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समाज से परामर्श के कुछ उदाहरण

समाज से परामर्श के कुछ उदाहरण


यहाँ पर यह उचित हो गा कि हम कुछ देशों के सम्बन्ध में मतदाताओं की राय जाने के लिये किये गये प्रयोगों के बारे में अध्ययन करें। इन अध्ययन में कुछ लोगों को रैण्डम तरीके से चुना गया था जिन में विभिन्न वर्गों के अनुपात को ध्यान में रखा गया था। (इन अध्ययनों के बारे में सामग्री जेम्स फिशकिन की पस्तक ‘डैमोक्रेसी वैन पीपल आर थिंक्रिग’ - प्रकाशक आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रैस - से ली गई है)।

जून 2011 में कैलिफोर्निया में मतदाताओं के प्रतिनिधियों की कार्यशाला आयोजित की गई जिसे ‘‘कैलिफोर्निया, आगे क्या’’ नाम दिया गया। इस सम्मेलन में 39 ऐसे सुधार प्रस्तावों पर विचार किया जाना था जो कई अशासकीय संस्थाओं ने समय-समय पर प्रस्तावित किये थे। इस सम्मेलन का उद्देश्य मतदाताओं के समक्ष अथवा विधानसभा के समक्ष इन प्रस्तावों के बारे में जनता का विचार दर्ज करवाना था। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए फोन द्वारा रैण्डम तौर पर मतदाताओं से सम्पर्क किया गया। कुल 439 मतदाताओं ने इस में भाग लेना स्वीकार किया परन्तु अंत में 412 व्यक्ति ही टोरंट्ज में पहुंच सके जहां पर यह सम्मेलन होना था। इस के अतिरिक्त 300 मतदाता फोन द्वारा ऐसे भी चुनें गये जिन्हें इन प्रस्तावों के बारे में समस्त जानकारी भेजी गई थी और उन के विचार फोन पर पता लगाये गये। इस के लिए इन मतदाताओं को 10 बार तक फोन किए गये। इन सभी मतदाताओं मैं चयन में यह ध्यान रखा गया कि वे जनता के सभी पक्षों का प्रतिनिधित्व करें।

इन प्रतिनिधिगण को छोटे-छोटे समूहों में बांटा गया जिस में विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के बारे में बताया गया। यह प्रावधान किया गया कि सम्मेलन के समय कोई नये प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किये जायें गे। जो पूर्व से प्रस्तावित सुधार थे, उन्हीं पर विचार किया जाना था। ऐसा इस कारण था कि मौके पर किये गये प्रस्ताव के बारे में प्रतिनिधिगण को विस्तृत जानकारी नहीं दी जा सकती थी। जो लोग चर्चा का मार्ग दर्शन कर रहे थे उन को यह समझाईश दी गर्द थी कि वे अपने विचार व्यक्त नहीं करें गे। इस सम्मेलन में सभी प्रतिनिधिगण को अपने विचार व्यक्त करने का समय मिल रहा था। प्रस्तावित विषयों के बारे में सामग्री सभी प्रतिनिधियों को पूर्व में भेजी गई थी ताकि उन्हें प्रस्तावित विषयों के बारे में पूरी जानकारी प्रदान की जा सकें। .

प्रतिभागियों की जानकारी का आंकलन करने के लिये चर्चा से पूर्व एवं चर्चा के बाद में आठ आठ प्रश्न पूछे गये थे। यह प्रतीत हुआ कि चर्चा के कारण जानकारी में 18 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई। सभी 39 सुझावों को 4 विषयों में बांटा गया था जोकि चार मुख्य स्थिति के बारे में थे एक - नई पहल वाले प्रस्ताव, 2- विधानसभा में सुधार, 3- स्थानीय सम्बन्धों में सुधार, एवं 4- कराधान तथा व्यय। इन सब सुझाव के लिये न केवल पूरा विवरण दिया गया था बल्कि पक्ष एवं विपक्ष में दिये गये तर्कों को तालिका के रूप में दर्शाया गया था। यह पाया गया कि चर्चा के उपरांत 39 में से 21 प्रस्तावों में जो विचार व्यक्त किये गये थे, उन में समर्थन में काफी परिवर्तन चर्चा के दौरान देखने को मिला।

यह स्पष्ट है कि 2 दिन के विचार विमर्श में बहुत अधिक नई बातें सामने नहीं आ सकती परन्तु फिर भी जो बातें सामने आये वह काफी विचारपरक थी। एक प्रस्ताव था कि राज्य की विधान सभा की अवधि 2 वर्ष से बढ़ा कर 4 वर्ष कर दी जाये तथा सीनेट की अवधि 4 वर्ष से बढ़ा कर 6 वर्ष कर दी जाये। जिन लोगों ने पक्ष में कहा उनका मत था कि 2 वर्ष की अवधि होने पर सदस्य बनने वाला व्यक्ति आरम्भ से यह सोचने लगता है कि वह अगली बार कैसे चुना जाये गा। इस कारण उसे उन व्यक्तियों का, जो उसे आर्थिक सहायता देते हैं, कल्याण देखना होता है। अवघि बढ़ने पर यह भावना थोड़ी कम हो जायेगी। एक प्रस्ताव था कि विधानसभा का कार्य अल्पकालिक हों और विधायकों को वेतन इत्यादि भी उसी दृष्टि से दिया जाये। इस के पक्ष में भी काफी समर्थन आया था। सम्मेलन के पूर्व तथा सम्मेलन के अन्त में प्रस्तावों पर उन की प्रतिक्रिया ली गई। आपसी चर्चा के कारण उन के ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई तथा उन के विचारों में परिवर्तन आया। उदाहरणतया आगमन के समय अल्पकालिक विधान सभा के पक्ष में 45 प्रतिशत समर्थक थे। चर्चा के उपरांत इन की संख्या कम हो कर 27 प्रतिशत रह गई। पक्ष में यह तर्क दिये गये कि अल्पकालिक विधायक अपने क्षेत्र को ओर अधिक ध्यान से देखेंगे। दूसरा तर्क यह था कि अल्पकालिक होने के कारण वह केवल राजनीति को ही अपना पूर्णकालिक कार्य नहीं मानें गे। विपक्ष में तर्क यह था कि अल्पकालिक विधायक भ्रष्टाचार के प्रति अधिक आकर्षित होंगे। दूसरा तर्क यह था कि अल्पकालिक विधायकों को नीति संबंधी विषयों का ज्ञान कम रहे गा क्योंकि उन का ध्यान बटा रहे गा और वह अपने व्यवसाय के बारे में भी सोचें गे। यह स्पष्ट है कि विचार विमर्श से मतदाताओं की राय पर प्रभाव पड़ता है। यही ऐसे सम्मेलनों की उपयोगिता है अर्थात पूर्ण जानकारी के आधार पर मत व्यक्त किया जाता है।

क्या इस सम्मेलन के निष्कर्ष का कोई प्रभाव पड़ा। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। देखा जाये तो दो क्षेत्रों में इस का प्रभाव हुआ था। सम्मेलन का एक प्रस्ताव था कि किसी भी विधान का अनुमोदन करने से पूर्व जनता की राय ली जाये। इसी के तारतमय में विधान सभा द्वारा यह अधिनियम पारित किया गया कि प्रस्तावित नियमों को इंटरनैट पर प्रकाशित किया जाये गा, उस पर टिप्पणी के लिये अधिक समय दिया जाये गा, सत्ता पक्ष तथा विपक्ष, दोनों के तर्क प्रस्तुत किये जायें गे जो कि इंटरनैट पर उपलब्ध रहें गे। इस प्रकार इन विधेयकों पर टिप्पणी करने वाले जानकारी सहित अपनी राय व्यक्त कर सकें गे।

संयुक्त राज्य अमरीका के इस उदाहरण के बाद हम चलें एक अन्य देश, एक अन्य सभ्यता की ओर।

एशिया के मध्य मंगोलिया नाम के देश की राजधानी उलनबतोर है जिस में देश के आधे से अधिक लोग निवास करते हैं। इस नगर में कौन से परियोजनायें हाथ में ली जायें, इस के बारे में चर्चा करने के लिये जनता की राय ली गई। कुल 14 परियोजनायें थी जिन के बारे में विचार किया जाना था। वर्ष 2015 में नगर के वासियों में से 1502 व्यक्तियों का समूह चुना गया जिन्हें रेंडम तरीके से चुना गया था। इन में भवनों में रहने वाले व्यक्ति तथा तंबूओं में रहने वाले व्यक्ति, दोनों का ही समावेश था। प्रारंभिक सर्वेक्षण के पश्चात इन 1502 में से 300 व्यक्ति चुने गये और अंततः 317 व्यक्तियों ने 2 दिन की चर्चा में भाग लिया। यह 317 व्यक्ति तथा शेष बचे 1185 व्यक्ति लिंग, शिक्षा, आयु, व्यवसाय, आय इत्यादि के बारे में एक जैसे थे अर्थात दोनो समूह पूरी तरह से निवासियों का प्रतिनिधित्व करते थे। ।

चर्चा के काफी दिन पहले सभी भागीदारों को लिखित सामग्री प्रदाय की गई थी जिस में सभी परियोजनाओं के बारे में जानकारी दी गई थी। जब यह व्यक्ति बैठक के लिये आये तो उन्हें लगभग पंद्रह पंद्रह के समूह में बाँटा गया। इन समूहों को मार्गदर्शन देने के लिये अनुभवी व्यक्ति नियुक्त किये गये जिन को यह आदेश था कि वे केवल चर्चा को संचालन करें गे तथा स्वयं उस में भाग नहीं लें गे तथा न ही अपने कोई विचार व्यक्त करें गे। समूह की चर्चा के पश्चात सभी व्यक्तियों की सामूहिक सम्मेलन में भी उन के विचारों के बारे में चर्चा की गई।

चर्चा के पूर्व और पश्चात सभी व्यक्तियों की राय ली गई थी कि कौन सी परियोजना को क्या प्राथमिकता दी जाना है। इस में जो सब से प्रथमे प्राथमिकता की योजना थी उसे एक अंक दिया गया और जो अस्वीकार करने योग्य थी उसे शून्य। आंकलन से पाया गया कि किसी भी परियोजना को 0.644 से कम अंक नहीं मिले थे। इस में आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि सभी परियोजनाओं को वर्षों की मेहनत के बाद तैयार किया गया था। चर्चा के दौरान पाया गया कि 8 परियोजनाओं में की प्राथमिकता में काफी अंतर आया। इन में से पांच की प्राथमिकता ऊपर की ओर गई औरे 3 की नीचे की ओर। एक प्रस्ताव था - नगर में मेट्रो शुरू करना। यह परियोजना प्राथमिकता में 11 क्रम से कम हो कर 13वें स्थान पर रह गई। सब से प्रथम प्राथमिकता की परियोजना थी - शालाओं को गर्म रखने का प्रावधान। इस में आश्चर्य नहीं है क्योंकि उलनबातोर नगर विश्व के अत्यंत शीतल नगरों में गिना जाता है।

प्राथमिकता के प्रथम चार स्थानों में से ऐसे प्रस्ताव थे जिन का पर्यावरण से संबंध है जैसे कि शुद्ध ऊर्जा, ऊर्जा की बचत, नदियों का संरक्षण, तथा कचरे का निष्पादन। पांचवी प्राथमिकता पर ही आर्थिक विकास की बात कही गई थी। नीति संबंधी विषयों में जल प्रदाय को सक्षम बनाने के पक्ष में 0.963 अंक आये थे और इस के पश्चात ऊर्जा की प्रस्ताव को 0.891 अंक मिले थे।

चर्चा के उपरांत नगर प्रशासन ने घोषित किया कि जो प्राथमिकता सम्मेलन में तय की गई है, वहीं लागू की जाये गी। न केवल यह बल्कि मार्च 2017 में संसद में एक कानून भी इस संबंध में पारित किया गया कि संविधान के संशोधन के लिये, स्थानीय क्षेत्र विकास के लिये, तथा नगर विकास के लिये इस प्रकार के सम्मेलन का आयोजन हर बार किया जाये।

इन उदाहरणों के पश्चात एक और महाद्वीप की ओर चलें जो पिछड़ा हुआ गिना जाता है। इस में युगण्डा के दो ज़िलों के बारे में प्रयोग किया गया था। यह ज़िले थे - बदूदा तथा बूतालेजा। मंगोलिया के बारे में यह बताना उचित हो गा कि वहाँ पर शैक्षिक स्थिति बहुत अच्छी थी। इस के विपरीत युगण्डा में साक्षरता बहुत कम है। महिलाओं के लिये तो यह नाम मात्र है। दोनों ज़िलो की जनसंख्या लगभग दो लाख है। दोनों की अलग अलग समस्यायें हैं। बदुलेजा घाटी में स्थित है। खेती के लिये भूमि उपजाउ है किन्तु बाढ़ का भय सदैव बना रहता है। अधिकतर लोग मुस्लिम हैं। इस के विपरीत बदूदा पहाड़ के ऊपर स्थित है। यहाँ की समस्या पहाड़ों में चट्टाने खिसकने की है। यह मुख्यतः ईसाई क्षेत्र है।

दोनों ज़िलों में प्रतिभागियों का चयन रैण्डम पद्धति से किया गया था, इस बात का ध्यान रखते हुये कि शिक्षा इत्यादि के मामले में उचित अनुपात रखा जाये। दोनों में प्रथम चरण साक्षत्कार का था। बदूदा में 210 लोगों को चुना गया और बतुलेजा में 232 लोगों को। इन में से क्रमशः 201 तथा 217 लोगों ने पूरे दो दिन चर्चा में भाग लिया। साक्षरता की कमी तथा दूरभाष के न होने के कारण अधिकतर बात आमने सामने ही हुई। साक्षात्कार लगभग तीस से चालीस मिनट के थे।

बदूदा के प्रतिनिधिगण में से दस प्रतिशत निरक्षर थे तथा 58 प्रतिशत ने केवल प्राथमिक शिक्षा ली थी। इन में से 87 प्रतिशत कृषक थे। बदूलेजा में आठ प्रतिशत निरक्षर थे तथा 57 प्रतिशत ने केवल प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी। 86 प्रतिशत कृषक थे।

चर्चा के लिये 3 विषयों के 36 विकल्प रखे गये थे। विषय थे - पुनर्वास, भू प्रबंधन, तथा जनसंख्या का दबाव। इन 36 विकल्पों में से क्रम तय करना था। सब से महत्वपूर्ण को दस अंक दिये जाना थे तथा महत्वहीन को शून्य। दूसरे प्रयोगों की भाँति इन में भी चर्चा से पूर्व तथा चर्चा के बाद की प्राथमिकता का आंकलन किया गया। देखा गया कि जिन विकल्पों को पूर्व में अधिक अंक मिले थे, उन में और वृद्धि हुई। बदूदा में अधिक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र से अन्यत्र बसने के विकल्प को 76 प्रतिशत ने उच्च प्राथमिकता दी थी तथा इन की प्रतिशतता 85 प्रतिशत तक पहुँच गई। उपजाउ भूमि से जाने की बात में बलिदान की अवधारणा थी। इन स्थान बदलने वालों की सहायता के बारे में सहायता की पेशकश 67 प्रतिशत से 78 प्रतिशत हो गई। स्थानीय आपदा राहत समितियों को सहायता देने के प्रश्न पर समर्थाकों की संख्या 58 प्रतिशत से बढ़ कर 79 प्रतिशत हो गई। मलेरिया रोकने के लिये नालियाँ बनाने के प्रश्न पर समर्थन पहले ही 87 प्रतिशत पर काफी था जो बढ़ कर 94 प्रतिशत हो गया। सब से अधिक बल इस प्रस्ताव को दिया गया कि लड़कियों की शिक्षा के लिये प्रयास किया जाना चाहिये।

इसी प्रकार बदूलेजा में भी परिचर्तन देखने को मिले। पुनर्वास के प्रश्न का आरम्भ में केवल 46 प्रतिशत समर्थन मिला जो चर्चा के उपरान्त 67 प्रतिशत तक पहुँच गया। फोन द्वारा सम्भावित भूसंकलन की जानकारी देने के प्रस्ताव का समर्थन 60 प्रतिशत से घट कर 42 प्रतिशत रह गया जो फोन व्यवस्था का सुचारु रूप से न चलने का परिचायक था। इस के विपरीत साईरन द्वारा सूचना देने के प्रस्ताव का समर्थन 79 प्रतिशत से बढ़ कर 92 प्रतिशत हो गया। परिवार नियोजन में दोनों ही क्षेत्रों में इस प्रस्ताव को समर्थन मिला कि विवाह की आयु को 18 वर्ष किया जाये। इस से लड़कियों को गर्भवती होने की अपेक्षा अधिक समय तक शाला में रहने का अवसर प्राप्त हो गा। इसी तारतम्य में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सक्षम बनाने की बात भी की गई। वर्तमान में चिकित्सा केन्द्र बहुत दूर होने की बात कही गई। तीसरी प्राथमिकता शालाओं को दूर दराज़ के ग्रामों में खोलने का कहा गया ताकि लड़कियों के लिये वहाँ जाना आसान हो सके। बूदालेजा में सर्वोच्च प्राथमिकता स्वच्छ जल की उपलब्धि थी। दूसरी प्राथमिकता शालाओं की तथा तीसरी सड़क निर्माण की थी।

उपरोक्त तीनों अध्ययन में इस बात पर विचार किया गया कि क्या किन्हीं कारणों से विचारों का प्रक्षेप विरूपन होता है। इन सभी उदाहरणों में देखने को मिला कि चयन किये गये लोगों की चर्चा में प्राथमिकतायें अधिक अर्थपूर्ण रहती हैं बजाये तब कि यह समूह स्वयं बनते हैं जिन में एक समान हित रखने वाले लोग एक समूह में आते हैं। अधिक शिक्षित लोग प्रभावित कर सकें गे अथवा सम्पन्न व्यक्ति प्रभाव डाल सकते हैं, यह आशंका थी परन्तु देखा गया कि इस प्रकार की विकृति कहीं नहीं आई।

इन प्रयोगों का प्रभाव अन्य देशों तथा क्षेत्रों में भी पड़ा है जैसे कि युगण्डा के पश्चात ऐसे ही प्रयोग घाना (तरमेले नगर), सेनेगल (तिवोने क्षेत्र), तनज़ानिया (पूरे देश में), तथा मालावी में भी किये गये। कुल मिला कर निष्कर्ष यह है कि यदि अवसर दिया जाये तो नागरिक अपने हितों के बारे में अर्थपूर्ण चर्चा कर सकते हैं।

हम ने पूर्व में प्रजातन्त्र के तीन स्वरूपों की बात की थी। इन वर्णित तीनों ही विकल्पों में चुनाव के पश्चात मतदाताओं की भागीदारी नहीं रहती है जब कि प्रजातन्त्र के लिये यह आवश्यक है कि जनता के हितों का तथा उस के विचारों का पता लगाया जाये तथा उन्हें मान्यता दी जाये। हम ने ऊपर कुछ प्रयोगों के बारे में बताया है जिस में जनता के जानकारी आधारित विचार जाने गये थे। पर यह केवल सीमित उद्देश्य के लिये सीमित संख्या में लोगों द्वारा था। इस बात का प्रयास किया गया था कि चर्चा में भाग लेने वालेयथासम्भव जनता के सभी समुदायों का प्रतिबिम्ब हों। परन्तु इस प्रकार की चर्चा का कोई संवैधानिक रूप नहीं था तथा यह शासन पर निर्भर था कि वह ऐसी सभाओ की अनुशंसा को स्वीकार करें अथवा न करें। केवल मंगोलिया में इसे संविधान में शामिल किया गया है पर वहाँ भी अंतिम निर्णय संसद का ही रहता है।

यदि ऐसी सभाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की जाये तथा इन की अनुशंसाओं पर से कार्य करना अनिवार्य हो तो एक नये प्रकार के प्रजातन्त्र का सूत्रपात हो गा। इसे हम विचारात्मक प्रजातन्त्र का नाम दे सकते हैं अथवा इसे सहकारी अथवा समूह आधारित प्रजातन्त्र कह सकते हैं।

साँख्यिकी दृष्टि से देखा जाये तो यदि प्रादर्श का चयन सही हुआ है तो वह पूरी जनता का प्रतिनिधित्व अच्छी प्रकार से करे गा। इस का एक बहुत कम प्रतिशत के अन्तर के साथ जनता का निर्देश माना जा सकता है। परन्तु यह ध्यान रखना हो गा कि कोई विशेश समूहांश इस में आवश्यकता से अधिक अतिक्रमण न करे। यह पद्धति उस से बेहतर होगी जिन में किसी मतसंग्रह द्वारा किसी प्रस्ताव पर रायशुमारी की गई जिस में जनता के लिये अन्य पक्ष के विचार जानने के कोई अवसर न हो। एक दूसरी समस्या है कि यह किस प्रकार निश्चित किया जो गा कि अधिकारी एवं शासक वर्ग प्रदर्शित विचारों को मान्य करे गा तथा इन पर कार्रवाई की जाये गी।

उपरोक्त उदाहरणों से स्पश्ट है कि इस प्रकार के विचार विमर्श में इन बातों पर विचार किया जाना आवश्यक है।

ऽ सभी भोगीदारों को काफी पूर्व प्रस्तावों के बारे मे, पक्ष में तथा विपक्ष में तर्क के बारे में जानकारी दी जाये।

ऽ सभी सदस्यों को चर्चा में भाग लेने का अवसर दिया जाये।

ऽ सभी को किसी भी तर्क पर प्रश्न उठाने का अवसर दिया जाये।

ऽ सभी को बिना किसी दबाव के अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया जाये।


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