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मोक्ष

मोक्ष

मोक्ष भारतीय दर्शन का केन्द्र बिन्दु है। श्री अरविन्द इसे भारतीय विचारधारा का 'महान'' शब्द मानते हैं। मोक्ष का ​शाब्दिक अर्थ है मुक्त होना। जीवन चक्र से छुटकारा पाना ही मोक्ष है। चाहे इसे मोक्ष कहा जाये या कैवल्य नाम से पुकारा जाये अथवा निर्वाण नाम से।

उपनिषदों ने चार पुरुषार्थों को स्वीकार किया है। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। चाहे वह नचिकेता हो या मैत्रयी, वह अर्थ अथवा काम से संतुष्ट नहीं होते। वह केवल मृत्यु के पार जाने की चाह रखते हैं। उपनिषदों के अनुसार आत्मज्ञान ही मोक्ष है। मोक्ष प्राप्त होने पर फिर जन्म नहीं होता। मोक्ष प्राप्ति का शरीर के होने या न होने से सम्बन्ध नहीं है।

भारतीय दर्शन के छहों धाराओं ने मोक्ष के बारे में उपनिषदों के कथन को ही स्वीकार किया है। न्याय तथा वैशेषिक दर्शन के अनुसार कर्मफल अवश्य मिलता हैं। जब दोषों की समाप्ति हो जाती है तो कर्म करने की प्रवृति समाप्त हो जाती है और जन्म का बन्धन टूट जाता है। यही मोक्ष है।

सांख्य तथा योग दर्शन में प्रकृति के तीनों गुणों से परे होना ही मोक्ष है। मनुष्य पूर्व में मुक्त ही था। बंधन का कारण अज्ञान तथा अविद्या है। ज्ञान प्राप्त होने पर मनुष्य को अनुभव होता है कि वह तो सदैव मुक्त ही था। योग में यह शुद्धि योगाभ्यास से प्राप्त की जाती है।

वेदान्त में शंकर केवल ज्ञान को ही मोक्ष का साधन मानते हैं। वह कर्म से इस का सम्बन्ध नहीं मानते। मोक्ष देश, काल, कारण से ऊपर है। मोक्ष केवल ब्रह्रा भाव का अनुभव है। मोक्ष में जीव तथा ब्रह्रा एकाकार हो जाते हैं।

परन्तु रामानुज के अनुसार ऐक्यभाव की स्थापना नहीं हो सकती किन्तु आत्मा ब्रह्रा के अनुरूप हो जाती हैं। इस का साधन वह भकित तथा ईश्वर कृपा को मानते हें। निम्बार्क मोक्ष को ब्रह्रा ज्ञान तथा ईश्वरीय कृपा दोनों का ही सामूहिक फल मानते हैं।

''सब कुछ अनित्य है, सब कुछ निस्सार है, केवल निर्वाण में ही शान्ति है, यह त्रिसूत्री शिक्षा बौद्ध दर्शन की आधार शिला है। महात्मा बुद्ध द्वारा तत्वमीमांसा से ध्यान हटा कर आचारशास्त्र पर केन्द्रित करने का प्रयास किया गया। प्रत्येक मनुष्य को अपने निर्वाण के लिये स्वयं प्रयत्न करना है। डा. राधाकृष्णन के अनुसार बौद्ध मत में मोक्ष अनन्त यथार्थ सत्ता के साथ ऐक्यभाव स्थापित कर लेने का नाम है।

महायान मत का विचार है कि मोक्ष प्राप्ति पर मनुष्य को समाज के उत्थान के लिये कार्य करना होता है। केवल अपने मोक्ष का सोचना स्वार्थ है। इसी प्रकार श्री अरविन्द भी सम्पूर्ण जगत के मोक्ष की बात सोचते हैं। उन के अनुसार साधक के मन की पूर्ण शुद्धि हो जाने पर उस का अवरोहण हो सकता है। मानव का रूपान्तरण अति मानव के रूप में हो जाये गा। इन के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व का उत्थान होगा।

जैन दर्शन बहुतत्ववादी है। उसके अनुसार जीव स्वरूपत: नित्य शुद्ध है। उध्वर्गमन उस का स्वभाव है। कर्मों के कारण वह ऊपर नहीं उठ पाता। यही उसका बंधन है। पर ज्यों ही यह आवरण मिटता है वह सिद्ध शिला की ओर बढ़ता जाता है। सिद्धशिला प्राप्त कर लेने पर वह वहीं निवास करता है। यही उस का मोक्ष है।

इन सभी सम्प्रदायों में मोक्ष आत्मा के वास्तविक स्वरूप तथा उस के परमतत्व से सम्बन्ध के ज्ञान में निहित है। मनुष्य आत्म दृष्टि से जीवन के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करता हैं यही सर्वोच्च मूल्य है। अशुभ कर्मों के, पाप के मूल में अज्ञान है। यह बन्धन शुद्ध ज्ञान के प्राप्त होने पर समाप्त हो जाता है और यह सशरीर भी हो सकता है। इस सर्वोच्च अवस्था में कर्म, ज्ञान तथा भक्ति एक ही हैं।

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