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लघु कथा

(आज सुबह सुबह मुझे एक अजीब सा स्वप्न आया। उस से ही यह कहानी उपजी। सो पेश है। कहने की ज़रूरत नहीं कि सब नाम कल्पित हैं। कहानी तो है ही।)

लघु कथा


यह बात कितनी पुरानी हो गी। बीस साल, पच्चीस साल। क्या फर्क पड़ता है। मतलब तो बात से है तो वह इस प्रकार है।

शहर से बाहर एक जंगल में तीन लाशें थोड़ी थोड़ी दूरी पर पाई गईं। लाशें भी तीन चार दिन पुरानी थीं। यह अंधा कत्ल था। वह दोनों समय पर अपने दफतर से निकले थे पर अपने घर नहीं पहुॅंच पाये थे। तीसरे आदमी की पहचान कई दिन तक नहीं हो पाई पर आखिर पुलिस ने पता कर ही लिया। वह दफ्तर में काम कर रहे एक व्यक्ति को दोस्त था। क्या उस की वजह से यह सब हुआ। पिस्तौल भी मौके पर नहीं मिली। सोच सोच कर पुलिस हार गई। कहीं सुराख नहीं मिला। खोजी कुत्ते भी एक स्थान पर जा कर रुक गये। शायद कोई कार थी या कोई और सवारी। एक व्यक्ति के पास कार थी पर वह उस के मकान के सामने ही खड़ी मिली। कोई उंगलियों के निशान नहीं सिवाये उस व्यक्ति के अपने। अखबारों मे काफी चर्चा रही। कई कहानियाॅं सुनी गई, सुनाई गईं। और फिर समय बीत जाने पर यह सब नैपथ्य में चला गया। मसरूफ ज़माने को और कहानियाॅं मिल गईं। शायद खातमा रिपोर्ट भी भेज दी गई, क्या पता। राज़ राज़ ही रहा।

आज इतने दिन के बाद, इतने सालों के बाद, वाक्ये की असलियत ब्यान करना है। शायद कत्ल के जुर्म के लिये कोई मियाद नहीं होती पर अब इसे सीने में छुपाये रखने से क्या फायदा।

पढ़ाई खत्म करने के बाद मैं ने एक दफ्तर में नौकरी कर ली। दस बीस कार्यकर्ता थे। वक्त ठीक से कटने लगा।

एक दिन दफ्तर का काम समाप्त होने के पश्चात बस के इंतज़ार में खड़ी थी कि अपने सहयोगी मदन की कार रुकी। मदन बोला - चलो, तुम्हें घर पर छोड़ देते हैं। उस का घर मेरे घर से थोड़ा आगे ही था। मुझे कोई अजीब बात नहीं लगी। कार में बैठ गई। देखा तो उस में दो व्यक्ति और थे। ण्क तो अपने दफतर का था - अहमद। दूसरा कोई अनजान था।

कार चली पर थोड़ी देर बाद मेरे घर की तरफ जाने के बजाये एक तरफ मुड़ गई। मैं ने कहा कि यह गल्त रास्ता है और मुझे घर जल्दी पहुॅंचना है। पर उस पर अहमद ने कहा - घर भी पहुॅंच ही जायें गे पर पहले थोड़ी मस्ती कर लें। मस्ती का नाम सुन कर मुझे डर लगा क्योंकि मरदों के लिये मस्ती का एक ही मतलब होता है। मैं ने प्राटैस्ट तो किया पर मुझे मालूम था कि इस का असर होने वाला नहीं है। और मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी।

कार आखिर एक सुनसान सी जगह पर रुकी। तीसरे आदमी ने कहा - यही जगह ठीक है। यहाॅं कोई आता जाता नहीं। कोई परेशानी नहीं हो गी। पूरी रात अपनी है। मदन ने कहा - रात की क्या बात है यहाॅं तो हफ्ता भर कोई नहीं आये गा।

चलो उतरो - उस तीसरे आदमी ने कहा। मैं ने दरवाज़ा खोला और उतर कर भागने लगी। उस समय पर्स मेरे हाथ में ही था। वही आदमी बोला - अरे भाग के कहाॅं जाओ गी। यहाॅं कोई नहीं है जो तुम्हारी मदद करे गा।

अहमद और मदन भी कार से उतर चुके थे। एक बोला - अरे महेश, जल्दी की ज़रूरत नहीं है। आराम से सब काम होने दो। लड़की समझदार है। पूरी तरह सहयोग करे गी। लेकिन महेश को शायद जल्दी थी। वह पास आने लगा। मैं ने पलट कर अपने पर्स से पिस्तौल निकाली और उस पर फायर कर दिया। महेश धड़ाम से गिरा। अरे बाप रे - कह कर अहमद पलटा और कार की तरफ भागने लगा मगर मेेरी दूसरी गोली ने उस का काम तमाम कर दिया।

मदन तब तक कार के पास पहुॅंच गया था। मैं ने उसे निशाने पर लिया ओर कहा कि अब तुम्हारी बारी है। वह बोला - नहीं नहीं। यह सब तो अहमद और उस के साथी का प्लान था। मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। वह तो कार मेरे ही पास थी, इस कारण मुझे साथ आना पड़ा।

उस वक्त भी मैं मुस्कराये बिना न रह सकी।

हाॅं, वे कैसे जानते कि मैं पिस्तौल प्रतियोगिता में स्टेट में सिल्वर मैडेलिस्ट रह चुकी हूॅ।

वैसे भी सिल्वर मैडेलिस्ट को कौन जानता है। कीमत तो सिर्फ चैम्पियन की होती है। अब रोजर बैनिस्टर पहला शख्स था जिस ने चार मिनट से कम में एक मील की दौड़ पूर्ण की। उस के बाद कितनों ने ऐसा किया पर किस का नाम किस को याद है।

पर यह सब डायलाग बोलने का वहाॅं समय नहीं था न ही मौका।

मैं ने सिर्फ इतना कहा - सही है तुम साथ ही आये थे और अब साथ ही जा भी रहे हो। इस से पहले कि मदन कार का दरवाज़ा खोल का अन्दर जाये, मुझे कार्रवाई करना थी और मैं ने वही की। उस की लाश को हटाने में थोड़ी कसरत करना पड़ी पर अन्ततः मैं कार में बैठ कर रवाना हो गई। कार को मदन के घर के बाहर ही पार्क् किया और अपने घर लौट आई। शुक्र है कि किसी ने मुझे कार पार्क करते नहीं देखा। बहुत देर नहीं हुई थी। दफतर में ज़्यादा काम आ गया हो गा, यह सोच कर किसी ने घर पर कुछ नहीं कहा।

दूसरे दिन ठीक समय पर दफ्तर पहुॅंच गई। आधे घण्टे बाद बाॅस ने बुलाया। कहा - यह मदन और अहमर दोनों ही आज नहीं आये न ही कोई सन्देश ही है। ऐसा करो कि इन की डाक भी देख लो और कोई ज़रूरी बात हो तो उस को भी देख लो या मुझे बता दो।

ठीक है, सर - कह कर मैं लौट आई और अपनी डयूटी पूरी की।

लोग बाग कई दिन तक चहमगोईयाॅं तो करते रहे। पर मेरा नाम उन में नहीं आया। मैं अक्सर अपने काम से काम रखती थी। अधिक मेल जोल नहीं था। और मैं ने अपना काम पहले की तरह ही चालू रखा।

बस इतनी सी ही तो बात थी।


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