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शिव धनुष

शिव धनुष


निरीक्षक महोदय निरीक्षण के लिये आये। उन्हों ने एक छात्र से प्रश्न पूछ लिया।

शिव का धनुष किस ने तोड़ा।

लड़का घबरा गया। उस ने फौरन कहा ‘मैं ने तो नहीं तोड़ा’।

निरीक्षक ने अध्यापक की तरफ सिवालिया दृष्टि से देखा।

अध्यापक बोले, ‘हम इस पर अलग से चर्चा कर लें क्या। बच्चों के समाने क्या कहें’।

निरीक्षक हैरान। खैर, अध्यापक उन्हें ले कर प्राधानाध्यापक की कक्ष की ओर चले। रास्ते में सरगोशी से बोले, ‘मैं इस बच्चे को जानता हूॅं। वह कई बार झूट बोलते देखा गया है। हो सकता है, उसी ने तोड़ा हो’।

तब तक प्राधानाघ्यपक का कमरा आ गया। उस समय रिसैसे - विश्राम पीरिएड - होने वाला था। प्रधानाध्यापक के यहाॅं चाय पानी के लिये सब अध्यापकगण बैठे थे।

अध्यापक ने कक्षा में हुई घटना के बारे में बताया और अपना शक भी जताया।

इस पर एक अध्यापक बोले। ‘मैं भी इस लड़के को जानता हूॅं। निचली जाति का है। इन में झूट बोलना तो आम बात है। उसी ने ही धनुष तोड़ा हो गा। ज़रा सख्ती दे कर पूछें तो मान जाये गा’।

एक दूसरे अयापक बोले, ‘ शर्मा जी, सक्ष्ती का ज़माना अब गया। शिकायत हो गई तो लेने के देन ेपड़ जायें गे। वह नया कानून भी है न दलितों को प्रताड़ित करने सम्बन्धी। और शिक्षा के अधिकार अधिनियम में तो शारीरिक दण्ड की पूरी तरह मनाही है’।

एक अन्य अध्यापक बोले, ‘यह सब कसूर शिव का है। वह धनुष को ले कर शाला में आया ही क्यों। असल में यह पैसे वाले लोग हमेशा अपनी दौलत का प्रदर्शन करना चाहते हैं। गरीबों को चिढ़ाने में उन्हें मज़ा आता है। अगली बार अध्यापक अभिभावक बैठक हो तो शिव के बाप को समझा दिया जाये कि कीमती वस्तुयें ले कर शाला में न आये। इस से अनुशासन भंग होता है’।

एक अध्यापक, जो थोड़े वरिष्ठ थे, बोले, ‘अजी जाने दो। शिव को शाला फण्ड से नया धनुष दिला दें गे। सारा झगड़ा समाप्त हो जाये गा’।

एक अन्य अध्यापक जिन को अभी हाल का कड़वा सा अनुभव था, बोले ‘आप को मालूम है आजकल आडिट वाले कितने कमीने हो गये हैं। इधर आप ने धनुष खरीदा और उधर उन की आडिट आपत्ति तैयार। वसूली के आदेश हो जायें गे और प्रधानाध्यापक को जेब से पैसे भरने पड़े गे’। ं

एक अध्यापक, जिन का दूसरी प्रकार का कड़वा अनुभव था, बोले, ‘मैं बिल्कुल सहमत हूॅं कि बात को यही रोक देना चाहिये। माता पिता को बतायें गे तो बात बढ़े गी। आगे ही गाॅंव में काफी खिंचाव है। अगड़ी पिछड़ी जाति का प्रश्न बन जाये गा। फिर पुलिस आये गी और हम सब की खटिया खड़ी हो जाये गी’ं ।

एक अध्यापक, जो शायद हिन्दी संस्कृत पढ़ाते थे, बोले, ‘यह सारा झंझट हमारे संस्कार समाप्त करने के कारण ही है। धर्म कर्म का तो सत्यानाश हो गया है। झूट बोलना, अहंकार, धन का अहंकार, शक्ति का अहंकार, आम बातें हो गई हैं। ऐसे में सुख शाॅंति कैसे रहे गी। पूरे देश की यही हालत हो रही है। पूरी शिक्षा नीति में ही परिवर्तन करना चाहिये’।

प्रधानाध्यापक इस सारी चर्चा के दौरान मौन धारण किये रहे। उन्हें ज्ञात था कि अध्यापकों में दो गुट हैं। उन के मुॅंह खोलने पर उन पर पक्षपात का आरोप लग जाये गा। वैसे भी उन के स्थानान्त्र के लिये प्रयास हो रहे हैं। इस दुविधा में पड़े उन्हों ने निरीक्षक की ओर कातर भरी निगाहों से देखा जैसे कह रहे हों, ‘तुम ने ही यह सारा पचड़ा आरम्भ किया था, अब आप ही इसे सम्भालो’।

निरीक्षक भी इस सब चर्चा से शायद ऊब चुके थे। बोले, ‘भई, मैं तो विज्ञान का अध्यापक हॅं। यह कहाॅं धर्म संस्कृति के चक्कर में पड़ गया। और कलह की आशंका - तौबा तौबा। कोई धनुष नहीं टूटा है। मैं ने यह सवाल इस लिये पूछ लिया कि इस के आधार पर धनुष बनाने में इस्तेमाल की गई लकड़ी की शक्ति पर चर्चा आरम्भ की जा सके। हर वस्तु की अपनी टैंसाईल शक्ति रहती है। वह एक सीमा तक ही खिंचाव को सह सकती है। मैं उन से जा कर कोई दूसरा प्रश्न पूछ लेता हूॅं’।

प्रध्ययानाघ्यापक ने राहत की साॅंस ली। बोले, ‘अजी ठहरिये। निरीक्षण तो होता रहे गा। पहले थोड़ा नाश्ता पानी हो जाये। अरे नत्थू जी, घनश्याम से गर्म समोसे तो ले कर आना। और चाय भी, कम चीनी वाली’।


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