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महात्मा गाॅंधी की जेल यात्रायें

महात्मा गाॅंधी की जेल यात्रायें

अप्रैल 2020


एक लेख में मैं ने कुछ देशों के स्वतन्त्रता संग्राम सैनिकों की जेल यात्रा के बारे में लिखा था जिस में नैलसन मण्डेला, लोकमान्य तिलक, सुकारनों तथा गाॅंधी जी की बात की थी। दूसरे स्वतन्त्रता संग्राम सैनिकों की तुलना में गाॅंधी जी की जेल यात्रायें कष्टमय नहीं रहीं। एक मित्र ने फोन पर जानना चाहा कि इस का क्या कारण था। इस लेख में इस सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत किये जा रहे हैं।


इस प्रश्न का संक्षिप्त सा उत्तर है कि अंग्रेज़ों को गाॅंधी जी से डर नहीं लगता था। पर फिर प्रश्न उठता है कि उन्हें डर क्यों नहीं लगता था। इस डर के अभाव का कारण डूॅंढना चाहें तो यह वास्तव में यह एक बहुत जटिल समस्या है तथा इस में कई कोणों से विचार करना हो गा। इस में भारतवासियों का सामान्य चरित्र, भारत की राजनैतिक स्थिति, गाॅंधी जी का चरित्र आदि कई पहलुओं पर विचार करना हो गा। यह लेख इस दूसरे प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास है।


पहले गाॅंधी जी के बारे में जानने का प्रयास करें। एक ओर गाॅंधी जी का आदर्शवाद है। उन के ऊॅंचे विचार हैं। दूसरी ओर उन में दूरदर्शिता का अभाव है। वर्तमान में जीने की चाह है। तीसरी ओर उन का अहं है। दूसरों से असम्बद्धता है। चौथी ओर उन में भारतीय जनता की भावनाओं को जाॅंचने की अभूतपूर्व क्षमता है। पाॅंचवें उन में विपरीत विचारों के लोगों को साथ ले कर चलने की क्षमता थी, परन्तु संगठन बनाने की क्षमता उन में नहीं थी। एक ही लीक पर चलने का विचार भी उन में नहीं था। उन के अधिकतर निर्णय तदर्थ होते थे। इन सब विविधताओं के बीच इस प्रश्न का उत्तर डूॅंढना हो गा।


प्रथम भारतीय जनता के बारे में भी विचार करना उचित हो गा। भारत में हिन्दु बहुमत में हैं तथा अखण्ड भारत में भी थे। हिन्दुओं, तथा भारत में उपजे अन्य धर्मों, में संत छवि की विशेष महिमा है। त्याग की मूर्ति को आदर से देखा जाता है। एक ओर तड़क भड़क वाले अधिकारी हैं तो दूसरी ओर साधारण पोशाक में श्री गाॅंधी, उन का शाॅंत स्वभाव, उन की निर्मल वाणी, उन का सादगीपूर्ण जीवन जिस से लोग प्रभावित थे। गाॅंधी जी ने वह संत छवि प्राप्त कर ली थी। जनता ने कभी उन्हें योद्धा के रूप में नहीं देखा, एक संत के रूप में ही देखा।


गम्भीरता से विचार करें तो जिन महापुरुषों को जनता ने मान्य किया तथा जिन्हों ने जनता का विश्वास प्राप्त किया, वे धर्म के मार्ग पर चलने वाले ही थेे। मध्य काल में शिवा जी, आधुनिक काल में स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द तथा कई अन्य धर्म का मार्ग अपना कर चले तथा इस कारण उन की जनता में गहरी पैठ हुई। इस धर्म की गहरी नींव के कारण ही भारत में वही अन्दोलन पनपे जिन में धर्म की भावना प्रधान थी तथा इस स्थिति को गाॅंधी जी को लाभ मिला। उन्हों ने भले ही छद्म रूप से पर अपने को धर्म भीरु के रूप में प्रस्तुत किया। कभी हरिजन सुधार के नाम से, कभी गीता के वाचक के रूप में। इस से आम जन प्रभावित हुये। इस कारण उन के इस्लाम प्रेम को भी अनदेखा कर दिया।


प्रश्न फिर से प्रस्तुत करें। ब्रिटिश सरकार को गाॅंधी जी से डर क्यों नहीं लगता था। लोकमान्य तिलक का क्रिया कलाप देखें। उन्हों ने केसरी तथा मराठा नाम के समाचारपत्र निकाले। उन के माध्यम से अपने मत का प्रचार किया। उन के प्रकाशित लेख उग्र थे, ब्रिटिश सरकार की वास्तविकता बताते थे। निर्भीक रूप से उन की नीतियों पर प्रहार करते थे। उन के लेखों के आधार पर ही सरकार ने उन पर राजद्रोह के मुकद्दमें चलाये। उन को माण्डले भेजने का निार्ण्य किया, भारत से दूर। उस काल में समाचार आने की सुविधा नहीं थी। उन से अंग्रेज़ी सरकार को डर था।


गाॅंधी जी ने भी हरिजन तथा यंग इंडिया नाम के अखबार निकाले पर उन में कोई राजनैतिक स्थिरता नहीं थी। वे अधिकतर सामाजिक सुधार के बारे में थे। राजनैतिक लेखों में भी नरम वाणी थी। किसी अन्दोलन, किसी सार्वजपिक प्रदर्शन का आवाहन नहीं था।


वैसे तो लोकमान्य तिलक भी समाज सुधारक थे पर वह दूसरे प्रकार का प्रयास था। तिलक ने गणेष उत्सव के माध्यम से लोगों में एक नई चेतना भर दी। एक घरों में सीमित उत्सव को सार्वजनिक उत्सव में बदल दिया। इस के माध्यम से जनता को संगठित किया। गणेष उत्सव मनाने में भी जाति का भेद समाप्त हो जाता है क्योंकि यह सार्वजनिक भी है और समुदाय तक सीमित रहने वाला भी। इस में सामाजिक सुधार भी था तथा संगठन की नींव भी। गाॅंधी जी का इस प्रकार को कोई अभियान नहीं था। हरिजनों को मंदिरों में प्रवेश दिया जाये, यह तो उन्हों ने कहा परन्तु इस के लिये कोई व्यापक अन्दोलन नहीं किया क्योंकि वह उच्च वर्ग को भी साथ ले कर चलना चाहते थे। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करना चाहिये, यह भी उन का एक अभियान था किन्तु खादी को, चर्खे को, केवल एक प्रतीक के रूप में देखा गया। सतत अभियान नहीं चलाया गया। स्थानीय कपड़ा मिलों का विरोध नहीं था, उन के कपड़ों का बहिष्कार नहीं था। केवल खादी के प्रति श्रद्धा का भाव व्यक्त करने तक उन का अभियान सीमित था। 1923 में काॅंग्रैस दल की एक शाखा के रूप में खादी बोर्ड स्थापित किया गया तथा 1925 में एक स्पिनर बोर्ड किन्तु इन का कार्य संतोषजनक नहीं रहा क्योंकि उतना ध्यान नहीं दिया जा सका जितना अपेक्षित था। इस बीच इन पर दूसरी ग्राम स्थित उद्योगों का भार भी डाल दिया गया। 1940 के बाद तो केवल औपचारिकता ही निभाई गई।


गाॅंधी जी आदर्शवादी थे। उन के अपने सिद्धाॅंत थे तथा वह उन के प्रति समर्पित थे। इस में दूसरों का मत गौण था। यह उन्हों ने चोरा चोरी की घटना के बाद में अपने अन्दोलन को समाप्त कर के दिखा दिया। अंग्रेज़ इस से बहुत प्रभावित हुये। यहाॅं पर ऐसा व्यक्ति था जो अन्दोलन को एक सीमा से आगे नहीं बढ़ने दे गा। मोपला अन्दोलन में हिन्दुओं के सामूहिक हत्याकाण्ड पर गाॅंधी जी की प्रक्रिया से भी उन की इस धारणा को बल मिला। गाॅंधी जी के विचार में हिन्दु मुस्लिम एकता ही सर्वोपरि थी। इस आदर्श मे मोपला के अत्याचारों का विघ्न उन्हों ने नहीं पड़ने दिया। यहाॅं पर उन की संत छवि काम आईे।


यह तो स्पष्ट है कि मुस्लिम तो उन से नहीं जुड़े और न ही वह खिलाफत अन्दोलन को वास्तविक रूप देख पाये, परन्तु हिन्दु भी उन से अलग नहीं हुये और वह फिर भी उन के नेता बने रहे, यह ब्रिटिश सरकार के पसन्द की बात थी। अहिंसा के प्रति उन के अडिग विश्वास ने ही उन्हें आतंकवादी सैनानियों जैसे भगत सिंह का समर्थन करने से रोके रखा।


यह नहीं कि गाॅंधी जी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अन्दोलन नहीं किये। समय समय पर यह अन्दोलन होते रहे पर उन का स्वरूप एक निरन्तर अभियान न हो कर कुछ काल के लिये था। अंग्रेज़ों ने इन्हें प्रैशर कुक्कर के रूप में देखा। इस में दबाव बनता रहता है परन्तु जब दबाव अधिक हो जाता है तो सेफ्टी वाल्व से भाप बाहर निकल जाती है और फिर से पुरानी स्थिति आ जाती है। अंग्रेज सरकार के विरुद्ध लोगों में रोष था और वह समय के साथ बढ़ता रहता था। तब एक अन्दोलन आता है तथा यह रोष उग्र हो कर फूट पड़ता हैं। कुछ दिन चल कर यह मन्द पड़ जाता है। कोई स्थायी संगठन नहीं है जो इसे आगे ले जाने में काम आये। इसे सतत रूप से चलाये। जनता की भड़ास निकल जाती है। सब कुछ पूर्ववत हो जाता है। यह स्थिति सरकार को पसन्द आती है।


इस कारण गाॅंधी जी को देश निकाला देना अथवा काले पानी भेजना अथवा सश्रम कारावास की सज़ा देना सरकार के लिये सुविधाजनक नहीं होता। उन्हें जेल भेजना आवश्यक होता है क्योंकि एक तो इस से उन के अहं की तुष्टि हो जाती है, दूसरे लोगों में भी यह धारणा बनती है कि वह भी हमारे साथ सज़ा भुगत रहे हैं। पर जो कष्टमय कारावास था, वह आम बन्दियों के लिये था, गााॅंधी जी या अन्य नेताओं के लिये नहीं था। इस से औपचारिकता भी पूरी हो जाती थी तथा सद्भाव भी बना रहता था। गॉंधी, नेहरू इत्यादि के लिये यह जेल यात्रायें केवल औपचरिकता थीं। मिलने जुलने की आज़ादी थी। पढ़ने लिखने की आज़ादी थी। राजनैतिक गतिविधि चलाने की आज़ादी थी। गॉंधी अम्बेदकर समझौता इस का उदाहरण है जो गांधी जी के जेल में रहते हुये ही हुआ था।


गाॅंधी जी अंग्रेज़ों के विरुद्ध थे, इस में भी संदेह है। वह उन पर, उन की सदाश्यता पर भरोसा करते थे। उन का मानना था कि उचित दबाव से वह सही रास्ते पर आ सकते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के समय 1940 में भी उन का व्यक्तव्य था कि वह इंगलैण्ड के विनाश पर भारत की स्वतन्त्रता नहीं चाहते। सुभाष चन्द्र बोस इस स्थिति का लाभ उठाना चाहते थे पर गाॅंधी जी प्रतीक्षा करना चाहते थे। कौन सी बात उन के लिये अधिक महत्वपूर्ण थी, यह इस से स्पष्ट होता है।


जहाॅं तक अहं की बात है, उस के लिये दो उदाहरण ही काफी है। दिसम्बर 1927 में चन्नै (तब मद्रास) में पारित पूर्ण स्वतन्त्रता के प्रस्ताव को उन्हों ने मानने से इंकार कर दिया। इसी प्रकार दिसम्बर 1928 में सुभाष चन्द्र बोस ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा था जो गाॅंधी जी ने नहीं माना। केवल यह प्रस्ताव पारित कराया कि 1929 तक पूर्ण स्वराज नहीं दिया जाता तो वह अन्दोलन करें गे। 1929 तक न वैसा हुआ और न ही कोई अन्दोलन हुआ। 1938 में सुभाष चन्द्र बोस को काॅंग्रैस अध्यक्ष से त्यागपत्र के लिये मजबूर करने की बात तो सर्व विदित है। इसी प्रकार 1946 में जवाहर लल नेहरू को प्रधान मन्त्री बनने की राह प्रशस्त करना भी उन का अहं ही प्रकट करता है जिस में दूसरे नेताओं की राय का कोई महत्व नहीं था।


गाॅंधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो उन का राजनीतिे में पदार्पन गोपाल कृष्ण गोखले के माध्यम से हुआ। गोखले जी ने उन्हें सलाह दी कि राजनीति में आने से पहले वह भारत का भ्रमण करें तथा इसे समझने का प्रयास करें। गाॅंधी जी ने इस का पालन किया। इस भ्रमण से वह समझ गये कि भारतीय जनता सैंकड़ों वर्षों की पराधीनता के कष्ट झेलती रही है। उन के किसी भी विरोध को सख्ती से कुचल दिया गया है। अतः उन में अब आवाज़ उठाने का साहस भी नहीं है। उन में विद्रोह की भावना समाप्त हो चुकी है। इस स्थिति के लिये इस काल से पूर्व की भावनायें भी ज़िम्मेदार थीं। बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म में तथा उन के प्रभाव में हिन्दु धर्म में अहिंसा पर जो ज़ोर दिया गया, उस अहिंसा के प्रबल अन्दोलन के कारण समाज भीरु हो चुका है। उन में किसी उग्र अन्दोलन चलाने की न इच्छा है न ही क्षमता। इसी अहिंसा की भावना के चलते जब भगत सिंह ने एसैम्बली में बम्ब फैंका तो इस बात का ध्यान रखा कि कोई हताहत न हो। इस के साथ ही उन्हों ने पाया कि जातिवाद में बटा समाज कभी किसी उद्देश्य के लिये एक होने का सोच नहीं सकता है। ऐसे में भीतरघात की सम्भावना सदैव रहती है। और यह बात बाद की कई घटनाओं से सही भी सिद्ध हुई है।


इस अध्ययन से उन्हों ने यह धारणा बनाई कि न तो हिंसा तथा न ही गोपनीयता व्यवहारिक है। जो कुछ करना है, वह खुले में किये गये। इस कारण ही खादी का प्रचार, विदेशी माल का बहिष्कार इत्यादि, उसे पूर्व घोषणा कर के किया जाये। वह ममझ गये थे कि सशस्त्र विद्रोह नहीं हो सके गा, क्योंकि ऐन समय पर हिम्मत जवाब दे जाये गी, अतः इस कमज़ोरी के कारण अहिंसा ही सही हथियार रहे गा। इसे असहयोग का नाम दिया गया पर यह वास्तव में असहयोग नहीं था। सरकार के लगान को न देने का कभी नहीं कहा गया। शासकीय शालाओं का बहिष्कार कभी स्थायी नहीं रहा। समानान्तर शालायें कभी नहीं चलाई गईं। कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, न ही इन के लिये कोई संगठन तैयार किया गया, न ही कोई संवर्ग तैयार किया गया। धार्मिक तथा अन्य सुधार का कार्य भी छुटपुट संस्थाओं द्वारा ही किया गया जिन का काॅंग्रैस दल से सीधा सम्बन्ध नहीं था तथा व्यक्ति विशेष की योग्यता, लग्न तथा श्रम पर आधारित था।


इस में संदेह नहीं कि भारत की तत्कालीन स्थिति के लिये ऐसा ही अभियान चलाया जा सकता था। सशस्त्र विद्रोह की गुॅंजाईश नहीं थी। यदि दूर दृष्टि होती तो असहयोग अन्दोलन के साथ साथ वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में भी सोचा जाता। समानान्तर नीचे से ऊपर तक ढाॅंचा बनाने का प्रयास नहीं था। ‘हिन्द स्वराज’ में इस व्यवस्था के बारे में कुछ कल्पना की गई थी। इस में ग्रामों को स्वयसक्षम ईकाईयों के रूप में प्रस्तुत किया गया। उल्लेखनीय है कि यह लेख 1909 में लिखा गया था जो अनुभव पर आधारित नहीं था वरन् आंतरिक विचारों का प्रतिबिम्ब था। 1938 में नव जीवन प्रैस ने इस का पुनः प्रकाशन किया किन्तु इस पुनः प्रकाशन में मूल भावना में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। 29 वर्ष के अन्तराल ने कोई नया विचार उदघाटित नहीं किया। जाति आधारित समाज व्यवस्था में यह कहाॅं तक जम पाये गा, इस पर विचार आवश्यक था तथा इस के निदान के लिये कार्रवाई की रूपरेखा बनाई जाना चाहिये थी। यह उल्लेखनीय है कि 1935 में कई राज्यों में काॅंग्रैस की सरकार कार्यरत थी परन्तु हिंद स्वराज के अनुरूप कोई कार्रवाई की गई हो, यह देखने को नहीं मिलता। यह उदारचेता विचार थे पर विचार ही रह गये। मुख्य कारण संगाठानात्मक ढाॅंचे का अभाव था। 1947 में भी जब अन्ततः ब्रिटिश सरकार चली गई तो भी सिवाये उन्हीं के द्वारा प्रदत्त ढाॅंचे को अपनाने के कोई चारा नहीं था। इस का परिणाम आज भी राष्ट्र भुगत रहा है।


सारांश में वैकल्पिक व्यवस्था के अभाव में, जनता में उत्तेजना लाने के प्रयास के अभाव में, एक निरन्तर अन्दोलन के अभाव में, सशस्त्र विद्रोह की सम्भावना के अभाव में, गाॅंधी जी ने जो मार्ग अपनाया, जो असहयोग पर आधारित मार्ग अपनाया, जो स्थापित व्यवस्था को घ्वस्त नहीं करता था, जो ब्रिटिश सरकार तथा ब्रिटिश जनता की सदाश्यता पर आधारित था, वही एक मात्र रास्ता था और वही गाॅंधी जी द्वारा अपनाया ग्या। मेरी दृढ़ मान्यता है कि समय की स्थिति के अनुरूप ही महापुरुष अवतरित होते हैं और गाॅंधी जी उस समय और स्थिति की माॅंग थे। स्वाभाविक रूप से इस प्रकार का अन्दोलन सरकार को भी रास आता था अतः गाॅंधी जी के विरुद्ध कोई कठोर कार्रवाई करना सरकार के हित में नहीं था। रही बात अन्दोलन के सफल होने की, तो वह भी समय तथा परिस्थिति जन्य घटना थी। उपनिवेशवाद का एक काल था तथा वह समय चक्र से समाप्ति की ओर था। कई देशों ने इस काल में स्वतन्त्रता प्राप्त की, कुछ ने हिंसा के माध्यम से, कुछ ने बिना हिंसा के। और भारत उन में एक था।इस में गॉंधी जी का योगदान छोड़ भी दिया जाये तो भी उपनिवेशवाद समाप्त होने की प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं आती।


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