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वेदों में क्या है।

वेदों में क्या है।


वेद मानवीय सभ्यता के आदि ग्रन्थ हैं। वेदों में आर्य जाति के अतीत जीवन के प्रारम्भिक सांस्कृतिक इतिहास के सूत्र हैं। वे भारतीय संस्कृति के सर्व प्राचीन स्रोत तथा दार्शनिक भाव, धर्म, और विश्वास के पवित्र ग्रन्थ हैं भारतीय आस्था के अनुसार वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वरीय प्रेरणा द्वारा ऋषियों को समाधि अवस्था में वह ज्ञान मिला। ऋषियों को ज्ञान की अनुभूति ईश्वरीय प्रेरणा से प्राप्त हुई। बाद में लिपि का विकास होने पर वह लिपिबद्ध हुये।

वेद साहित्य में ऋक्, यजुः, साम, और अर्थव ये चार संहितायें, तथा ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिशद आते हैं। इन में मन्त्र हैं। मन्त्र का अर्थ है गुह्य अथवा रहस्यमय। मन्त्रों के संग्रह को संहिता कहते हैं। वेदों की गूढ़ तथा विशाल सामग्री के अर्थ ज्ञान और व्याख्या के लिये ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना की गई। आधिवैदिक तत्व, अध्यात्मिक विंवेचन, पुनर्जन्म, आत्मा का आस्तित्व, चिकित्सा तथा ग्राहस्थ धर्म आदि विशय ब्राह्मण ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक समझाये गये हैं। ब्राह्मणों का ही एक भाग आररण्यक तथा एक भाग उपनिषद कहलाता है। आरण्यक में वानप्रस्थ जीवन तथा उपनिषद में अध्यात्म ज्ञान तथा ब्रह्मविद्या की बात की गई हैै।


ऋगवेद प्राचीन साहित्य में सर्वाधिक प्राचीन, महान और सर्वमान्य ग्रन्थ है। धर्म, दर्शन, ज्ञान, चिज्ञान, कला इस के विषय हैं।


ऋगवेद में देवताओं की स्तुतियाॅं हैं। यास्क तथा अन्य विद्वानों के अनुसार देवता का अर्थ लोकों में भ्रमण करने वाला, प्रकाशित होने वाला, सब पदार्थ को देने वाला, करते हैं। यास्क ने तीन प्रकार के देवता माने हैं - पृथ्वी स्थानीय, अंतरिक्ष स्थानीय, द्यौ स्थानीय। दृगवेद की ऋचा 1.139.1. के अनुसार 11 पृथ्वी स्थानीय, 11 अंतरिक्ष स्थानीय, तथा 11 द्यौ स्थानीय देवता माने गए हैं। कुल मिला कर 33 देवता होते हैं। ऋगवेद में अग्नि तथा इन्द्र (वायु). को प्रथमिकता दी गई है। ऋगवेद का आरम्भ इस मंत्र से होता है-


अग्निमीले पुरोहित यज्ञस्य देव मृत्विजम्

होतारं रतन धात्मम् ।

मैं अग्नि की उपासना करता हूॅं. यह प्रकाशमान देवता, पुरोहित होता और ऋत्विक है. वही समस्त संपत्ति का स्वामी है।


यजुर्वेद मनुष्य जीवन के विकास के तीन मूल तत्व ज्ञान, कर्म, और उपासना की शिक्षा देते हैं. प्रसिद्ध गायत्री मंत्र -

भूर्भवः स्वः तत्सवितुर् वरेणयम् भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो न प्रचोदयात्’

इसी वेद का है.


अदीनास्याम शरदः शतं भूयस्य शरदः श्तात्

(हम बिना आश्रित हुये सो वर्ष तक जिये बलिक उस से भी आगे जियें)


तेजोसि तेजोमयि धेहि (हम तेजस्वी बनें)

अष्मा भवतुः नस्तनूः (हम सुदृढ़ बनें)

आदि प्रेरणाप्रद मंत्र इसी में है.


सामवेद का अर्थ है ऋचा और स्वर। इस में मंत्र गीति तत्वों से पूर्ण और उपासना प्रधान है। अग्नि रूप, सूर्य रूप, और सोमरूप ईश्वर का सत्वन है। विश्वकल्याण कामना और समस्त चराचर की शुभ कामना भी इस में है।


अथर्ववेद में आयुर्वेद, शरीर रचना, शरीर रोग, औषध विज्ञान, राज धर्म, समाज व्यवस्था, अध्यात्मवाद, ईश्वर, जीव और प्रकृति के स्वरूप, और संबंधों की व्याख्या वर्णित है


उपनिषदों में वैदिक कर्मकाण्ड के तत्वज्ञान की विकसित व्याख्या है। उपनिषद का भाव यह है कि जो आदमी विद्या और अविद्या दोनों को पहचानता है। वह अविद्या के द्वारा मरण को पार कर विद्या के द्वारा ब्रह्मज्ञान से अमरत्व प्राप्त करता है। शरीर को काम करने दो और समझो कि तुम्हारा शरीर काम कर रहा है, तुम नहीं। इसी से तुम कर्मचक्र से मुक्ति पाओ गे।

(आचार्य चुतरसेन के लेख से साभार)


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