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महिला दिवस पर विचार

महिला दिवस पर विचार


''परिवार तथा समाज में स्त्रियों की भूमिका सर्वथा भिन्न प्रकार की है। वे परिवार तथा समाज के क्रियाकलापों की केन्द्र बिन्दु हैं। महिलाओं को अपने मूलभूत कर्तव्यों के साथ संगत बिठा कर ही अधिकार की बात करना चाहिये। हर बात में पुरुषों के समानान्तर खड़ी होने की जंग भारतीय महिलाओं के लिये हितकर नहीं है। 8 मार्च को मनाया जाने वाला अन्तर्राष्ट्रीय दिवस हमारी परम्परा के अनुसार नहीं है। हमारे देश में तो साल के 365 दिन महिला दिवास मनाया जा कर महिलाओं के हितों और उन की उन्नति की चिन्ता की जाना चाहिये। आधे अधूरे तथ्यों के आधार पर लिखे गये लेखों केे बुनियाद की पर सित्रयों के बारे में शोघ निरर्थक है। भारतीय स्त्री तथा उस की भूमिका की वास्तविक स्थिति तो गांवों में जा कर ही समझी जा सकती है। आज भी गांवों में स्त्रियों की केन्द्रीय भूमिका है। वह स्वतन्त्र भी हैं और सब को साथ ले कर भी अपने कर्तव्यों को निभा रही हैं।

भारतीय स्त्रियां न तो वैदिक काल में बेचारियां थीं और न आज हैं। वह कल भी स्वतन्त्र थीं और आज भी स्वतन्त्र हैं। यह यहीं की बात है कि पिता अपने खर्चों में कटौती कर के भी बेटियों को पढ़ा रहे हैं। स्त्री पुरुष दोंनों समान नहीं हैं। स्त्री का हर क्षेत्र में स्वयं को समर्थ बनाना है। पश्चिमी देशों की स्त्रियों जैसी मुक्ति भारतीय स्त्रियों को नहीं चाहिये। यह मुक्ति तो दायित्वों से पलायन और परिवार एवं समाज में जंग का कारण बन रही है। पुरुष तो सहचर, भाई, पिता, पुत्र आदि रूपों में स्त्री का मददगार है और उस की प्रगति का माध्यम बनता है। उस से मुक्ति कैसी? जो संस्कार स्त्रियों को कर्तव्य बोध कराते है, उन से मुक्ति की बात तो आत्मघाती है।

अपनी बेटी को बेटी की तरह पालें। बेटी को 'बेटा॑ सम्बोधित करना उचित नहीं है। बेटी को बेटी के रूप में ही मान सम्मान मिलना चाहिये। लड़कियां विशेष हैं। उन की विशेष शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य की ज़रूरत है, जिस से वे आज की समस्यायों को समाधान कर सकें।

उपरोक्त विचार श्रीमती मृदुला सिन्हा, प्रख्यात साहित्यकार एवं राज्यपाल गोवा द्वारा व्यक्त किये गये हैं।


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