी। तो? उस ने ध्यान दिया तो यह दस्तक एक दूसरी जगह से थी। उधर गई त देखा कि एक दरवाज़ा था। छौटा सा। शायद नौकरानी के आने के लिये अलग द्वार था। उस की चाबी नौकरानी के पास हो गी। मालिक घर पर न भी हो तो वह आ कर सफाई कर सकती थीं। क्या यह दरवाज़ा अन्दर से खुल सकता है। उसे इस दरवाज़े के बारे में कुछ पता नहीं थी। करमा और लाला को भी नहीं हो गा। आखिर वह इस फ्लैट के बारे में जानते थोड़े ही हैं। वह भी कहां जानती है। उस ने अचानक फैसला कर डाला। जो भी इस दरवाज़े के दूसरी तरफ हो, अभी से तो बेहतर नहीं तो अलग तो हो गा ही। इस पार, उस पार। उस ने दरवाज़ा खोल दिया।


11

झटके से अशोक अंदर दाखिल हुआ। उस ने झट से दरवाजा बंद किया। मुंह के ऊपर उंगली रख कर नीना को चुप रहने का इशारा किया। फिर उस ने कमरे की स्थिति का जायजा लिया।

नीना हैरान। यह यहां कैसे। किस ने बताया इस को। क्या यह मेरा पीछा कर रहा था। क्या कल भी इस ने मेरा पीछा किया था। क्या सब उस का चेहरा पढ़ कर नहीं, जानते हुए कहा था, देखी हुई स्थिति बता रहा था। फिर यहां इस वक्त क्यों। कैसे। कल भी बचा सकता था।

अचानक अशोक ने नीना का पर्स पकड़ा। उस में कमल का बटवा, घड़ी, पैन, टाई पिन, निकाल कर डाला। फिर ड्राअर खोल कर देखा। उस का माल बटोरा। कीमती चीजें निकाली और उन्हें पर्स में डाल दिया। अंदर बेडरूम में भी उस ने वैसे ही तलाशी ली। बाकी सब चीज़ें बिखेर दीं। उलट पलट कर दीं।

एक आध मिनट में यह सब हो गया। फिर वह नीना के पास आया। फिर चुप रहने का इशारा किया और कहा। तुम सावधानी से निकल कर नीचे की दो मंजिल पर सीढ़ियों से जाओ। वहां इंतज़ार करो। लिफ्ट ऊपर से आये गी तो उस में आ जाना। मैं इस लिफ्ट से उस में जाऊंगा। जल्दी नहीं। जैसे दो दोस्त जा रहे हो जल्दी। दो मंजिल, कोई देखे ना देखें पर मुस्कुराना नहीं।

नीना को लगभग धक्का देकर उस ने बाहर कर दिया। नीना सीढ़ी उतर गई। दो मंजिल। थोड़ी देर बाद लिफ्ट आई। उस में अशोक था। नीना भी उस में दाखिल हो गई। अशोक ने उस के हाथ में हाथ डाल लिया। नीना सकुचाई लेकिन हाथ ना खींच पाई। अशोक बिल्कुल ऐसे लग रहा था जैसे पुराना प्रेमी हो। बातें करता हुआ निकल गया। किसी ने देखा नहीं। देखा भी तो ध्यान नहीं दिया।

टैक्सी पकड़ कर वह बाजार में आ गए। अशोक ने कहा मेरे पास ड्रामे की दो टिकट हैं। अभी इंटरवल होने वाला है। उसी में चलते हैं।

और देखो, तुम ने कभी तुम ने कभी उस फ्लैट को नहीं देखा। उस के बारे में किसी को नहीं बताया। यह सब बातें कभी हुई ही नहीं। और हां, घर के आस पास कोई फोन है क्या?

क्यों?

है क्या?

हां, पास में जोशी साहब के यहां है

उन्हें फोन करो कि घर पर इतलाह कर दें कि तुम किसी सहेली के साथ - नाम ले लेना- जो यहीं पास में रहती हो - के साथ ड्रामा देख रही हो । देख रही हो, देखो गी नहीं।

पर इस की क्या जरूरत है। मैं कह कर आई हूं कि देर से आऊंगी

यह जरूरी है। बाद में समझा दूं गा। अभी चुप चाप मेरी बात मानती जाओ

हो गया फोन।

एक बार फिर उस ने कहा कि जैसे मैं कहूं वैसे ही करते जाना, बोलना नहीं

थियेटर में इंटरवल समाप्त होने वाला था। कुछ लोग अन्दर जा रहे थे। अशोक तथा नीना भी अंदर दाखिल हुए। नीना ने देखा कि उन के पास एफ रो की टिकटें हैं पर वह ई में जा रहे हैं। पर उसे चुप रहने को कहा गया था। थोड़ी देर में ई लाइन वाले व्यक्ति आ गए। थोड़ा झगड़ा हुआ। फिर उस ने उशरर को बुलाया। टिकटें देखकर बात सुलझा दी गई।

नीना कुछ कुछ समझ रही थी। यह अशोक का थियेटर में हाजिरी लगाने का तरीका था। क्या यह सब इंतजाम पहले से ही था, टिकटें उस के पास थी। पर वह थिएटर में ना होकर कहीं और था। उस के पीछे जासूसी करता हुआ। उस की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए या फिर उस का अंगरक्षक बन कर, गार्डियन एंजेल बन कर।

ड्रामा समाप्त हुआ। लोकल से वह अपने यानी नीना के घर की ओर चले। खिड़की के पास बैठा था अशोक। उस ने नीना का पर्स अपने हाथ में ले लिया । एक एक कर पर्स की चीजें बाहर जाने लगी घंने अंधेरे में। कहां गिरी हों गी वह चीजें, किन को मिलेगी, घड़ी चकनाचूर हो गई हो गी या किसी के हाथ में सजी होगी और पैन और टाइपिंग पिन और .........।

नीना का मौहल्ला आ गया था। गली के बल्ब टिमटिमा रहे थे। क्या करमा अपनी रोजमर्रा की जगह पर होगा। नहीं, वह जगह तो खाली थी। क्या कल वह उस जगह पर होगा। वह क्या करे गी। क्या कहे गा उस से, क्या कुछ कहे गा। लाला उसे फिर मिले गा क्या। लाला और करमा वापस आए हों गे फिर वह अंदर गए हों गे पर शिकार तो जा चुका होगा। क्या इस क्या उन्हों ने पुलिस को बताया होगा। क्या वह पुलिस की हिरासत में होंगे। नहीं, वह अपने विरुद्ध रिपोर्ट कैसे कर सकते हैं। कितने प्रश्न थे, इतने ढेर सारे कितने थे। और उन का उत्तर किस के पास था। समय के पास, या उस के पास भी नहीं। अशोक क्या है। अब तो हालात ने नया मोड़ लिया है। किस लिए। करमा, लाला उसे देख लेते तो। बाहर तो वे झ़गड़ा नहीं करते। वह तो अशोक को जानते भी नहीं हैं। उसे उसी बिल्ड्रिग का कोई आदमी मानते। नहीं, अशोक को कभी कोई खतरा नहीं था। पर उसे। क्या उस की कोई निशानी छूट गई जिस के सहारे पुलिस उस तक पहुंच जाये गी। उफ, भूल जाओं यह सब कुछ, अशोक ने कहा था। भूल जाओ कोई फ्लैट है। भूल जाओ कोई घटना घटी थी। पर क्या इन को भुलाया जा सकता है। क्या उसे भूलने दिया जाएगा। अशोक, करमा, लाला, या फिर पुलिस, - तुझे भूलने दें गे क्या।

वह घर के सामने खड़ी थी

विश यू गुड लक - अशोक ने कहा था। फिर अचानक उस के होठों पर अपने होंठ रख दिए थे। उस ने अपने को परे नहीं हटाया पर जरा सा सरकी।

गुड नाइट

एक के चंगुल से बचकर दो के चुंगल में फंसी और फिर दो से बचकर दोबारा एक के चुंगल में फंस गई क्या? बेसाख्ता पूछ बैठी नीना।

जवाब में अशोक में कॉल बेल पर उंगली रखते हुए कहा गुड नाइट और तेजी से अंधेरे में गुम हो गया

आ गई तुम - उस ने मां को कहते सुना



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