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हिन्दुत्व है क्या

हिन्दुत्व है क्या


धर्म निर्पेक्षता की बात हिन्दु धर्म की संरचना का अभिन्न भाग है। यह सही है कि पूजा की कई विधियाॅं हैं, कई रंग बिरंगे मंदिर विभिन्न देवी देवताओं के पूजन के लिये बनाये गये हैं। और इस पूजा विधि के लिये कई ब्राह्मण पुजारी तथा प्रवाचक मिल जायें गे जिन के अपने अपने सम्प्रदाय हों गे परन्तु इस के साथ ही हिन्दु संस्कृति के आरम्भ से ही एक ऐसी विचार धारा भी सदैव रही है जिसे किसी भी दृष्टि से संकीर्ण नहीं कहा जा सकता है। यह भावना कई बार इतनी प्रबल हो उठती है कि सभी पूजा विधियाॅं इन के सामने फीकी पड़ जाती हैं। यह इस कारण है कि वैदिक काल से ही अद्वैत का विचार सर्वोपरि रहा है। इस दृष्टि से हिन्दु मत को सही अर्थों में धर्मनिर्पेक्ष धर्म कहा जा सकता है।


इस विचार को और स्पष्ट करना उचित हो गा। हिन्दु धर्म ही एक मात्र धर्म है जो हठघर्मी नहीं है। क्या कोई एक वस्तु है जो केवल वही पूजा के योग्य है तथा अन्य सब से भिन्न है। क्या कोई ऐसी वस्तु है जो अन्य सब से अधिक मूल्यवान है, जिसे पवित्र माना जाता है। क्या कोई ऐसा आदर्श है जिस को अपरिवर्तनशील माना जाता है। इन सब प्रश्नों का उत्तर नहीं में है। यह मानना पड़े गा कि हिन्दुधर्म में सभी वस्तुओं को पवित्र माना जाता है. जीवन का हर पहलू चाहे वे व्यक्तिगत हो या सामाजिक, को पवित्र माना जाता है और इसी में इस धर्म की विशेषता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने कहा था, ‘‘पूरा संसार ही एक प्रसन्नता का बगीचा है. सभी वृक्षों में इच्छाओं को पूर्ण करने की शक्ति है, सभी नदियों का पानी गंगा के पानी के समान पवित्र है, शब्द चाहे वह धार्मिक हो अथवा अन्यथा, पूज्य हैं, सारा संसार वाराणसी की तरह तीर्थ स्थान है, सभी एक वास्तविकता पर आधारित है क्योंकि जिस ने ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लिया उसे अद्वैत वेदान्त पर विश्वास हो जाए गा’’।


इस धर्म में देवी देवताओं को दूसरे पायदान पर लिया जाता है. बिना असीम की कल्पना के पूजा अधूरी मानी जाती है। आम तौर पर इन देवी देवताओं की पूजा के लिये कर्मकाण्ड अपनाया जाता है। कर्मकाण्ड चाहे जितना भी पुराना हो चुका हो, अभी भी जीवन में प्रभाव रखता है और यह प्रभाव ज्ञानकाण्ड से अधिक है। जन्म, मृत्यु अथवा शादी के समय कर्मकाण्ड की आवश्यकता रहती है। इसी के साथ-साथ भक्ति का अपना महत्व है। हिंदू धर्म का परिचय बिना भक्ति की कल्पना किये नहीं हो सकता है।


हिंदू धर्म अपने सतत सुधार के लिए जाना जाता है। नई जानकारी को, नई मान्यताओं को शामिल करना इस की खूबी है. उदारता इस का विशेष गुण है। श्री गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है - जो लोग दूसरे देवताओं को पूजते हैं वह भी मुझे ही पूजते होते हैं पर उन की पूजा विधि मुझे न पहचान पाने के कारण अधूरी है। देवताओं की पूजा विधि विपरीत नहीं मानी जाती पर उस का स्थान गौण रहता है। हिंदू धर्म में ब्रह्म को ही अंतिम सत् समझना ही वास्तविक ज्ञान है।


यह सही है कि समय समय पर कई प्रकार के अंधविश्वास हिन्दु धर्म में आते हैं किन्तु इस के साथ थी सुधारक भी आते रहे हैं जैसे कभी कबीर अथवा तुलसी भक्ति पर जोर देते हैं और सही शुद्धता का पाठ पढ़ाते है।ं कभी आर्यसमाज मूर्ति पूजा तथा जानवरों की बलि के विरोध में आते हैं। इन सब की अपेक्षा है कि व्यक्ति विशेष को अंधविश्वासों से दूर रखा जाये। धर्म में पूजा विधि, ध्यान प्रक्रिया, इस के विशेष गुण हैं। आपसी मतभेदों में हिंसात्मक होने का कोई प्रयोजन नहीं रहता है. राम कृष्ण जी का आदर्श वाक्य था कि ‘‘सब मत. एक समान है. सत्य एक ही रहता है जिस को विभिन्न मार्गों से पाया जा सकता है’’। वेदों में भी कहा गया है ‘‘सत्य एक है, विद्वान लोग उसे अलग अलग दृष्टि से देखते हैं’’।


हिंदू धर्म की यह सहिष्णुता तथा समन्वय की कल्पना न केवल आपसी सम्प्रदायों की बात है बल्कि अन्य धर्मों के प्रति भी उस का यही विचार है। इस बात को हिंदू धर्म के सर्वाधिक कठोर आलोचक भी स्वीकार करें गे। वास्तव में यह अन्य धर्मों के लिए भी संदेश है कि वे हिंदू धर्म के बारे में संपूर्ण जानकारी ग्रहण कर के ही इस का आंकलन करें। वह इस सि़द्धॉंत को अपना लें तो हिन्दु धर्म से उन की दूरी समाप्त हो जाये गी।


आजकल सार्वजनिक विद्या प्रसार का समय है। संचार माध्यम काफी विस्तृत तथा पूर्ण जानकारी देने में समर्थ हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इस सत्य को प्रचारित किया जाये ताकि अन्य धर्मावलम्बी भी इसे ग्रहण करें। भगवत गीता में तथा अन्य ग्रन्थों में जो प्रेम व भक्ति का सन्देश दिया गया है वह सब तक पहुॅंचना चाहिये। इस से संवाद स्थापित हो गा तथा अन्य धर्म भी इस के पास आयें गे।


इस के साथ ही सतत पुनरावलोकन का भी अपना महत्व है। चन्द्रशेखरानन्द स्वामी, शंकराचार्य, कामी कोठी पीठ ने कहा था कि ‘‘हमें पहले किसी की आलोचना तथा उस की बुराइ्रयाॅं देखने की आदत का त्याग करना हो गा। धर्म का प्रयोजन ही मनुष्य का अध्यात्मिक विचारों में ऊॅंची धरातल पर ले जाना है। इस के लिये काम, क्रोध तथा द्वेष को समाप्त करना हो गा। सभी धर्मों के अच्छे बिन्दु ग्रहण करने में हिचकचाहट नहीं होना चाहिये। ’’


यह ध्यान रखने योग्य है कि इस प्रकार के विचार इन महानुभावों को अपने धर्म के प्रति शंकालू नहीं बनाते हैं। वे अपने धर्म के प्रति गम्भीर ही रहते हैं। भगवान कृष्ण भी अन्त में कहते हैं - सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरएां व्रज। पर इसे सही संदर्भ में ही देखना चाहिये। मुख्य बात यह है कि कहीं यह नहीं कहा जाता कि अन्य सभी धर्म गलत हैं तथा ईश्वर के कोप के पात्र हैं। वास्तव में ईश्वर के कोप का हिन्दु धर्म में ज़िकर ही नहीं है। वह सदा दीनबन्धु है, दया निधान हैं। हमारे अपने कर्मों का फल ही हमें मिलता है। हम स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हैं। श्ह मौलिक बात है, आदर्श वाक्य है।


किसी भी धर्म में एक महत्वपूर्ण बात कमज़ोर के प्रति उस का रवैया है। हिन्दु धर्म में भगवान को दीनबन्धु कहा गया है अर्थात वह दीन हीन व्यक्तियों के साथ है। दया, करुणा इस धर्म के अभिन्न अंग हैं। ‘दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान’ इसी तथ्य को इ्रगित करता है।


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