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मैं और मेरी तन्हाई

मैं और मेरी तन्हाई

केवल कृष्ण सेठी

जून 2021


मेरी कहानी बहुत मुख्तसर सी हैं। मैं इसे लम्बा खींचना भी नहीं चाहूॅं गी क्योंकि इस में वह रस नहीं है जिस के लोग शौकीन होते हैं। मेरा नाम शबाना है। मेरी मुश्किलात की शुरूआत बचपन से ही हो गई थी और उन्हों ने आज तक मेरा पीछा नहीं छोड़ा। वैसे आज मैं मुम्बई में एक शानदार इलाके के एक शानदार फ्लैट में रह रही हूॅं। पर यह फ्लैट मेरा नहीं है। मेरा तो डेढ़ कमरे का मकान ग्वालपाड़ा नाम की बस्ती में है जिसे मलिन बस्ती के नाम से जाना जाता है। वहाॅं पर वह लोग ही रहते हैं जिन की आमदनी का कोई निश्चित मद नहीं होता। वह क्या करते हैं, यह वह किसी को नहीं बताते। शायद बताने लायक कुछ हैं भी नहीं। वहाॅं पर आदमी कब आता है और कब जाता है, इस से किसी को सरोकार नहीं रहता। सब अपने अपने दरबे में हैं और बाहर झाॅंकना भी नहीं चाहते। मैं कभी कभी वहाॅं पर जाती हूॅं। कुछ दिन रह कर इस शानदार फ्लैट में लौट आती हूॅं। इस से पहले मैं एक दूसरे फ्लैट में रहती थी जो इतना शानदार तो नहीं था पर इस से काफी बड़ा था। और उस से पहले ---ं खैर जाने दो, यह तो आप को आगे ही पता चले गा। अभी से इस राज़ को क्यों खाला जाये।


मैं ने इस बात से शुरू किया था कि मेरे तकलीफों की शुरूआत बचपन में ही हो गई थी। एक तो मेरे छह भाई बहन थे। कुछ मुझ से बड़े, कुछ मुझ से छोटे। मेरे वालिद मामूली तरह के नौकरी पेशा वाले आदमी थे। लगी बंधी आमदनी थी। उस पर भी मेरे वालिद ने दूसरी शादी कर ली। शायद वह मेरी माॅं से ऊब चुके थे। पाॅंच बच्चे जनने के बाद औरत में वह बात नहीं रह जाती जो आदमी को अपनी तरफ खैंचती है। दूसरी बीवी के आ जाने के बाद दो बच्चे भी और आ गये। गुज़ारा आगे ही मुश्किल से होता था, अब और मुश्किल से होने लगा। ऐसे में पढ़ाई लिखाई का तो सवाल ही नहीं उठता। भाई मदरसे जाते थे और जाने क्या पढ़ कर आते थे। दो साल तो मुझे भी भेजा गया पर उस में क्या सीख सकते हैं। हाॅं यह है कि कायदा पढ़ना आ गया। थोड़ा जोड़ घटाने की बात भी समझ में आने लगी।


मेरी नई माॅं खूबसूरत थी। इसी लिये तो अब्बा उस ब्याह कर लाये थे। मेंरी अपनी माॅं भी अपने वक्त में खूबसूरत रही हो गी। अब वह हुस्न तो रहा नहीं पर चुस्ती तो वैसी ही थी। उन की यह दो बाते मुझे विरासत में मिली हैं। इस खूबसूरती ने ही मेरी ज़िंदगी की मुश्किलात को बढ़ाया है और एक आम औरत की तरह अपनी ज़िंदगी नहीं बिता सकी यानि कि बच्चे जनो, ढल जाओ, और मर जाओ। यही तो आम औरत की ज़िंदगी है। पर वह मेरे नसीब में नहीं थी। मेरे नसीब में एक बढ़ऊ के साथ शादी लिखी थी।


जैसा कि मैं ने कहा है हमारे हालात ऐसे थे कि मुश्किल से गुज़ारा होता था। जैसे जैसे हम लोगों की उम्र बढ़ी और अब्बा की ढलने लगी तो इस में और इज़ाफ़ा हो गया। कर्ज़ बढ़ता गया। और इस कर्ज़ को उतारने का एक मात्र तरीका मेरी खूबसूरती थी। इसी को उस बढ़ऊ के हाथ अच्छी रकम ले कर बेचा गया। नाम के लिये निकाह हो गया और मैं नये घर में आ गईं। पर यह भी पुराने घर के माफिक ही था।


मेरी उम्र ही उस वक्त कितनी थी। अभी तो जिस्म पूरी तरह भरा भी नहीं था। अम्माॅं ने तो कोशिश की कि कुछ वक्त तक इस हादसे को टाला जाये पर उन की नहीं चली। भला औरत की कहीं चली भी है। खैर। तो मेरे खाविंद की दो बीवियाॅं पहले से ही थीं। वे काफी उम्र रसीदा थीं। उन के बच्चे भी मेरी उम्र से ज़्यादा के थे। पैसा ज़रूर ज़्यादा था। कम से कम अपने अब्बा हज़ूर के मुकाबले में पर उन्हें रईस कहा जाये, यह मुमकिन था। पर वह कंजूस थे और बीवियों का उन से पैसा लेना टेढ़ी खीर थी चाहे वह नई नवेली दुल्हन ही क्यों न हो।


दो साल गुज़र गये। पर ताअुज्ब की बात यह है कि मैं हामला नहीं हुई। मेरे हुस्न में थोड़ा और निखार आ गया। मेरे खाविंद देखते और कुढ़ते। अब यह राज़ पूरी तफसील से बताने लायक भी तो नहीं है। शायद आप खुद ही समझ गये हों गे। यह कहना ज़रूर हो गा कि मुझे कुछ आराम से रखा गया खास तौर पर पहली बीवियों के बनिस्बत। इसी को अपना मुकद्दर समझ कर अपने दिन काट रही थी।


2.

उस का नाम अली था। वह मेरे से तीन या चार साल बड़ा था। एक ही घर में रहने के कारण आमना सामना हो ही जाता था यद्यपि पर्दे का काफी चलन था। पर उस से बात नहीं हो पाई थी। बात करने का मेरा मुकाम भी नहीं था। पर आते जाते कभी उस का हाथ या बदन छू जाता था तो एक अजीब से सिहरण मेरे जिस्म में उठती थी। फिर एक दिन उस ने मुझ से बात कर ही ली। कहा, ‘‘देख रहा हैं, तुम्हारी चप्पल बहुत पुरानी हो गई है। काफी तकलीफ हो रहीे हो गी। इस लिये मैं एक नई चप्पल ले आया हूॅं। अब्बा हज़ूर को तो ख्याल ही नहीं आता है’’। यह कह कर उस ने एक बण्डल मेरे हाथ में थमा दिया। वाकई अच्छी सी चप्पल थी। पर उसे पहन कर अपने मियाॅं के सामने जाना मुश्किल था। उस के कई सवाल उठते। उन का जवाब क्या देती। फिर एक बार जब मौका पड़ा तो अपने वाल्दीन के यहाॅं गई। लौट कर आई तो पहनने लगी। सोचा कह दूॅं गी, घर से मिली हैं पर मियाॅं ने पूछा भी नहीं। शायद यही सोच लिया हो गा कि घर से ही मिली है।


तो इस तरह से हमारी (अली ओर मेरी) बात चीत का सिलसिला चल निकला। छोटा मोटा तोहफा भी हर बार मिल जाता। पर यह सिलसिला केवल बात तक महदूद नहीं रहा। आहिस्ता आहिस्ता, यह जिस्मानी रंग में भी ढल गया। कब हुआ, कैसे हुआ, यह कहना तो मुश्किल है पर जब दो जवान जिस्म मिलते हैं तो यह अंजाम तो लाज़िमी हो जाता है। यह मुझे मालूम था कि यह एक गुनाह है पर जवानी की अपनी मजबूरी होती है।


पर मेरे दिल में और ही ख्याल उभरने लगे। गुनाह करने का क्या फायदा अगर जिंदगी खुशहाल न हो। अभी भी अली मुलाकात के वक्त कुछ तोहफा देता था। एक बार मैं ने उस से कहा कि वह जो चीज़ लाया है, वह मेरी पसन्द की नहीं है। मैं ने बाज़ार में वैसी ही चीज़ देखी थी। अगर वह मुझे नकद दे दे तो मैं उसे ले सकती हूॅं।


इस तरह बजाये तोहफे के जो मेरे किसी काम के नहीं थे क्योंकि उन्हें दिखाया नहीं जा सकता था, और औरत के लिये अगर चीज़ की नुमाईश न की जाये तो उस का कोई लुत्फ नहीं होता। उन्हें इकठ्ठा करना बेमानी है। पर पैसा इकठ्ठा किया जा सकता है। अब यह तय हो गया कि अली मुझे हर बार एक सौ रुपये दे गा ताकि जब मौका पड़े तो मैं कुछ अच्छी सी चीज़ ले सकूॅं।


जवानी का एक और चलन यह है कि अपनी कामयाबी का ज़िकर किया जाये। जिस तरह औरत नुमाईश पर ज़ोर देती है, उसी तरह मर्द अपनी अपनी ढींग, अपनी काबिलियत की, अपनी जवानमर्दी की हाॅंकता है। अली ने अपने दोस्तों से बात की हो गी। एक दिन उस का दोस्त जावेद आया और उस ने सरगोशी में कहा - अली तो सिर्फ एक सौ देता है। मैं तो दो सौ देने को तैयार हूॅं। अंधा क्या चाहे - दो आॅंखें। मैं ने भी कह दिया कि कल जब अब्बू न हों (मैं अपने खाविंद का अब्बू ही कहती थी। उम्र में तो वह मेरे बाप से बड़े थे) तो दो सौ ले कर आ जाना। इस तरह मेरा एक और आशिक, या खरीददार, तैयार हो गया। उस ने आगे किसी का बताया और उन की तादाद तीन हो गई।


अब यह सब होने लगा तो इस बात का अब्बू तक पहुॅंचना ही था। उस दिन काफी झगड़ा हुआ। होना ही था। मार तक भी नौबत आ गई। पर अली के आ जाने से रुक भी गई। उस के बाद बाप बेटे में तकरार शुरू हुई और मैं मौका पा कर खिसक ली। लेकिन इस का अंजाम तो उसी तरह होना था जिस की उम्मीद थी - यानि तलाक, तलाक, तलाक। और घर से निकल जाने का हुकुम सादर कर दिया गया। मैं ने तुर्की बह तुर्की जवाब दिया और घर छोड़ने से इंकार कर दिया। धमकी दी गई पर उस का असर नहीं हुआ। मैं वहीं रही।


इस सब के बाद वहाॅं रहने का कोई तुक नहीं था। दर असल मेरा इरादा भी वहाॅं रहने का नहीं था। पर उस वक्त तीन कपड़ों में निकल जाना मुझे मंज़ूर नहीं था। आखिर मैं ने सब रकम इसी दिन के लिये तो जोड़ी थी। उसे छोड़ कर जाना नामुमकिन था। पर उसी दिन रात के सन्नाटे में मैं ने अपना संदूक उठाया और उस घर को हमेशा के लिये छोड़ दिया। उस शहर में कहाॅं जाती। अब्बा हज़ूर के यहाॅं जाती तोे वह भी निकाल दें गे, यह सोच कर उसी रात को मुम्बई का टिकट कटाया और एक नई जिंदगी की शुरूआत की।


मुम्बई में काॅंदीवली में मेरी एक खाला रहती थी। उस के बारे में सुना ही था, कभी मिली तो नहीं थी। उस के खाविंद की मौत हो चुकी थी और वह गुरबत में अपने दिन काट रही थी पर कम से कम उस की अपनी खोली थी। थोड़ा बहुत हुनर भी था सिलाई कढ़ाई का। इस लिये इतनी बुरी हालत भी नहीं थी। मेरा क्या इरादा था, यह उस वक्त मैं भी नहीं जानती थी। पर अपने शहर में रहना मुश्किल था, इस वजह से उसे छोड़ना ही था और खाला के इलावा किसी की बात सूझी नहीं।


3.

मुम्बई पहॅंच कर डूॅंढते ढाॅंडते खानम खाला के घर पहुॅंच ही गई। अगर मैं ने उन्हें कभी नहीं देखा तो उस ने भी मुझे कभी नहीं देखा था। पर बाप का और माॅं का नाम बताने और बचपन की कुछ बातें बताने से उसे यकीन हो गया कि मैं उस की भाॅंजी हूॅं और वह मेरी खाला ही है। अब सवाल यह था कि करूॅं क्या। खाला से सिलाई कढ़ाई सीखने की सोची और शुरूआत भी कर दी। एक से दो हुये तो गुज़ारा भी होने लगा। खाला को भी साथ मिल गया। अकेली जिंदगी से नजात मिली तो उसे भी राहत ही हुई।


उस खोली में दो कमरे थे। एक में मैं रहने लगी। अजनबी शहर था। किसी को मेरे माज़ी का कुछ पता नहीं था। और वैसे भी मुम्बई में किसी को भी किसी का नहीं पता होता है। सालों निकल जाते हैं, पड़ोसी की शकल भी नहीं पहचानते। बहुत ज़्यादा हुआ तो दुआ सलाम हो जाती है। एक मसजिद तो थी पास में ही पर खाला कभी वहाॅं जाती नहीं थी। वैसे भी ओरतों का मसजिद में जाना ममनूह है। जब खाविंद थे तो शायद कुछ लोग जानते थे पर उन को गुज़रे हुये भी मुद्दत हो गई। अभी मेरे पास पैसा भी था और कुछ वक्त तक चल सकता था इस वजह से परेशानी नहीं थी। खाला को भी इस से राहत थी। उस ने कभी यह नहीं पूछा कि यह पैसा आया कहाॅं से। वह पूरी मुम्बई वाली थी।


पर यह सिलसिला चल नहीं पाया क्योंकि एक अजीब सा हादसा हुआ। खाला अकेली थी और जहाॅं तक पता लगा, उस का कोई सगा न था पर अचानक एक दिन उस का एक भतीजा वारिद हो गया। जिस तरह मैं आई थी, उसी तरह वह भी आ गया। शायद मुम्बई की कशिश उसे खींच लाई। बहुत से लोग आते हैं मुम्बई में अपनी किस्मत चमकाने को। वैसे वह खूबसरत जवान था और फिल्मी जगत का शौकीन। खाला ने उसे अपने कमरे में ही सुलाना शुरू किया। और कोई चारा भी नहीं था। दिन भर वह घूमता और देर शाम को आ कर पड़ जाता। खाना तो मिल ही जाता था। पर मुझे उस की नज़र कभी अच्छी नहीं लगी। शायद फिल्मी जगत में अनजान हसीना से मुलाकात की बात भी उस ने सोची हो गी ओर सुनहरे ख्वाब भी देखे हों गे। पर मैं चौकस हो गई। मुझे किसी अनजान खूबसूरत जवान के साथ मिल कर फिल्मी जगत पर छा जाने की कोई ख्वाहिश नहीं थी।


और वही हुआ जिस का मुझे अंदेशा था। एक रात अचानक मेरे कमरे का दरवाज़ा खटखटाया गया। मैं ने सोचा शायद खाला को किसी ग्राहक को कपडे देने की बात याद आ गई हो गी। कई बार ऐसा होता था कि शादी ब्याह के मौके पर ज़्यादा आर्डर आ जाता और हम देर रात तक काम कर उसे निपटाने में लग जाते। उस वक्त यही मौसम था। मैं ने दरवाज़ा खाला तो एक दम खाला के भतीजे अन्दर दाखिल हुये और मुड़ कर दरवाज़े की चटखनी लगा दी। अब क्या बात चीत हुई, क्या डायलाग हुआ, उस को तफसील से बताने का फायदा नहीं है क्योंकि मैं कहानी कह रही हूं, अफसाना नहीं। उस के कहने का लबोलबाब यह रहा कि हम दोनों जवान हैं। तन्हाई दोनों के लिये अज़ाब है। वक्त का तकाज़ा है कि जिंदगी का लुत्फ उठाया जाये।


जब वह कमरे में दाखिल हुआ तो मेरा पहला रद्दोअमल यह रहा कि मैं ने पीछे हट कर चारपाई को खड़ा कर दिया था जो हम दोनों के बीच आ गई। दूसरे जैसा कि मैं ने बताया कि मैं खबरदार हो गई थी और मैं ने एक बड़ा से चाकू भी रख लिया था। उसे निकाल लिया और उसे बाहर निकल जाने को कहा। यह साफ कर दिया कि जिस खूबसूरत चेहरे की बदौलत वह सुनहरे खवाब देख रहा है, वह उतना खूबसूरत नहीं रहे गा। भले ही वह जंग जीत जाये पर वह ज़रा महंगी पड़े गी। उस ने समझाने की कोशिश तो की पर मुझे उस में कोई दिलचस्पी नहीं थी। एकाध बार उस ने चारपाई को छूने की कोशिश की पर मेरी तैयारी को देखते हुये हिम्मत नहीं पड़ी। आखिर वह दरवाज़ा खोल कर बाहर निकलने पर मजबूर हो गया। मैं ने फिर से चटखनी लगी ली।


पर मैं सो नहीं पाई। अभी इतने दिन नहीं हुये थे कि मैं खाला का और इस शख्स का रिश्ता जान पाती। यह तो ज़ाहिर था कि वह मेरी तरह से अनजान नहीं था जिसे कभी पहले देखा न हो। यह भी ज़ाहिर था कि वह बिना किसी पैसे के मुम्बई में आया है। मेरे पास तो पैसा था और दूसरे दिन से ही मैं ने घर के अखराजात में हिस्सा बंटाना शुरू कर दिया था जिस से खाला को यह यकीन था कि मैं बोझ बन कर नहीं रहूं गी। काम सीखने की कोशिश ने इसे और मज़बूती दे दी थी। पर यह भतीजा तो उस हालत में नहीं था फिर भी उस के बारे में खाला ने कुछ नहीं कहा। दिन भर वह गायब रहता था और हम (खाला और मैं) साथ साथ काम करते थे पर इस बारे में खाला से बात नहीं हुई। मेरी तरफ से कुछ पूछना मुझे वाजिब भी नहीं लगा। अब वह मायूस हो कर मेरे खिलाफ बात तो करे गा। कब तक यहाॅं रहे गा, मालूम नहीं। दिन में खाला कई बार काम से बाहर जाती ही थी। उस वक्त मेरी हिफाज़त कैसेे हो गी। अगर उस से कुछ रकम की अदायगी का इमकान होता तो मुझे जिस्मानी तालुक्क से कोई परहेज़ नहीं था, यह तो मैं बता ही चुकी हूॅं। मगर उस से कुछ पाने का सवाल ही नहीं था और उस के बगैर तालुक्क का भी कोई मतलब नहीं था।


वह दिन आया और बीत गया। अगर उस ने खाला से कुछ कहा हो गा तो खाला ने मुझ से ज़िकर नहीं किया। रोज़मर्रा की तरह वह दोपहर को तैयार हो कर निकल गया पर मुझे खटका ही रहा कि जाने वह कब लौट आये। अपने मुस्तकबिल के बारे में मेरे ख्यालात जारी रहे। आखिर कुछ तो फैसला करना ही था। वक्त कम ही था।


उस रात को मैं ने अपनी बची रकम फिर से देखी, जायज़ा लिया। और फिर सुबह चार बजे चुपके से उठी और संदूक उठा कर चल दी। जिस तरह एक दिन खाला के यहाॅं वारिद हो गई थी, उसी तरह गायब हो गई। खाला ने क्या सोचा हो गा, मालूम नहीं। मुम्बई, जैसा कि मैं ने पहले कहा, अपने में गर्क शहर है। दूसरा क्या कर रहा है, यह उस का ज़ाती मामला है। मुम्बई रात को भी सोती नहीं है। इक्का दुक्का आदमी आते जाते रहते हैं। सुबह चार बजै संदूक उठा कर किसी औरत को जाते हुये देख कर किसी के मन में कोई ख्याल नहीं आया। शायद किसी ने देखा भी नहीं। देखा तो नज़रअंदाज़ कर दिया। सब अपने काम में मशगूल थे।


इतने दिन मुम्बई में रह कर शहर का कुछ नकशा दिमाग में आ गया था। कौन सा इलाका किस बात के लिये मशहूर है, यह तो पता लग चुका था। पर इन में से मेरे लिये कौन सा चुनना है, यह सोचा नहीं था। कांदीवली ही महफूज़ जगह थी पर अब वह महफूज़ नहीं रह गई थी। अब दूसरी कोई खाला या कोई चचाजान डूॅंढना हो गा। किस्मत किस तरफ ले जाये गी, इस का पता नहीं था। किस के चुंगल में पड़ जाऊॅं गी, क्या कह सकती थी। पर मेरे कदम काम्ठीपुरा की तरफ उठ गये।


कामठीपुरा के बारे में बताने की ज़रूरत नहीं है। मुम्बई में रहने वाले इसे अच्छी तरह से जानते हैं। यह इलाका साल मुद्दतो से बदनाम है। कभी इस की शोहरत पूरे एशिया में सब से बड़ी मण्डी की थी। फिर और भी इलाके मुकाबले में आने लगे और इस की वहक्कत कम हो गई। पर इसी कामठीपुरा में मैं ने नई ज्रिंदगी की शुरूआत करने का फैसला किया।


यह मेरी किस्मत ही थी कि इस इलाके में मेरी पहली मुलाकात जुम्मन चचा से हुई। जुम्मन चचा की पान की दुकान थी। पर उस का धंधा पान तक महदूद न रह कर दूसरी तरह का था। जाने क्यों उस से मिल कर मुझे ऐसा क्यों लगा कि इस से खुल कर बात की जा सकती है। मैं ने उसे अपनी गुज़िश्ता जिंदगी के बारे में बताया। अली और जावेद और तीसरे शख्स के बारे में भी। मेरा मतलब साफ था। मैं अपने को बेचना चाहती थी और ग्राहक की तलाश में थी। जुम्मन चचा के और कई वाकिफ थे जो इसी लाईन में थे। पर जैसा कि उस ने बताया, हर एक की अपनी अपनी काबलियत होती है और अपना अपना तरीका। कोई सस्ते में बिक जाता है, कोई सही मोल पर। उसी तरह का माहौल भी होता है। कोई किसी की कठपुलती बन जाता है और जैसा नाच नचाया जाये वैसा नाचा जाता है। यहाॅं बिस्तर भी घण्टों के हिसाब से किराये पर मिलते थे। एक खोली में आठ दस लड़कियाॅं भी रहती थी। कैसे धंधा करती हों गी, मालूम नहीं। मेरी किस्मत थी या मेरा लहजा था या मेरा हुस्न था, जुम्मन चचा ने मुझे एक कमरा ले दिया जो सिर्फ मेरे लिये था। वैसे तो कामठीपुरा में गंदगी का ही माहौल था। गलियाॅं, कूचे सब में गंदगी ही गंदगी। बिस्तर, कमरे, सभी ही बुरी गिरी हालत में पर मेरा कमरा ठीक था। खाना बनाने को इंतज़ाम तो नहीं था पर सुबह शाम पास के होटल से खाना भेजने का सिलसिला था या वहाॅं जा कर खा सकते थे। जुम्मन चचा ही मेरे - क्या कहना चाहिये - सरपरस्त, बिचवई, इंतज़ाम अली थे। वही ग्राहक से बात करते थे और मुझे खबर कर देते थे। उस के बदले वह एक तिहाई के हकदार थे। जुम्मन चचा ही ग्राहक का स्टैण्डरड देखते थे और मेरे पास सही ग्राहक ही आते थे। यह इंतज़ाम मेरे लिये ठीक ही था। मेरी सिर्फ ण्क शर्त थी। एक रात में एक ही ग्राहक और वक्त की मियाद तय नहीं यानि कि सौदा रात का था, घण्टों के हिसाब से नहीं। और महीने में तीन चार रोज़ का नागा।


और हाॅं, एक बात और जिस का तालुक्क सीधे इस धंधे से था। मेरा नाम अब मालती था, शबाना नहीं। इस की अहमियत बताना ज़रूरी नहीं है।


4.

बहुत दिन बीते इस तरह से। मेरी पूरी कोशिश रहती थी कि ग्राहक को उस के पैसे का पूरा फायदा मिले। कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई हड़बड़ी नहीं। जुम्मन चचा ने एक रात का मुआवज़ा तीन सौ तय किया था। मुझे दो सौ मिल जाते थे जो ठीक ही था।

इसी में एक दिन वाक्या यह हुआ कि एक ग्राहक ने जाते वक्त कहा कि मेरे चार सौ वसूल हो गये। दूसरे दिन मेरा जुम्मन चचा से जम कर झगड़ा हो गया। मुझे तो दो सौ ही मिले थे। यह इकरार के खिलाफ था। एक तिहाई की बात हुई थी। आखिर में तय हुआ कि जो रकम बढ़ी है, उस को आधा आधा बाॅंट लिया जाये। आगे के लिये भी इस बात को ध्यान में रखा जाये। और जब कीमत पाॅंच सौ हुई तो वही तरीका अपनाया गया और इस के लिये जुम्मन चचा को कहना भी नहीं पड़ा। जुम्मन चचा बहुत शरीफ तरह के इन्सान थे।


जुम्मन चचा की सलाह पर ही मैं ने एक जिम में जाना शुरू कर दिया। उन का कहना था कि यह अपने जिस्म को तंदुरस्त रखने के लिये ज़रूरी है। जो अपना सरमाया है, उस की देख भाल करना अशद ज़रूरी है। उन्हीें की सलाह पर मुस्तकबिल के लिये बचा कर रखने का भी सिलसिला शुरू हुआ हालांकि अब्बू के ज़माने से ही यह बचत का तरीका तो था ही पर तब अब्बू के डर से खर्च न करने की वजह से था। अब कोई ऐसी मजबूरी नहीं थी मगर आगे का ख्याल रखने की तनबीह थी। कहना न हो गा कि ग्वालपाड़ा का मकान भी उन्हों ने ही ले कर दिया।


मैं ने बताया कि मेरी कोशिश पूरी तरह ग्राहक को तसल्लीबख्श तवज्जह देने की होती थी। इस का एक फायदा यह हुआ कि कई ग्राहक लौट कर आते थे। एकाध तो लगातार तीन चार दिन भी आते रहे। कभी कभी जुम्मन चचा को उन्हें दो एक दिन इंतज़ार करने के लिये भी कहना पड़ता था।


एक दिन जब एक ही शख्स लगातार चार दिन तक आता रहा तो उस ने चौथे रोज़ कहा कि उस का तो ख्याल है कि मैं उस के साथ ही चल दूॅं। रोज़ रोज़ को आने का चक्कर खत्म हो। मेरे यह पूछने पर कि मुझे इस में क्या फायदा हो गा, उस ने कहा कि एक फलैट किराये पर ले लें गे और उस में आराम से रह सकती हूॅ। पर मुझे तो लगभग बारह हज़ार माहवार की आमदन होती है। उस का क्या हो गा। इस के बदले पंद्रह हज़ार रुपये देने की पेशकश की गई। मैं ने सोच कर बताने को कहा।


क्या इस के बारे में जुम्मन चचा से बात करूॅं। इस में उस का नुकसान था। मेरे बारह हज़ार में उस के भी तो चार हज़ार थे। वह क्यों माने गा। अभी जो इंतज़ाम है, ठीक ही चल रहा है। एक तर्फ आमदन, दूसरी तरफ जुम्मन चचा की मदद का अहसान। दोनों में काफी कशमकश रही। आखिर मेरा फैसला इस पेशकश को मानने का ही हुआ। और इस तरह मैं रण्डी से रखैल बन गईं। यह तरक्की थी या नहीं, यह नहीं कह सकती।


उस आदमी से बात पक्की हो जाने के बाद और जाने की तारीख मुकरर्र हो जाने के बाद ही मैं ने जुम्मन चचा को इस की इत्त्लाह दी। उसे इस बात की शिकायत थी कि मैं ने पहले क्यों नहीं बताया। वह शायद बेहतर शर्तें मनवा सकता था। उस में एक तो मियाद की गारण्टी थी और दूसरी पहले रकम जमा करने की शर्त थी। उन का कहना था कि अब भी अगर मुमकिन हो तो मियाद की बात को छोड़ो पर कुछ माह के लिये रकम पहले से लेने की कोशिश करो। उन्हों ने एक बार भी नाराज़गी ज़ाहिर नहीं होने दी। इसी लिये मैं फिर कहती हूॅं कि जुम्मन चचा बहुत शरीफ इन्सान थे और हैं।


उन्हों ने मुझे तीन सलाह दीं। एक यह कि जिम जाना नहीं छोड़ूॅं। इस के दो फायदे हों गे। एक तो जिस्म चुस्त दरुस्त रहे गा। दूसरे जिम में कई लेोगों से मुलाकात हो गी जो आगे चल कर काम आये गी। उन का कहना था कि आदमी का कोई भरोसा नहीं है। कब उस का दिल एक औरत से भर जाये, कह नहीं सकते। शादीशुदा लोग भी आते हैं क्योंकि उन्हें कुछ अलग चाहिये। ऐसे मौके पर जिम में जाने से दूसरे शख्स की तलाश आसान हो सके गी।


दूसरी सलाह यह कि कभी अपनी मियाद बढ़ाने के लिये नहीं कहना। ज़बरदस्ती किसी के गले पड़ना दिक्कत पैदा कर सकता है। जैसे ही लगे कि अब आदमी का दिल भर गया है या उस का दिल किसी और पर आ गया है, किनारा कर लेना। नया कोई शख्स मिले तो ठीक, नहीं तो जुम्मन चचा तो रहें गे ही।


तीसरी सलाह यह कि बुढ़ापे को कभी मत भूलना। कमबख्त चुपके से आ जाता है और पता भी नहीं चलता। जब तक पता चलता है, बहुत देर हो चुकी होती है। इस लिये हमेशा अपने ग्वालपाड़े वाले मकान को याद रखना। गाहे बगाहे वहाॅं जाते रहना। हो सके तो किसी साथिन पर भी नज़र रखना। बुढ़ापे का सहारा होती हैं वह। बुढ़ापे में पैसा होना ज़रूरी तो है मगर सिर्फ उस का सहारा ही काफी नहीं होता।


5.

बस अब और क्या बचा है बताने के लिये। मैं ने शुरू में ही कहा था कि यह मुख्तसिर सी कहानी है। और जो अंजाम है, वह पहले शुरू में ही बता चुकी हूॅं। एक मकान से दूसरे में, दूसरे से तीसरे मे। शायद चौथा नहीं हो। काफी हो गया। जब तक यह है तब तक है। मालती की कहानी यहीं खत्म हो जाये गी। शबाना की तो बहुत पहले खत्म हो गई थी।


हाॅं, एक बार अपनी खाला को मिलने गई थी। कई साल बाद। वह और बुढ़ा गई थीं। पर अब भी काम करने पर मजबूर थी। कभी मुझ को सहारे की ज़रूरत थी, अब उस को है। शायद हाल का यह शानदार मकान छोड़ने की जब नौबत आये तो उन्हें अपने ग्वालपाड़ा वाले मकान पर ले जाऊॅं। लेकिन अभी कुछ भी यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता।


जुम्मन चचा से मुलाकात होती रहती है। उसे नये ग्राहक मिल गये हैं, कुछ पुराने चले गये हैं। उस का धंधा बदस्तूर जारी है। यह जिंदगी एक दरिया की तरह है। पानी आता है, चला जाता है पर दरिया चलता रहता है। कभी सिकुड़ जाता है, कभी किनारों को भी तोड़ने की जुर्रत करता है। उतार चढ़ाव जिंदगी का हिस्सा हैं। शख्स आते हैं, चले जाते हैं। अपनी यादें छोड़ जाते हैं। कभी सुख की, कभी दुख भरी।


गुनाह की शुरूआत मैं ने जान बूझ कर की थी या मजबूरी थी, कह नहीं सकती। पर गुनाह तो गुनाह है। अल्लाह ताल्ला इंसाफ करें गे, ऐसी इल्तजा है। मालती होने के नाते अम्ल का नतीजा भुगतना ही पड़े गा। उस में कभी किसी की रूह रियायत नहीं होती, ऐसा बताया गया है। जो हो, उस के लिये अन्दरूनी तौर पर तैयार हूॅं।


अलविदा।


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