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यादें — रीवा की बात

  • kewal sethi
  • May 26
  • 1 min read

यादें — रीवा की बात

अब वह समय आ गया है जब कुछ करने का उत्साह क्षीण हो गया हैं केवल पुरानी यादें ही रह गई हैं। चलिये इन्हें ताज़ा कर लेते हैं।

जब रीवा में कलैटर था तो उस समय सी एस आर ई नाम की योजना आरम्भ हुई मतलब ग्रामीण रोजगार के लिये ताबड़तोड़ योजना। उस में शाला भवन निमार्ण पर ज़ोर दिया गया। जैसा कि उस समय की प्रक्रिया थी, लोक निर्माण् विभाग ने भवन का नक्षा बनाया, उस के लिये कौन सी समाग्री इस्तेमाल की जाये गी, इस का ब्यौरा दिया। और सभी ज़िलाधीशों से अपेक्षा की कि भवन निर्माण किया जाये।

दो कमरे, पक्की दीवारेें, पक्का फर्श, कनक्रीट की छत, सब कुछ बढ़िया था।

मैं ने उस में थोड़ा परिवर्तन किया। जैसे गॉंव में घर थे, वैसी ही दीवारें बनवा दीं। छत डालने के लिये कबेलू, जो गॉंव में ही बन सकते थे, लगवा दिये। उसी लागत में दो कमरों के स्थान पर चार कमरे बन गये और सामने बरामदा भी। न बाहर से सामग्री आई, न बाहर से मज़दूर। मेरे विचार में वही मकसद था रोज़गार देने का।

जैसा कि मेरे साथ कायदा था, किसी स्थान पर एक वर्ष से अधिक रहना नहीं था। मुझे पक्का यकीन है कि मेरे बाद आने वाले कलैक्टरों को मेहनत करना पड़ी हो गी कि स्पष्टाीकरण दें कि नार्म से अलग कार्य कैसे किया गया।

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