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सत्योत्तर राजनीति

उपरोक्त विषय पर विकीपीडिया में लेख देखा। इस में बताया गया है कि ‘‘सत्योत्तर राजनीति उस राजनैतिक संस्कृति का नाम है जिस में भावनाओं के प्रति अपील की जाती है जिन का कोई सम्बन्ध किसी नीतिगत विषय से नहीं होता है। इस में जो विषय चर्चा के लिये चुना जाता है, उस को झुटलाने वाले तथ्यों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है’’। यह तरीका पहले के उन प्रयासों से अलग है जिन में तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता था। इस नई पद्धति में तथ्यों की ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता तथा विशेषज्ञ राय को भी दोयम दर्जे का माना जाता है। वैसे तो यह पद्धति काफी पुरानी है पर इण्टरनैट तथा सामाजिक मीडिया के आने के पूर्व इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया जा सकता था। कुछ लोग तो इस पद्धति का जन्म छापाखाना के आविष्कार के साथ ही जोड़ते है परन्तु ‘सत्योत्तर राजनीति’ शब्द का पहल बार उपयोग 1992 में सरबिया के एक लेखक स्टीव टैसिच द्वारा किया गया था। वाटरगेट के उपरान्त तथा उस के पश्चात ईराक के विरुद्ध प्रचार में हम ने यह सिद्ध कर दिया कि हम सत्योत्तर युग में रहना चाहें गे। वर्ष 2004 में राल्फ केन्स ने एक पुस्तक में इसी शीर्षक के तहत एक पुस्तक प्रकाशित की। कोलिन काउच ने इस नाम का प्रयोग तो नहीं किया पर उन्हों ने अपनी पुस्तक ‘पोस्ट डैमोक्रसी’ में इसी भावना के अनुरूप लिखा। उन का कहना था कि राजनैतिक परिचर्चा अब विरोधी पिशेषज्ञों के बीच में बिना तथ्यों का उल्लेख किये स्व प्रेरित विचारों का आदान प्रदान रह गई है। एक दूसरे पर बेईमानी के आरोप लगाने के लिये किसी ठोस साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है। चुनाव प्रक्रिया अब केवल प्रचार तन्त्र है। वर्ष 2016 में संयुक्त राज्य अमरीका के चुनावों में इस पद्धति को पूरी तरह अपनाया गया। वही बात यूनाईटिड किंगडम के युरोपीय संघ को छोड़ने के लिय जनमत संग्रह के दौरान अपनाई गई। भारत में इसे जुमलेबाज़ी से जोड़ा गया है परन्तु इस से पूर्व समाजवाद लाओ तथा गरीबी हटाओ इत्यादि नारों में भी यही भावना व्यक्त होती है। इसी की चर्म सीमा हम आज मोदी विरुद्ध प्रचार में देख रहे हैं। किसी भी कार्य को उस के सही परिपेक्ष्य में प्रस्तुत नहीं किया जाता। ओैर समर्थकों की ऐसी साईबर सैना तैयार की जा रही है जिस का लक्ष्य केवल दूसरे पक्ष को नीचा दिखाने का है और जिस सत्य अथवा तथ्य से कोई सरोकार नहीं है। एक विचारक ने कहा है ‘यदि आप को नहीं मालूम कि सत्य क्या है तो जो भी आप कह रहे हो, वह झूट नहीं है’। शायद यह आज के भारत का आदर्श वाक्य है।

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