• kewal sethi

हम दो प्रेमी दुनिया छोड़ चले

हम दो प्रेमी दुनिया छोड़ चले

  (यह कहानी मैं ने 1984 में लिखी थी. इस पर तिथि डाली गई है 19. 8. 84।  जैसी है, वैसी पेश कर रहा हूं। इस में उस समय कोई शीर्षक नहीं दिया था। यह शीर्षक आज दे रहा हूं।)


“ वह आ गये रोहिणी के चाहने वाले”  और फिर हंसी की खनखनाहट। बस इतनी सी आवाज उस के कानों में पड़ी। राजकीय बालिका पाठशाला सुल्तानगंज के सामने वह खड़ा था। रोहिणी उस की प्रेमिका थी और वह इस पाठशाला में अध्यापिका के पद पर थी। उम्र बीस बाईस साल, लंबी, पतली, साँवली, आकर्षक।  वह दफ्तर से लौटते समय वहां से गुजरा करता था और वह दोनों साथ साथ घर जाया करते थे। उन का घर एक ही था पर यह कहना शायद भ्रम में डाल दे, इस लिये कहना हो गा कि उन का मकान एक ही था। वह अपने माता-पिता के साथ रहती थी। उसी मकान के तीन अलग-अलग कमरों में तीन किरायेदार भी रहते थे। और एक में वह रहता था। उस का और रोहिणी का इश्क लगभग एक साल से चल रहा था। और यह केवल अध्यात्मिक प्रेम तक ही सीमित न रह गया था। इस बात से रोहिणी के घर वाले भी परिचित थे।  

 वह अक्सर शाला के सामने प्रतीक्षा करता था। कभी कभी रोहिणी की छुट्टी पहले हो जाती थी तो वह रास्ता देखा करती थी। पर आम तौर पर वह ही पहले पहुंचता था और इस मौके पर एकाध वाक्य उसे सुनने को मिल ही जाता था। वह उन्हें सुन कर ठिठकता नहीं था। शायद कभी ठिठकता हो पर अब नहीं। दुनिया वाले अपनी कहते रहते थे और वह अपनी करता रहता था। रोहिणी भी उस का साथ देती थी। स्कूल समाप्त होने पर वह दोनों हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चल देते थे। रोहिणी ने वे व्यंग्य वाक्य सुने थे, पर उस ने कभी परवाह नहीं की थी। जब दिल मिल गये तो जमाने से डरना क्या। यह दकियानूसी विचार थे। छुप छुप कर मिलने का कोई मतलब न था। एक स्वतन्त्र जीवन को बिताने वाले क्यों किसी का गुलाम बनें। उन्हों ने कोई पाप तो नहीं किया था। 

 राेिहणी एक मध्यम श्रेणी के परिवार की दूसरी बिटिया थी। बड़ी का विवाह हो चुका था। तीन छोटे बहन भाई थे। छोटी सी दुकानदारी थी। घर में मदद करने के लिये रोहिणी की नौकरी का आसरा था। उस के विवाह की चिंता कभी थी पर जहेज़ का भूत उन्हें सताता रहता था। पहले पहले उन्हें दिलवीर का साथ होना बुरा लगा था। फिर धीरे-धीरे इस की आदत पड़ गई थी। राेिहणी ने उन का कहा सुना अनसुना कर दिया था। घर वालों ने भी अपने को दिलासा दे दिया था कि जब वे खुले में साथ रहते हैं तो किसी गड़बड़ का अंदेशा न था। . 

 फिर उन्हें यह सूझा कि क्यों न रोहिणी की शादी ही कर दी जाये। प्रेम विवाह तो आजकल आम हो गया है। इस से पहले कि दोनों साथ-साथ भाग जायें,  स्वयं ही उन्हें बंधन में बांध दिया जाये। प्रेम विवाह में दहेज का चक्कर भी नहीं होता है। लेकिन न तो रोहिणी और न ही दिलवीर इस के लिये राजी हुये। रोहिणी का कहना था ‘विवाह, विवाह, विवाह.? क्या यह जरूरी है कि विवाह किया जाये। हम ने अपना फैसला कर लिया है। हमें किसी के अनुमोदन की जरूरत नहीं’। दिलवीर को उन्हों ने कुरेदा तो वहाँ  भी वैसा ही जवाब मिला. “बेकार के रिवाज पूरे करने में पैसा जाया करने से क्या फायदा’।  मन मसोस कर रह गये। फिर भी अपनी रोहिणी पर उन्हें एतबार था. 

 लेकिन मौहल्ले वाले। उन के लिये तो यह नया शुगल था। शहर का एक पिछड़ा सा मौहल्ला, जहाँ छोटी छोटी दुकानदारी वाले,  छोटी छोटी नौकरी पेशा रहते थे। वहां पर समय काटने का तरीका ही था गपबाज़ी। गपबाज़ी का एक बड़ा हिस्सा छींटाकशी ही होती है। छोटा सा मंदिर था इस मौहल्ले में जिस की पूजा पाठ से आय सीमित थी पर उतनी नहीं जितनी कि पुजारी की धार्मिक प्रवृत्ति। वही शुरू करता, ‘राम राम,  घोर कलयुग आ गया है यह तो। लड़का लड़की साथ साथ घूमें,  अरे बेशर्मी की हद हो गईर्।. अरे, शास्त्रों में लिखा है कि 14वें वर्ष में लड़की के हाथ पीले कर देना चाहिये’।’. 

‘ जमाना बदल गया है पंडित जी’  रामलाल की बड़ी बहू कहे। ‘अब तो 18 की उम्र से पहले शादी करने पर जेल जाना पड़े हैं।’ 

‘जेल जाना पड़े तो जाना पड़े। कन्या दान कर ले तो आनंद भोगें। बिना कन्यादान के घोर नर्क मिले हैं’।

‘कन्यादान तो हो चुका पंडित जी.’  अवतारी लाल - मौहल्ले के बेकार बैठे नवयुवक नेता - कहें, ‘बस तुम्हारी दक्षिणा रह गई। सो जा कर मांग लो’। 

 यही अवतारी लाल जब दूसरे लड़कों के साथ बैठते तो बात दूसरे ढंग से चलती। 

‘सुसरी, पता नहीं क्या देखा इस बाहर के छोकरे में।  अरे हमारे साथ होती तो स्वर्ग दिखला देते’. 

‘साले की पिटाई करनी पड़ेगी। हमारी छोकरी पर ही हाथ डाल दिया’,  एक और पहलवान नुमा लड़का कहता।  

 और कहीं दोनों साथ दिख जाते तो कुछ ना कुछ तो उन्हें सुनना ही पड़ता। हालोंकि अब तो बात इतनी पुरानी हो गई थी कि मौहल्ले के ज्यादातर लोग तो इसे लगभग सामान्य ही मानते थे।  

 पर फिर भी बुज़र्ग लोग कभी-कभी तो रोहिणी के बाप से यह किस्सा छोड़ ही देते. ‘पराया धन है,  राम किशन जी। यू नहीं चले गा। कुछ लड़के के घर बार का पता लगाओ। वहां जाओ, हाथ पैर जोड़ो। कुछ पुण्य कमाओ,  कुछ बदनामी से बचो’. 

‘हाँ,  हाथ पर हाथ धरने से कुछ नहीं मिले गा। लड़की का पैर भारी हो गया तो और लाले पड़ें गे’. 

 पर रोहिणी पर किसी का बस नहीं। वह सुनती नहीं, समझती नहीं। पता नहीं उस को यह नये ज़माने की हवा कहां से लग गई। इस तरह बिना विवाह के लोग युरोप में रहते हैं यहाँ तो नहीं। हमारी अपनी संस्कृति है,  अपने संस्कार हैं,  बंधन है,  मान्यतायें हैं, रिवाज हैं. मौहल्ला है,  इज्जत है। आखिर इन से कैसे छुटकारा पा सकते हैं. एकाध बार थोड़ा रीति रिवाज कर लें। मंदिर में ही हार बदल लें। फिर चाहे जो करें। 

 मंदिर की बात भी न रोहिणी को पसंद है न दिलवीर को। वह इसे ढकोसला मानते हैं। कहां से इतना आगे बढ़ गये वह,  न घर का वातावरण ऐसा, न बाहर का माहौल। 

 लेकिन एक दिन उन्हों ने दिलबीर को मना ही लिया। दफतर के ताने सुन कर,  रास्ते के व्यंग बाण सुन कर, मौहल्ले की छींटाकशी सुन कर, या  रोहिणी के घर वालों के उलाहनें सुन कर।  उस ने फैसला किया. ‘ ऐसा करो कि आप कुछ लोगों को बुला कर चाय पानी करा दो। समझ लो कि यही हमारा विवाह हो गया। कोई रस्मो रिवाज नहीं। किसी पंडित की जरूरत नहीं, कोई हार नहीं चाहिये। सिर्फ चाय पानी। रोहिणी ने भी हामी भर दी। जग ज़ाहिर बात थी, कोई लुक्का छुपी नहीं। चाय पानी तो होता ही रहता है। अपनी बात भी रह जाये गी। घर वाले भी खुश।  

 चाय पानी हुआ। गठा हुआ मौहल्ला था। दस को बुलाया, दस वैसे ही चले आये। और परिवार नियोजन का जमाना होते हुये भी बीस पच्चीस बच्चे तो आ ही गये। चाय पानी के स्थान पर हंगामा हो गया। छीना झपटी हो कर चीजें बटने लगी। मौहल्ले में इस तरह की पार्टी का रिवाज ना था। एक नई बात हो गई। शौक में ही मौहल्ला उमड़ पड़ा। इधर किसी को कोई याद आई और एक कैमरे वाला नमूदार हो गया। कब बन गये दूल्हा दुल्हन। इसी से तो बच रहे थे पर यह भंवर में कैसे आ गये। खींच खाँच कर उन को लाया गया। कैमरे वाला सामने तैयार। साथ में कौन खड़ा हो।  कैमरे का शौक। जो घर वाले थे, वे तो आये। फिर कुछ और पास पड़ोस के आदमी।  जब तक कैमरे वाला कुछ फोकस करे तब तक कुछ बच्चे भी। यह हालत हुई कि दिलबीर और रोहिणी फोकस के बाहर। 

और मौके का फायदा उठा कर वह दोनों घर से गायब हो गये। 

 मोहल्ले की थोड़ी दूर पर आजाद मार्केट थी। शाम के झुटपुटे का समय था। अधिकतर दुकानें बंद थीं। शायद. इतवार था, इस कारण। इक्का-दुक्का दुकानें खुली थी पर बाजार लगभग सुनसान था। कोई कोई मुसाफिर आ जा रहे थे और उन में दिलवीर और रोहिणी भी थे।  

‘ मैंने कहा न था, यह सब शुरू करने का मतलब फिर वही दुकियानूसी है’. 

‘ यह तो अपेक्षित था। पुराना मोहल्ला है। कौन किस को नहीं जानता। मैं ही नया हूं तो सब देखने आयें गे.ही’

‘ अभी दो साल में भी नये ही हो’. 

‘ इस देश में हजारों साल पुरानी सभ्यता में हम नये ही रहें गे’.

‘ न जाने क्यों लोग बाँधना चाहते हैं। क्येां स्वतन्त्रता नहीं है।  क्या है यह सब। ‘

 ‘जो होना था सो हो गया’. 

 ‘पर क्यों, पर क्यों। हम कठपुतली हो जैसे। यहाँ भी देखों, लोग हमारी तरफ ही देख रहे हैं।  मेरा तो दम घुट रहा है। यहां हम अपनी मनमानी नहीं कर सकते।’

 कुछ देर बाद वे एक सुनसान सी जगह पर थे। सूरज डूबने को था। अंधेरा फैल रहा था। कोयले के बड़े बड़े ढेर चारों तरफ बिखरे हुये थे।। हज़ारों साल के यहां कोयला - कुदरत की देन - पड़ा हुआ था। पचास एक साल से इसे खोदा जा रहा था। कोई व्यक्ति उस समय नहीं था। शायद घर जा चुके थे सब। काले-काले ऊंचे ऊॅंचे टीले शाम के साये में और भी काले होते जा रहे थे,  कुछ दूर से क्रशर और सक्रीनर के चलने की आवाज आ रही थी। कोयले की चूरी और मोटा कोयला अलग हो रहा था। उस सुनसान माहौल में अजीब सी सुरसरी पैदा कर रही थी यह आवाज।

 रोहिणी और दिलवीर भी वहां आये थे बाजार की निगाहों से बचने के लिये पर उन को कोई संतोष नहीं था विशेषकर रोहिणी को।

 सिहर सी उठी हो ‘क्यों हमें भागना पड़ रहा है? यह हमारा पीछा क्यों कर रहे हैं?ं’. 

‘ हां, मैं भी यही सोच रहा हूं। अगर हम अपने मन की करना चाहते हैं। किसी दूसरे के दुख दिये बगैर तो हम क्यों नहीं कर सकते। हम क्यों नई जगह ढूंढना पड़ रही है.

‘ आओ अब लौट चलें. शायद सब जा चुके हों। फिर से झूझने के लिये। तुम्हारा वह ख्याल ठीक नहीं निकला। एक बार हो जाने दो उन की बात। क्या वाकई की उन की बात हो जाने के बाद अब वापस लौट जायें गे बीती हुई बातों में। बीते हुये समय मे’ं.

 और घर लौटने पर उन्हें पता चला कि वह बीते समय में नहीं लौट पायें गे। दिलवीर के कमरे में एक चारपाई और आ गई थी. रोहिणी का कुछ सामान भी आ गया था। पहले जैसा उस का कमरा न था। यह सही है कि उस के सामान को छुआ नहीं गया था। सिर्फ चारपाई को धकेल कर जगह बना ली गई थी. ,  उस की किताबें, उस की चीज़ें,  उसी तरह बिखरी हुई थी - बेतरतीब, बेवजह। 

 गुस्से से भर गई थी रोहिणी। तेज़ी से वह अंदर चल दी। दिलवीर अपने कमरे के सामने खड़ा रह गया। फिर भारी मन से अंदर दाखिल हुआ और एक कुर्सी पर पड़ गया, मुरझाया सा। रोहिणी की बात सही थी। वे वापस नहीं लौट सकते। बात हो कर समाप्त नहीं होती। बात से नई बात बनती है। समय आगे चलता है, पीछे नहीं,

 अंदर से आवाजें आ रही थी गुस्से की। समझाने की, करुणा भरी, भय भरी  फिर चीज़ों के उठा पटक की। रोहिणी अपने दिल का गुबार निकाल रही थी और फिर, और फिर .......

 तेजी से रोहिणी कमरे में दाखिल हुई। उस ने दरवाजा बंद कर दिया और चारपाई पर पड़ गई। हल्के हल्के सुबकने की आवाज आ रही थी। दिलवीर क्या करें। क्या वह उसे जा कर समझाये. पर क्या? क्यों?  क्या उसे दिलासा दे, उसे पुचकारे। क्या हासिल। वह अपनी ज़िदगी जी रहे थे पर अब। पर अब उन्हें एक दूसरे को दिलासा देना हो गा। कितनी अजीब बात, कितनी पुरानी बात’.

 दिलवीर की कुछ समझ में नहीं आया। अंधेरा छा गया था। उस ने लालटेन जलाई। धीरे-धीरे अपनी किताबें समेटना शुरू की। उन्हें कायदे से रखना शुरू किया। कपड़े इकट्ठे किये। उन्हें तय भी किये। एक यंत्र मानव की तरह। एक निशब्द खिलौने की तरह। सुबकने की आवाज बंद हो गई थी. रोहिणी निष्छल पड़ी थी। दिलवीर का कमरा सुगड़ हो चुका था। अब. आगे?

 दिलवीर चारपाई के सरहाने बैठ गया। हल्के हल्के रोहिणी के सर पर हाथ फेरने लगा. रोहिणी थोड़ा पास खिसक आई। दिलवीर की गोद में सर रख दिया.. 

 ऐसा लगा उन को, कोई बाहर खड़ा है। दरवाजे पर कोई सुन रहा है. यह क्या मुसीबत थी। 

 फिर उस ने होले से रोहिणी के कान में कुछ कहा। दोनों उठे। चारपाईयों को धक्का दे कर एक तरफ लगा दिया. और कुछ खाली जगह फर्श पर बनाई। फिर दिलवीर का बिस्तर उठा कर नीचे फर्श पर लगा दिया. 

 दिलबीर के दिल में ख्याल उठा। यह हमारी सुहाग रात है। सुहाग रात,  दूल्हा, दुल्हन, विवाह। वे तो रीति रिवाज से बचने चले थे, फिर यह दकियानूसी विचार। क्या उन से कोई छुटकारा नहीं? 

रोहिणी ने लालटेन की लौ को मद्धम कर दिया। उस की रोशनी को समाप्त कर दिया। 

एक नये युग की शुरुआत के लिये। 


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